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भारतीयता, भारतीयकरण एवं समाज कार्य

यहां विभिन्नताओं में एकता की महक है. अनेकों बोली, भाषा, खानपान, वेशभूषा, रहन सहन, रीति-रिवाज, मान्यताएं, विचार, जीवन शैली, मूल्य, आदर्श एवं प्रतिमानो के होने के बावजूद भी भारत एक सूत्र में बंधा है।

india, indian cultureभारत एक समृद्धशाली, वैभवशाली एवं विशिष्ट सभ्यताओं वाला देश रहा है। (file)

कुमार सत्यम

भारत एक समृद्धशाली, वैभवशाली एवं विशिष्ट सभ्यताओं वाला देश रहा है। यहां की गौरवशाली संस्कृति एवं विशिष्ट पहचान विश्व के मानचित्र पर एक अलग स्थान रखता है। ज्ञान का केंद्र होने के साथ-साथ विश्व के प्रथम गणराज्य होने का भी गौरव प्राप्त है। यहां विभिन्नताओं में एकता की महक है. अनेकों बोली, भाषा, खानपान, वेशभूषा, रहन सहन, रीति-रिवाज, मान्यताएं, विचार, जीवन शैली, मूल्य, आदर्श एवं प्रतिमानो के होने के बावजूद भी भारत एक सूत्र में बंधा है। अनेकों अराति एवं भीषण आक्रमणों झेलने के बाद भी इस दिव्य भूभाग ने अपनी आभा को कम ना होने दिया। आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए यह अपनी भारतीयता को आत्मीयता से पोषित करता रहा।

विदेशी अध्येता एवं पाश्चात्य संस्कृति से पोषित लोग भारतीयता को कभी समझ नहीं पाए, इसलिए उनको कभी इस बात का आशय नहीं हो सका की भारत श्रेष्ठता की सीमाओं को पार करने की क्षमता रखता है। भारतीयता भारत के लोगों के लिए उस रश्मि पुंज की तरह है जिसकी ऊष्मा अंतहीन भावनात्मक प्रवाह पैदा करता है। इस भावनात्मक ज्वार में सामाजिक,सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक मूल्यों के समावेशन के फलस्वरूप एक प्रबुद्ध एवं मूल्यवान भारतीय का निर्माण होता है। भारतीयता भारत के लोगों की आत्मा है. जैसे आत्मा के बिना शरीर कि कोई सार्थकता नहीं है उसी तरह भारतीयता के बिना भारतीयों की पहचान अधूरी है।

भारतीयता सूक्ष्म मानक एवं निश्चित भौगोलिक परिदृश्य के दायरे में नहीं देखा जा सकता है. वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में भारत के सामाजिक संस्थाएं प्रभावित हुई है।  खासकर परिवारों की स्थिति, पाश्चात्य संस्कृति की ओर झुकाव, वहां के मान्यताएं एवं जीवन शैली को अपनाने की होड़ इत्यादि।  आर्थिक प्रतियोगी माहौल में अपने मूल्यों एवं संस्कृति के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाना सांस्कृतिक पुनर्स्थापन की ओर इंगित करता है।

भारतीयता की इसी पुनर्स्थापना की प्रक्रिया को सामान्य तौर पर भारतीयकरण कही जा सकती है और इस भारतीयकरण की आवश्यकता विभिन्न भारतीय आयामों में महसूस की जा रही है। खासकर शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण का समावेशन बहुत ही आवश्यक है। हम पाश्चात्य संस्कृति के शिक्षा तंत्र को दशकों से ढोते आ रहे थे। पर अब परिस्थितियां बदल रही है एवं नई शिक्षा नीति भारतीय दृष्टिकोण को अच्छे से प्रतिबंधित करने में सक्षम होगा। भारतीयकरण का पर्याय अतीत की वापसी से नहीं है अपितु कालखंड की घटनाओं से प्रेरणा लेने के संदर्भ में देखा जा सकता है।

भारत के शिक्षा क्षेत्र में एक पेशेवर पाठ्यक्रम ‘समाज कार्य’ सात दशकों से अस्तित्व में है. इतने सालों से अस्तित्व में होने के बावजूद यह पेशेवर पाठ्यक्रम भारत के समाज में अपनी विशिष्ट पहचान नहीं बना सका है।  शिक्षा के क्षेत्र में यह अभी भी एक पेशेवर पाठ्यक्रम की हैसियत को प्राप्त नहीं कर सका है, हो सकता है कि इसके पीछे संवैधानिक एवं राजनीतिक पहलू हो। पर यह भी सत्य है की पाश्चात्य संस्कृति के अनुरूप विकसित पाठ्यक्रम को भारत में उसके मूल रूप में प्रस्तुत कर देना इसकी असफलता का कारण बना।  उपनिवेशवाद जिस दासता को जन्म देता था एवं पोषित करता था, वर्तमान के समाजकार्य पाठ्यक्रम उसी पारिस्थितिक समायोजन का एक विशिष्ट उदाहरण है।

इस पाश्चात्य आधिपत्यता को चुनौती देना आवश्यक है. वर्तमान में देश की परिस्थिति एवं भविष्य में इसकी उपयोगिता के लिए इस पाठ्यक्रम का भारतीयकरण आवश्यक है। समाजकार्य अंततः भारतीयों के सामाजिक सार्वभौमिकता का परिचायक है।  इसे सूक्ष्म रूप में देखना एवं समझना इसके पूरे संदर्भ को धूमिल कर देता है। पिछले कुछ वर्षों से भारतीय समाज कार्य परिषद इस दिशा में संभावनाएं तलाश रही है। इस परिषद का सकारात्मक सोच समाजकार्य को भारतीय परिपेक्ष में देखना एवं भारतीयकरण की प्रक्रिया में शामिल करना निश्चित है।

भारतीय सनातनी परंपरा में ऐसे अनेकों उदाहरण एवं विधियां है जिसको हम इस पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है। ऐसे में समाज कार्य विषय भारतीयता से लबरेज भारतीय विधि के अनुसार भारतीयों के लिए समस्या के उपयुक्त समाधान के लिए प्रस्तुत होगा। विषय सामग्री का अपनी मातृभाषा में उपलब्ध होना एवं संवादों का स्थानीय भाषा में स्थापन होना इस पेशेवर पाठ्यक्रम के मार्ग को प्रशस्त करेगा। परिणामस्वरूप पाठ्यक्रम के मर्म देश के वास्तविक प्रश्न को संबोधित कर पाएगा।  इस पाठ्यक्रम का विस्तार एवं उत्तमता इस बात पर निर्भर करेगा की इसके विधि भारत के सिद्ध पद्धतियों के अनुरूप है या नहीं।

भारतीयकरण का आशय ये बिल्कुल भी नहीं है बाहर के परिष्कृत गुणों का तिरस्कार कर देना, परंतु इस आयात हमें ज्ञात होना चाहिए की भारतीयता की मूल भावना प्रभावित ना हो।  भारतीयकरण की प्रक्रिया में वैज्ञानिक, प्रासंगिक,तार्किक,समग्र एवं आध्यात्मिक सोच को प्राथमिकता देना उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होगा। भारत जैसे विशाल देश में समाज कार्य पाठ्यक्रम को बड़े स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है। इस पाठ्यक्रम को लागू करने के साथ-साथ हमें स्थानीय मुद्दे को भी केंद्र में रखना पड़ेगा। स्थानीय मुद्दे को स्थानीय विधि एवं विचारों के साथ हल करने के तरीके तलाशने पड़ेंगे।

भारत के सामाजिक परिवेश को ग्रामीण, आदिवासी एवं शहरी स्तरों तक सीमित रखना भूल होगी। व्यक्तिक एवं सामाजिक समस्या निराकरण के लिए इन स्तरों के मध्य की बारीकियों को देखना एवं समझना है. भारतीय समाजकार्य पाठ्यक्रम का मूल उद्देश्य स्थानीयता से जुड़ाव एवं वैश्विकता पर प्रभाव से समझा जा सकता है. चिकित्सा, कृषि, शिक्षा, नागरिक कल्याण, राजनीति, लोक प्रशासन, बाल सुधार, दिव्यांग, व्यापार, रोजगार, प्रबंधन, मनोविज्ञान इत्यादि अनेकों ऐसे क्षेत्र हैं जहां समाजकार्य पाठ्यक्रम अपनी उपस्थिति मौजूद कर सकता है।

वर्तमान में भारत में समाज कार्य पाठ्यक्रम की स्थिति से कोई अनभिज्ञ नहीं है. भारत की नई शिक्षा नीति इस परिस्थिति को बदलने में सहायक हो सकता है बशर्ते ‘भारतीय समाज कार्य परिषद’ इस अभियान को अग्रसारित करता रहे. सत्तर सालों से अधिक के कालखंड में संभवत हर भारत का शिक्षार्थी जो समाजकार्य के पठन-पाठन से जुड़े हैं इस वास्तविकता को समझ रहे होंगे। हालांकि ऐसा नहीं है कि किसी ने भारतीयकरण की इस मुहिम की पहल ना की हो, पर परिस्थितिजन्य एवं समेकित प्रयास की कमी कुछ हद तक कारक हो सकते हैं इस प्रयास में पीछे होने का। जनभागीदारी, शिक्षकों एवं अध्यापकों का नैतिक सहयोग, सरकार की पहल इस परिस्थिति को परिवर्तित करने में सहयोग करेगा. आने वाले समय में समाज कार्य का भारतीयता के साथ भारतीयकरण हो ऐसी पूर्ण संभावना दिख रही है।

कुमार सत्यम,
सहायक प्राध्यापक, डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज में समाज कार्य विभाग मेें सहायक प्राध्यापक हैं। लेख मेें  लिखे विचार उनके निजी हैं।)

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