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भाषा से कैसी नफरत! ये तो मूर्खता है!!

जो विदेशी भाषा के शब्द बोलचाल की भाषा में आ गए हैं उन्हें नफरत में पड़ कर निकालना मूर्खता है।

तस्वीर का सांकेतिक प्रयोग किया गया है। एक्सप्रेस आर्काइव

जब मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज था तो एक वकील ने मेरे समक्ष एक याचिका प्रस्तुत की जिसका शीर्षक था प्रतिभू आवेदन पत्र। मैंने प्रतिभू शब्द का मतलब पूछा तो वकील साहेब ने कहा ज़मानत। मैंने कहा ज़मानत या बेल का अर्थ सब समझते हैं और इनका आम उपयोग होता है तो फिर एक कृत्रिम शब्द की क्या आवश्यकता?

हिंदी जनता की भाषा नहीं है। जनता की भाषा है खड़ीबोली या हिंदुस्तानी। आज़ादी के पहले उत्तरी भारत में सभी पढ़े-लिखे लोगों, चाहे हिन्दू, मुस्लिम हो या सिख, की भाषा उर्दू होती थी और आम आदमी की खड़ीबोली। अंग्रेज़ों ने अपनी बाँट करो और राज करो नीति के तहत यह झूठा प्रचार किया कि हिंदी हिन्दुओं की और उर्दू मुसलमानों की जुबां है।

हिंदुस्तानी और हिंदी में अंतर समझाने के लिए हम एक उदाहरण लेते हैं। हिंदुस्तानी में हम कहते हैं उधर देखिये I इसे हिंदी में कहेंगे उधर अवलोकन कीजिये। आम आदमी कभी अवलोकन शब्द नहीं कहेगा। इससे स्पष्ट है कि हिंदी आडंबर से भरी भाषा है, आम आदमी की नहीं।

बाँटो और राज करो की नीति 1857 के बग़ावत के बाद अंग्रेज़ों द्वारा भारत में लायी गयी I बग़ावत में हिन्दू-मुस्लिम साथ मिलकर अंग्रेज़ों से लड़े थे I उसे कुचलने के बाद अंग्रेज़ों ने तय किया कि भारत पर नियंत्रण का एक ही तरीक़ा है हिन्दू मुसलमानों को लड़वाना। उसी नीति के अंतर्गत यह झूठा प्रचार किया गया कि हिंदी हिन्दुओं की और उर्दू मुसलमानों की जुबां है। आज़ादी के बाद उर्दू को कुचलने का कुछ तत्वों द्वारा भरसक प्रयास किया गया, जो फ़ारसी या अरबी के शब्द बोलचाल में आ गए थे उन्हें नफरत से हटाया गया और उनकी जगह ह‍िंदी या संस्‍कृत के शब्द लाये गए। जैसे, जि‍ला को हटा कर जनपद शब्द लाया गया।

इस प्रकार एक ऐसी भाषा थोपी गई जो बोलना और समझना नक़ली भाषा बना दी गयी जिसे समझने में अक्सर कठिनाई होती है। कई हिंदी की क‍िताबें पढ़ना आम आदमी के लिए कठिन होता है। अदालत में हिंदी की कई सरकारी विज्ञप्तियों को समझना मैंने मुश्किल पाया।

यह ग़लतफहमी है कि विदेशी शब्द आने से देशी भाषा कमज़ोर हो जाती है। अंग्रेजी भाषा में अनेक फ्रेंच, जर्मन, अरबी और हिंदुस्तानी शब्द आए। इससे अंग्रेजी और शक्तिशाली हुई, कमज़ोर नहीं। इसी प्रकार हिंदुस्तानी में अरबी फ़ारसी और अन्य भाषाओँ के शब्द आये जिससे वह और शक्तिशाली हुई I इसलिए जो विदेशी भाषा के शब्द बोलचाल की भाषा में आ गए हैं उन्हें नफरत में पड़ कर निकालना मूर्खता है।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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