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‘एक कश्मीरी राजा और उसका  न्याय’

जस्टिस गुप्ता ने अपने भाषण में कहा था कि भारतीय न्यायिक प्रणाली आज गरीबों के खिलाफ और अमीरों की पक्षधर हो गयी है। जबकि वास्तव में न्यायिक प्रणाली इसकी उलटी होनी चाहिए गरीबों के पक्ष में, क्योंकि सुरक्षा की आवश्यकता गरीबों को है अमीरों को नहीं।

मार्कंडेय काटजू सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं। (photo by narendra Kumar)

जस्टिस दीपक गुप्ता, जो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए हैं, उन्होंनें अपने विदाई भाषण  में कहा कि भारतीय न्यायिक प्रणाली आज गरीबों के खिलाफ और अमीरों की पक्षधर हो गयी है। जबकि वास्तव में न्यायिक प्रणाली इसकी उलटी  होनी  चाहिए  गरीबों के  पक्ष में, क्योंकि सुरक्षा की आवश्यकता गरीबों को है अमीरों को नहीं। इस संबंध में, मैं कश्मीरी इतिहासकार कल्हण द्वारा प्रसिद्ध बारहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ, ‘राजतरंगिणी’ में सुनाई गई एक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख कर रहा हूं- इसमें बताया गया है कि कैसे एक कश्मीरी राजा चंद्रपीड ने अपने ही अधिकारीयों से एक ग़रीब चर्मकार (मोची) की रक्षा की ।

राजा के अधिकारियों ने एक भूमि पर भगवान त्रिभुवनस्वामी का मंदिर बनाने की योजना बनाई थी, जिसके एक हिस्से पर मोची की झोपड़ी स्थित थी। अधिकारियों के आदेश के बावजूद मोची ने अपनी झोपड़ी हटाने से इनकार कर दिया। जब अधिकारियों ने राजा को मोची की अशिष्टता की शिकायत की, तो उसने झोपड़ी को ढहाने का आदेश देने के बजाय, अधिकारियों को मोची की जमीन पर अतिक्रमण करने की कोशिश करने के लिए फटकार लगाई। राजा ने उनसे कहा:

नियम्यताम् विनिर्माणं यद् अन्यत्र विधीयताम्
परभूमि अपहरण सुकृतं कः कलंकेत
ये द्रष्टारः सदसताम् ते धर्म विनुगणा क्रियाः
वयमेव विदधमश्चेत यातु न्यायेण को अघ्वना

अर्थात, “निर्माण बंद करो, या कहीं और मंदिर बनाओ! अवैध रूप से एक व्यक्ति को अपनी भूमि से वंचित कर, कोई भी किस तरह मंदिर निर्माण जैसा पवित्र कार्य कर सकता है? न्यायाधिपति होते हुए, सही या गलत का आधार स्थापित करने वाले, यदि हम ही गैरकानूनी कार्य करेंगे, तो फिर कानून का पालन कौन करेगा? (राजतरंगिणी, अध्याय 4, पृष्ठ 59-60)

राजा के न्याय की भावना से अभिभूत, मोची ने उनसे मिलने की मांग की और जब उसे राजा के सामने लाया गया तो उसने कहा: “जो महत्व यह महल आपके लिए रखता है, मेरी कुटिया भी मेरे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है। मैं उसके नष्ट हो जाने का विचार सहन न कर सका। फिर भी यदि आप भूमि मांगेंगे, तो मैं आपके सदाचारी व्यवहार के कारण इसे छोड़ दूंगा। तब  राजा ने  उचित  मुआवज़ा देकर उस भूमि को  खरीदा।  मोची ने फिर हाथ जोड़कर राजा से कहा:

राजधर्म अनुरोधेन पर्वत्ता तयोचिता
स्वस्ति तुभ्यं चिरं स्थेया धर्म्या वृत्तांत पद्धति
दर्शयन् ईदृशीह श्रद्धा श्रद्धेया धर्मचारिणाम

अर्थात: “राजधर्म के सिद्धांतों का पालन करते हुए, दूसरों की उन्नति के लिए सोचना, एक राजा के लिए उपयुक्त व्यवहार है। मैं आपके सुखद जीवन की कामना करता हूँ। आप कानून के वर्चस्व बनाए रखते हुए दीर्घायु हों।” (राजतरंगिणी अध्याय 4, पीपी। 75-77)

इस प्रकार, एक न्यायी राजा के अधीन कानून की सर्वोच्चता बरकरार रही और कमजोर (मोची) शक्तिशाली (राजा के अधिकारियों) पर हावी रहा। शायद राजा चंद्रपीड का उदाहरण जस्टिस दीपक गुप्ता के मन में चल रही बात दर्शाता है और यह बताता है कि एक सच्चे न्यायाधीश को कैसा होना चाहिए।

(लेखक मार्कंडेय काटजू सूप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं और इस ब्लॉग में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

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