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वक्त की नब्जः कश्मीर में गलतियां

जगमोहन ने कश्मीर की पेचीदा राजनीतिक समस्या को सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या समझा, सो कश्मीर घाटी का हाल सुधरने के बदले बिगड़ता ही गया, यहां तक कि घाटी से पंडितों को पलयान करना पड़ा, क्योंकि आतंकवादी संगठनों ने उनको निशाना बनाया और उनकी हिफाजत राज्यपाल जगमोहन कर नहीं पाए।

Author May 6, 2018 00:14 am
पंडितों के पलायन को रोकने के लिए अगर सैनिक शासन भी लागू करना जरूरी था उस समय, तो लागू करना चाहिए था, लेकिन जगमोहन ने यहां सख्ती न दिखा कर सख्ती दिखाई उन चीजों में, जहां सख्ती जुल्म बन गई थी। (File photo)

कश्मीर की राजनीति को मैंने दशकों से बहुत करीब से देखा है और किसी जमाने में हमदर्दी भी रखी है उन लोगों के साथ, जो लोकतंत्र के लिए लड़ रहे थे, उसको ‘आजादी’ कह कर। झूठे चुनावों से जिस तरह कश्मीर के लोगों से लोकतंत्र के बुनियादी अधिकार छीन लिए गए थे कई दशकों के लिए, ऐसा अगर भारत के किसी दूसरे राज्य में होता तो बगावत वहां भी होती। लेकिन जबसे इस कश्मीर के आजादी आंदोलन में जिहादी सोच का जहर दिखने लगा है, मैंने कश्मीर पर लिखना तकरीबन छोड़ दिया है। कितनी बार आखिर कहा जा सकता है कि जिहादी सोच के लिए कोई जगह नहीं है भारत देश में?

इस हफ्ते सिर्फ इसलिए लिख रही हूं कश्मीर पर क्योंकि मैंने गलती से ट्विटर पर कुछ कश्मीर पंडितों और हिंदुत्ववादियों को नाराज किया यह कह कर कि मेरी नजर में कश्मीरी पंडितों के पलायन को जगमोहन रोक सकते थे, पर उसे रोकने में वे विफल रहे। वैसे तो कश्मीरी पंडित धीरे-धीरे कश्मीर छोड़ने लगे थे, जब आजादी आंदोलन ने हिंसक रूप धारण किया था 1987-88 के बाद, लेकिन बड़ी संख्या में अचानक कश्मीर घाटी से तब भागे हैं जनवरी 1990 के बाद, जब जगमोहन दुबारा जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल नियुक्त हुए।
मैंने जगमोहन पर दोष क्या डाला पंडितों की हिफाजत न करने का एक ट्वीट में कि गालियों का एक पहाड़ मेरे ऊपर टूट पड़ा। यहां तक कि देशद्रोह का भी आरोप लगाया गया मुझ पर। कश्मीरी पंडित पत्रकारों ने कई ट्वीट भेजे यह कहने के लिए कि पंडितों की नजर में जगमोहन उनके लिए मसीहा बन कर आए थे, वे राज्यपाल न नियुक्त किए जाते उस समय तो शायद कश्मीर भारत के हाथों से निकल गया होता। उस दौर की मैं चश्मदीद गवाह हूं, इसलिए अपना फर्ज मानती हूं, असलियत पर रोशनी डालना।

मेरा मानना है कि पंडितों के पलायन को रोकने के लिए अगर सैनिक शासन भी लागू करना जरूरी था उस समय, तो लागू करना चाहिए था, लेकिन जगमोहन ने यहां सख्ती न दिखा कर सख्ती दिखाई उन चीजों में, जहां सख्ती जुल्म बन गई थी। सो, राज्यपाल की शपथ लेते ही उन्होंने श्रीनगर के गवाकदल पुल के ऊपर निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया दोनों तरफ से, जिसमें अनुमान लगाया जाता है कि सौ से ज्यादा लोग झेलम नदी में गिर गए थे। जुलूस निकाल रहे थे ये लोग श्रीनगर की सर्दी में, बिजली के अभाव पर ध्यान आकर्षित करने के लिए।
इस घटना के बाद जगमोहन आम कश्मीरियों की नजर में खलनायक बन गए थे। इतनी नफरत फैल गई थी उनके नाम से कि कुछ ही महीने बाद उनको हटाना पड़ा। पद छोड़ने के बाद जगमोहन ने एक मोटी किताब लिखी, जो खूब बिकी और जिसमें गवाकदल पुल का जिक्र तक नहीं है। इस किताब के हीरो जगमोहन खुद हैं, सो जाहिर है कि जिन्होंने इस किताब को पढ़ा है, उनकी नजरों में जगमोहन हीरो ही हैं।

यथार्थ लेकिन कुछ और है। यथार्थ यह है कि कश्मीर में अशांति फैलाने का काम जिन राजनेताओं और अधिकारियों ने किया है, उस सूची में जगमोहन का नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। कश्मीर की राजनीतिक समस्या के दो हिस्से हैं। एक वह समस्या है जो 1947 में शुरू हुई थी और तब खत्म हुई, जब इंदिरा गांधी ने शेख अब्दुल्ला को अठारह वर्ष की नजरबंदी के बाद रिहा किया और उनके साथ सुलह करके उनको कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया 1975 में। दूसरी समस्या इंदिरा गांधी ने तब पैदा की जब फारूख अब्दुल्ला को हटा कर उनकी जगह उसके बहनोई गुल शाह को बिठाया। उस समय जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल इंदिरा जी के चचेरे भाई बीजू नेहरू थे और उन्होंने ऐसा करने से इंकार किया। सो, उनको हटा कर जगमोहन को लाया गया, जिन्होंने इमरजेंसी के दौरान साबित कर दिया था कि गांधी परिवार के वे वफादार सेवक हैं।

फारूख की लोकप्रियता दस गुना बढ़ी उनके साथ इस नाइंसाफी के बाद, और अगर 1987 वाले विधानसभा चुनाव में उन्होंने राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी के साथ चुनाव लड़ने का फैसला नहीं किया होता, तो आराम से जीत जाते दुबारा। जब कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस इकट्ठा हो गए, तो विपक्ष की खाली जगह में मुसलिम फ्रंट नाम का एक इस्लामी दल बन गया, जिसको हराना फारूख और राजीव ने जरूरी समझा। सो, इस चुनाव में धांधली हुई, जिसके द्वारा मुसलिम फ्रंट के सारे नुमाइंदे हार गए या हराए गए। हारने के बाद इनमें से कई सीमा पार गए और वापस लौटे हथियारबंद आतंकवादी बन कर।

फारूख अब्दुल्ला अपने इस दूसरे कार्यकाल में इतने अलोकप्रिय हो गए थे कि न ही बढ़ती हिंसा को रोक पाए और न ही बढ़ती जिहादी सोच को। सो, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने दिसंबर 1989 में, तब अराजकता इतनी फैल गई थी कि यासीन मलिक और उनके साथियों ने केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया को अगवा कर लिया था। रुबैया की रिहाई के बदले भारत सरकार ने कई कश्मीरी आतंकवादी रिहा किए।

इस गलती के बाद इस कमजोर सरकार की दूसरी गलती थी जगमोहन को राज्यपाल बना कर कश्मीर भेजना। जगमोहन ने कश्मीर की पेचीदा राजनीतिक समस्या को सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या समझा, सो कश्मीर घाटी का हाल सुधरने के बदले बिगड़ता ही गया, यहां तक कि घाटी से पंडितों को पलयान करना पड़ा, क्योंकि आतंकवादी संगठनों ने उनको निशाना बनाया और उनकी हिफाजत राज्यपाल जगमोहन कर नहीं पाए। अब आप ही फैसला करें कि इनको नायक कहा जाए या खलनायक। माना कि आज पाकिस्तान कश्मीर घाटी में जिहाद फैलाने का काम कर रहा है, लेकिन उस समय गलतियां हमारे अपने लोगों की ही थीं।

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