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‘क्रांति के बिना क्रांति चाहते हैं हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी’

हमारे राजनेता, जिन्हें जनता के हित का वास्तव में कोई ख्याल नहीं , सत्ता हासिल करने के लिए और धन अर्जित करने के लिए जाति और धर्म को आधार बनाकर नफरत फैलाने और समाज में ध्रुवीकरण करने के विशेषज्ञ हैं।

मार्कंडेय काटजू सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं। (photo by narendra Kumar)

भारत के तथाकथित बुद्धिजीवियों ने भारतीय संविधान में संसदीय लोकतंत्र के ढांचे के भीतर रहने को ही सामान्य राजनीति समझा है, लेकिन हर कोई जानता है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र काफी हद तक जातिगत और सांप्रदायिक वोट बैंक पर आधारित है। क्या यह ‘सामान्य राजनीति’ थी, जिसे 1950 में संविधान लागू होने के बाद भारत में प्रचलित किया जा रहा था? जिसके कारण भयंकर गरीबी, रिकॉर्ड बेरोजगारी, भयावह बाल कुपोषण का स्तर, 3 लाख से अधिक किसानों की आत्महत्याएं, स्वास्थ्य सुविधाओं औरअच्छी शिक्षा का अभाव, व्यापक भ्रष्टाचार आदि देखने को मिल रहा है।

हर राजनीतिक प्रणाली को कसौटी पर कसने का पैमाना एक और केवल एक है: क्या यह जनता के जीवन स्तर को ऊपर उठाता है?, क्या यह जनता को बेहतर जीवन देता है? तो यह सवाल पूछा जाना चाहिए (जो स्पष्ट पूछने में बुद्धिजीवी कतराते हैं) कि मोदी के 2014 में सत्ता में आने से पहले जो ‘सामान्य राजनीति’ चल रही थी, उसने क्या ऐसा किया?

हमारे राजनेता, जिन्हें जनता के हित का वास्तव में कोई ख्याल नहीं , सत्ता हासिल करने के लिए और धन अर्जित करने के लिए जाति और धर्म को आधार बनाकर नफरत फैलाने और समाज में ध्रुवीकरण करने के विशेषज्ञ हैं। जातिवाद और सांप्रदायिकता सामंती ताकतें हैं, जिन्हें अगर भारत को प्रगति करनी है, तो नष्ट करना होगा। लेकिन संसदीय लोकतंत्र उन्हें और मजबूत करता है। इसलिए यह स्पष्ट है कि देश की उन्नति के लिए संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली का विकल्प ढूंढ़ना होगा, जो भारत को प्रगति के रास्ते पर तेज़ी से ले जा सके।

लेकिन यह विकल्प संविधान के अंतर्गत नहीं है और केवल सार्वजनिक क्रांति से आ सकता है। दूसरे शब्दों में, इसे केवल उन देशभक्त और आधुनिक सोच वाले नेताओं के नेतृत्व में क्रांति द्वारा किया जा सकता है, जिनका उद्देश्य भारत का तेजी से औद्योगिकीकरण करना हो। जैसे तुर्की में कमाल मुस्तफा ने और जापानी नेता ने 1868 के मीजी बहाली (Meiji Restoration) के बाद किया।

लेकिन ’क्रांति’ शब्द ही हमारे तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ को हिला देता है, और वे इस से ऐसे दूर भागते हैं जैसे किसी महामारी से। वे चाहते हैं कि भारत का एक महान ऐतिहासिक परिवर्तन शांतिपूर्ण ढंग से हो, बिना उनके आरामदायक जीवन को किसी भी तरह हानि पहुंचाए । क्रांति शब्द फ़्रांसीसी क्रांति में सर काटने वाला तंत्र गिलोटिन (guillotine) की छवि को उजागर करता है, और वे इस संभावना से थरथराते हैं। वे इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि भारत में सारी प्रणाली सड़ गयी है , लेकिन वे कानूनी और शान्तिपूर्ण तरीके से इसका सुधार करना चाहते हैं।

जब 1789 के फ्रांसीसी क्रांति के दौरान महान फ्रांसीसी नेता रॉबस्पीयर (Robespierre) से पूछा गया कि उन्होंने लोगों के अवैध कृत्यों को क्यों उचित ठहराया, तो उन्होंने कहा था, “मान्यवर यह क्रांति अवैध है, बैस्टिल (Bastille) किले का विनाश अवैध था, राजा की गर्दन काटना अवैध था। क्या आप बिना क्रांति के क्रांति चाहते हैं?”

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं और यहां व्‍यक्‍त विचार उनके निजी हैं।)

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