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कृष्णलीला और मनचलों की हरकतें एक नहीं, जिन श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई, वे रोमियो कैसे हो सकते हैं

कृष्ण पर आपत्तिजनक बयान देकर वे अपनी सोच साबित कर सकने वाली दैनिक व्यावसायिक प्रवृत्ति के स्वयं शिकार हो गए हैं।

योगी आदित्य नाथ ने यूपी का सीएम बनने के बाद एंटी-रोमियो स्क्वैड का गठन किया था।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

भारत में तथाकथित बुद्धिजीवियों के नितांत अबौद्धिक बयान और फिर उस पर लोगों के गलत अर्थ लगा लेने के कुतर्क देश की बुद्धिजीवी सोच को जिस सड़ांध में धकेल रहे हैं, वह निःसंदेह निंदनीय और अशोभनीय है। भारत में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में कृष्ण और उनका दर्शन क्या है, यह व्याख्या से परे है। यह शायद कृष्ण पर हाल ही में दिए गए एक भारतीय बुद्धिजीवी को भी मालूम होगा, परन्तु सस्ती लोकप्रियता या फिर सुर्खियों में बने रहने की निम्नमहत्वाकांक्षी विक्षिप्तता या फिर धार्मिक उन्माद फैलाने की मजे लेने की प्रवृत्ति, सचमुच समझ से परे है कि ऐसी विरोध करने की नितांत बचकानी लालसा को क्या कहा जाए? राजनीति में राम को वर्षों से परेशान करते आ रहे लोगों ने अब कृष्ण को भी घसीटना आरम्भ कर दिया है। कोई व्यक्ति कृष्ण को रोमियो जैसे काल्पनिक पात्र से भी बदतर स्थिति में कैसे साबित करने की चेष्टा कर सकता है, सिर्फ इसलिए कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हो रहे बदलाव उसे पसंद नहीं आ रहे हैं?

कम से कम देश, नारी या युवाओं के हित में लिए जा रहे निर्णयों की गम्भीरता पर बुद्धिजीवियों की यूं उथली चुनौतियां कि रोमियो की जगह कृष्ण नाम रखकर बताओ तो जाने, कितनी हास्यास्पद और जुगुप्सीय लगती हैं। क्या ऐसे बुद्धिजीवी वास्तव में बुद्धिजीवी कहे जाने के हकदार हैं या कि उनसे बेहतर वे भोलेभाले भारतीय जन हैं जो कृष्ण के संभोग में भी योग और वियोग के दर्शन को समझने की अन्तर्दृष्टि रखते हैं।

कृष्ण की लीलाएं उत्तर प्रदेश के मनचलों और आवारा युवाओं की अश्लील हरकतों से मेल खाती नहीं जान पड़तीं। यदि ऐसे पाश्चात्य साहित्य प्रेमियों को रोमियो से सहानुभूति है भी, तो कम से कम अपनी आपत्ति को वहीं तक जताया होता, उसे भारतीय दर्शन के आस्था के कृष्ण से जोड़ने की क्या आवश्यकता आ गई? वे जानते हैं कृष्ण से जोड़ेंगे तो आस्थाएं विरोध में टकराएंगी, भावनाएं आहत होंगी, निःसंदेह मेरी भी हुईं, और ऐसे ही कितने कृष्णप्रेमियों की हुईं होंगी। देश में विवाद चलते रहने चाहिए, कभी असहिष्णुता के नाम पर, कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर, कभी आरक्षण के मुद्दे के नाम पर और भी जाने क्या क्या, बुद्धिजीवी अच्छे से समझते हैं।

जन्माष्टमी के मौके पर श्रीकृष्ण के विभिन्न रुपों में बाल-गोपाल।

हमारे देश का हर बुद्धिजीवी हमेशा से प्राचीन ऐतिहासिक अथवा समसामयिक तथ्यों का विश्लेषण अपनी सोच की सुविधानुसार करने के लिए स्वतंत्र रहा है लेकिन इस स्वतंत्रता का लाभ व्यक्तिगत तौर पर लेने के लिए राष्ट्र की अस्मिता, सम्प्रभुता और धर्मनिरपेक्षता को आहत करना कितना गैरजिम्मेदाराना लगता है। आग लगाकर तमाशा देखना, आग में घी डालना जैसे मुहावरे भारत में ऐसे ही लोगों के चलते बने होंगे। एक कृष्ण पर एक ट्वीट लिखकर वो भी आपत्तिजनक लिखकर एक साथ तकनीकी स्तर पर करोड़ों भावनाओं को ठेस पहुंचा दी जाए, यह वैज्ञानिक विकास तो कहा जा सकता है, पर इस विकास ने एक पल में ही भारतीय विद्वता को महाभारतकालीन वर्षों पीछे की कौरवीय संस्कृति में भी धकेल दिया, जहां कृष्ण द्रोपदी की अस्मिता को बचाते हैं और गोपियों के साथ रास भी करते हैं, हां पर वे फिर भी हमें कहीं से उत्तर प्रदेश के मनचलों से नहीं लगते हैं क्योंकि कृष्ण हमें कभी ऐसे लग ही नहीं सकते हैं, क्योंकि वे ऐसे कदापि हो ही नहीं सकते हैं। कृष्ण में रोमियो और मनचले आवारा के दर्शन उनको ही हो सकते हैं, जो सिर्फ और सिर्फ इनकी स्थूलता तक की ही प्रवृत्ति को महसूस कर सकने की सामर्थ्य रखते हैं।

कृष्ण पर आपत्तिजनक बयान देकर वे अपनी साबित कर सकने वाली दैनिक व्यावसायिक प्रवृत्ति के स्वयं शिकार हो गए हैं। मेरा भारत, आपका भारत, हमारा भारत यूं कब तक ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों की स्तरहीन टिप्पणियों से कराहता रहेगा? भौतिक विकास कर लेने से सम्पूर्ण विकास नहीं हो जाता, भारत में ऐसे ही लोगों की निम्न मानसिकता समग्र विकास की बाधक रही है।

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