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अमर कहानी: अडानी ने छोड़ दिया फोन उठाना, प्राइवेट जेट से म‍िलने गए थे अरुण जेटली!

अमर सिंह में ऐसी क्या बात है कि वह चाहे मुख्य धारा की राजनीति में रहे हैं या न रहें, चाहे सत्ता में रहें या न रहें, मगर प्रासंगिक बने रहते हैं। वो भी तब, जिस पार्टी की जड़े उन्होंने सींचीं, उसी पार्टी से आज रुख्सत हैं, फिर भी मोदी की निगाह में उनकी अहमियत इतनी क्यों है, जिसके लिए उन्हें बड़ी सभा में भी दाद मिली।

लखनऊ में रविवार(29 जुलाई) को मौका योगी सरकार के ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी का था। इस दौरान भगवा कुर्ता पहने अमर सिंह का जलवा तब सबने देखा, जब दिग्गज उद्योगपतियों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें “अमर सिंहजी” कहकर पुकारा। कहा-“यहां अमर सिंह बैठे हैं, सबका काला चिट्ठा निकालकर रख देंगे, कौन पूंजीपतियों के घर दंडवत होने जाता था।”

यूं तो उस सेरेमनी में देश के तमाम दिग्गज पूंजीपति बैठे थे, मगर मोदी ने नाम लिया भी तो इस वक्त राजनीति में हाशिए पर चल रहे अमर सिंह का, ऐसे में मोदी के इस बयान के साथ एक फिर राजनीति में अमर कहानी प्रासंगिक हो उठी है। लोगों में कौतुक इस बात का है कि अमर सिंह में ऐसी क्या बात है कि वह चाहे मुख्य धारा की राजनीति में रहे हैं या न रहें, चाहे सत्ता में रहें या न रहें, मगर प्रासंगिक बने रहते हैं। वो भी तब, जिस पार्टी की जड़े उन्होंने सींचीं, उसी पार्टी से आज रुख्सत हैं, फिर भी मोदी की निगाह में उनकी अहमियत इतनी क्यों है, जिसके लिए उन्हें बड़ी सभा में भी दाद मिली। जानकार इसके पीछे अमर सिंह के खास व्यक्तित्व और हर जगह उनकी पैठ को वजह बताते हैं। यह किसी से छुपा नहीं है कि अमर सिह का उठना-बैठना किसी दल या दायरे में बंधा नहीं है। बड़े नेताओं ही नहीं देश के उद्योगपतियों और फिल्मी सितारों के साथ उनके उठने-बैठने की तमाम तस्वीरें आपको गूगल पर एक क्लिक करते ही मिल जाएंगी।

यह दीगर बात है कि अमर सिंह की शिकायत रही है कि उनके हाशिए पर चले जाने के बाद से अपने भी पराए हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर गौतम अडानी को लीजिए। अमर सिंह के मुताबिक कभी अडानी से नियमित मुलाकातें होतीं थीं मगर राजनीति में हाशिए पर जाने पर उन्होंने मिलने की बात ही छोड़िए फोन भी उठाना बंद कर दिया।

भले आज अमर सिंह की बीजेपी में जाने की अटकलें लग रहीं हैं, मगर इस पार्टी में उनकी पैठ नई बात नहीं है। कई बीजेपी नेताओं से अमर सिंह के करीबी रिश्ते रहे हैं। इस सूची में वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम प्रमुख है। जब 2009 में अमर सिंह किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ हास्पिटल में भर्ती थे, तब मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अरुण जेटली अपने एक मीडिया मुगल साथी के साथ प्राइवेट प्लेन से उन्हें देखने गए थे। वो भी तब जब अमर के कई करीबियों ने उनसे दूरी बना रखी थी। उनकी देखभाल के लिए अस्पताल में बीवी के सिवा कोई और नहीं था। अमर के करीबी उन्हें सियासत, बिजनेस, ग्लैमर, फिल्म जगत और मीडिया का कॉकटेल कहते हैं, ऐसे में लिखने के लिए बहुत है। मगर अमर सिंह के साथ एक अनचाही बात जुड़ी है, यह बात उनके करीब आने वाले हर शख्स को एक बार परेशान भी करती है। कहा जाता है कि अमर सिंह जिस घराने के करीबी बनते हैं, उसी घराने के टूटने की खबरें आती हैं। उन्हें बड़ा फेमिली ब्रेकर भी कहने वाले कहते हैं।
कई घरों को तोड़ने का लगा आरोपः अमर सिंह की अपने भाई अरविंद सिंह से भी नहीं पटती है। अरविंद बिजनेसमैन हैं। 31 दिसंबर 2017 में वह खुलेआम अमर सिंह को घर तोड़ने वाला करार दे चुके हैं। मुलायम परिवार में मचे विवाद के पीछे उन्होंने अपने भाई अमर सिंह का हाथ बताते हुए कहा था कि वह कई घर तोड़ चुके हैं। अरविंद ने कहा था-वह मेरे भाई हैं, यह कहने में शर्मिंदगी होती है।
यादव परिवारः मुलायम परिवार में जब सितंबर 2016 में कलह मचनी शुरू हुई तो इसके पीछे अमर सिंह का हाथ होने की चर्चा थी। बातों को इसलिए भी बल मिला कि अखिलेशऔर उनके चाचा रामगोपाल ने बार-बार एक ‘बाहरी व्यक्ति’ पर परिवार में फूट डालने का ठीकरा फोड़ा। जाहिर सी बात है कि इशारा अमर सिंह की तरफ था। अखिलेश करीबियों से यहां तक कह दिए कि अमर सिंह ने ही उन्हें औरंगजेब और नेताजी को शाहजहां के रूप में प्रचारित करने वाली स्टोरी प्लांट कराई थी। यही नहीं उस दौरान सुलह-समझौते के लिए हुई एक मीटिंग में कहा गया कि अखिलेश को पार्टी से बाहर करने वाली चिट्ठी जारी करवाने के लिए के लिए अमर के घर से टाइपराइटर मंगाया गया था। बहरहाल अखिलेश यादव के राज में अमर सिंह को सपा से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। सैफई परिवार में फूट डाले का अमर सिंह पर लगा आरोप नया नहीं था, इससे पहले 2010 में भी रामगोपाल, अखिलेश और आजम के दबाव में उन्हें मुलायम बाहर कर चुके थे। बीच में अमर ने अपनी पार्टी बनाई, मगर सभी सीटों पर उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई, 2014 में लोकदल से चुनाव लड़े तो हार का सामना करना पड़ा। इस बीच मुलायम सिंह ने दोबारा अमर सिंह को पार्टी में लेकर राज्यसभा भेजा तो फिर अमर पर परिवार में बिगाड़ के आरोप लगे और दोबारा उन्हें पार्टी से जाना पड़ा।

बच्चन अंबानी और दत्त परिवार में खटपट की कहानीः कभी बिग बी से अमर सिंह की इतनी नजदीकियां रहे कि वह बच्चन परिवार के पारिवारिक सदस्य कहलाने लगे थे। एक टीवी इंटरव्यू में अमिताब बच्चन ने कहा था-अगर अमर सिंह न होते तो शायद वह सड़क पर होते। दरअसल शुरुआती कुछ फिल्में फ्लॉप हो जाने के बाद अमिताभ बच्चन कर्ज में डूब गए थे।उनकी खुद की कंपनी बंद हो गई थी, बंगल बिकने की नौबत थी, तब कथित तौर पर अमर सिंह ने 10 करोड़ की मदद की थी, जिसके बाद फिर से अमिताभ की आर्थिक स्थिति पटरी पर आई। बच्चन परिवार से रिश्ते तब बिगड़ने शुरू हुए, जब 2010 में मुलायम सिंह ने अमर सिंह को पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाकर निकाल दिया। तब अमर को उम्मीद थी कि जया बच्चन भी उनके समर्थन में राज्यसभा सांसदी से इस्तीफा देंगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। अमर को इसलिए जया बच्चन पर भरोसा था क्योंकि उन्हीं की बदौलत जया को सपा से राज्यसभा का टिकट मिला था। उल्टे बच्चन परिवार ने अमर सिंह से दूरियां बना लीं। जिसके बाद बच्चन ने कई बार जयाप्रदा पर अमिताभ से रिश्तों पर दरार डालने का आरोप मढ़ा। तब से बिगड़े रिश्ते आज तक पटरी पर नहीं आ सके हैं। हाल मे जनवरी 2017 में अमर सिंह ने चौंकाने वाला बयान दिया था कि रिश्तों में खटास के चलते कुछ समय तक अमिताभ और जया बच्चन अलग-अलग रहते थे।

पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. मुरली देवड़ा एक बार अमर सिंह को लेकर कह चुके हैं-यह अन्जान बात है कि कैसे वह शख्स घरों को तोड़ता है। माना जाता है कि मुरली देवड़ा का इशारा अंबानी परिवार के विवाद में अमर सिंह की भूमिका को लेकर था। दरअसल 2002 में निधन से पहले धीरूभाई अंबानी ने कोई वसीयत नहीं लिखी थी। उनकी मौत के बाद कंपनियों के बंटवारे को लेकर विवाद हो गया। उस वक्त रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) का वार्षिक टर्नओवर करीब 80 हज़ार करोड़ था। मुकेश अंबानी चेयरमैन तो छोटे भाई अनिल वाइस चेयरमैन थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक उस समय मुकेश ने अनिल को कंपनी बोर्ड से बाहर करने की तैयारी की थी। इस बीच 18 नवंबर 2004 को एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान मुकेश अंबानी ने छोटे भाई अनिल अंबानी से बंटवारे को लेकर मतभेद होने की बात कहकर इस विवाद को सार्वजनिक कर दिया था।

तब अनिल अंबानी ने अपने हक के लिए तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह तक से गुहार लगाई थी। इस मामले में तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा का नाम जुड़ा था। अनिल अंबानी से अमर सिंह का काफी नजदीकियां थीं। अमर ने अनिल अंबानी को मुलायम के काफी नजदीक लाया था। उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी को यह बात पसंद नहीं थी। मुकेश का मानना था कि परदे के पीछे रहकर बिजनेस करना ज्यादा मुफीद है न कि किसी पार्टी की सरपरस्ती ओढ़कर। रिपोर्ट के मुताबिक अमर सिंह ने सपा के टिकट पर अनिल अंबानी को राज्यसभा जाने का ऑफर दिया था मगर अनिल इसके लिए तैयार नहीं हुए।
फिल्म स्टार सुनील दत्त पांच बार कांग्रेस के टिकट पर सांसद रहे। मगर उनके बेटे संजय दत्त को भी 2009 में अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता दिला दी। यहां तक 2009 में लखनऊ से लोकसभा का टिकट भी दिलाया, मगर कानूनी पचड़े में फंसे होने की वजह से बाद में संजय ने चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया। सपा से जुड़ाव पर उनकी बहन प्रिया दत्त से मतभेद की खबरें रहीं, जो बाद में पिता के निधन पर कांग्रेस से जुड़ीं। हालांकि फेमिली ब्रोकर होने की अपने ऊपर लगी तोहमत को अमर सिंह खारिज करते हैं। पिछले साल एबीपी न्यूज को दिए इंटरव्यू में उन्होंने इसका ठीकरा मीडिया पर फोड़ा था। उनका कहना है कि मीडिया हमेशा अंबानी, बच्चन और यादव परिवार में कलह का ठीकरा उन पर फोड़ती है, जबकि ऐसा है नहीं।
यूं हुए मुलायम के करीबः आजमगढ़ के रहने वाले अमर सिंह जवानी के दिनों में कोलकाता में बिजनेस सेक्टर से जुड़े। शेयर कारोबार से भी जुड़ने की बात कही जाती है। उस दौरान बिड़ला परिवार की नजर में आए। केके बिरला और भरतिया परिवार की कृपा पर वह हिंदुस्तान टाइम्स के बोर्ड में शामिल होने में सफल रहे। कोलकाता से दिल्ली आने के बाद अमर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस बीच माधव राव सिंधिया से रिश्ता प्रगाढ़ हुआ तो उन्होंने मध्य प्रदेश कोटे से अमर को कांग्रेस का सदस्य बनाया। बताते हैं कि जब देवगौड़ा प्रधानमंत्री थे, तब मुलायम से उनकी मित्रता थी, मगर रिश्तों के बीच भाषा की समस्या रोड़ा बन जाती थी। देवगौड़ा हिंदी और मुलायम अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे। ऐसे में किसी ने अमर सिंह को मुलायम से मिलवाया।  दोनों के बीच संवाद कायम कराने में अमर दुभाषिये की भूमिका निभाते थे।

धीरे-धीरे अमर इतने चहेते बने कि फिर मुलायम उन पर निर्भर हो गए। एक समय ऐसा आया जब सपा में अमर के चलते आजम खान, बेनी प्रसाद वर्मा जैसे दिग्गज किनारे हो गए थे। 1996 में पहली बार अमर सिंह राज्यसभा सांसद बनने में सफल रहे। जरूरत पड़ने पर राजनीतिक आकाओं के लिए कोई भी दांव चलकर  संकट से उबारने का काम अमर बखूबी करते हैं।  2008 का किस्सा कौन भूल सकता है। जब अमेरिका से न्यूक्लियर डील पर वामपंथी दलों के समर्थन वापसी से यूपीए की मनमोहन सरकार अल्पमत में आ गई थी, तब अमर सिंह ने सपा से समर्थन दिलवाकर सरकार गिरने से बचाई थी। हालांकि संसद में नोटों की गड्डियां लहराने वाली कैश फॉर वोट घटना के चलते अमर को तिहाड़ जेल भी जाना पड़ा। इसकी टीस अमर के सीने में आज भी है, कई मौकों पर कह चुके हैं-जिनकी सरकार बचाई, उन्होंने तो तिहाड़  की हवा खिलवा दी।

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