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जेएनयू विवाद पर बेबाक बोल: द्रोह-काल

अब तक जेएनयू में वामपंथियों का बोलबाला रहा है, और दक्षिणपंथी विचारधारा वहां अघोषित रूप से प्रतिबंधित ही रही है।

Author नई दिल्ली | February 20, 2016 1:07 AM
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर पुलिस का पहरा।

एक पखवाड़े पहले हमने इसी कॉलम में बात की थी रोहित वेमुला के साथ हुई सामाजिक और राजनीतिक नाइंसाफी की और पैरोकारी की थी एक ऐसे समाज की जहां हर किसी को अपनी बात कहने की और बराबरी के साथ जीने की आजादी हो। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद हैदराबाद से दूर दिल्ली के दिल जेएनयू में नारा लगता है – ‘कश्मीर की आजादी और भारत की बर्बादी’, ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिंदा हैं’, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’।

अब यह भारत के लोकतांत्रिक जमीन पर मिली संवैधानिक अभिव्यक्ति की आजादी की खूबसूरती ही है कि आप यह नारा लगाएं भी और उसका दंड भी भुगतना न चाहें। और तो और आपके राजनीतिक अलंबरदार इसके बावजूद आपके साथ खड़े हों और इसी अभिव्यक्ति की आजादी का दम भरते हुए आपको साफ निकाल लेना चाहते हों। छात्रों का जोश समझ में आने वाली बात है लेकिन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू की इस बात में भी दम है कि जेएनयू में पढ़ने वाले बच्चे नहीं हैं, वे परिपक्व छात्र हैं जो उच्च शिक्षा की राह पर चल रहे हैं। सच यह भी है कि यहां पढ़ाने वाले भी कोई बच्चे नहीं हैं वे भी देश की विचारधारा के पोषक और उसे दिशा प्रदान करने वाले हैं। तो फिर यहीं पर यह सब क्यों?

ज्यादा पुरानी बात नहीं है। हाल ही में पाकिस्तान में भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली के एक दीवाने ने उसके प्रदर्शन से खुश होकर अपने घर के ऊपर भारत का झंडा फहरा दिया। पाकिस्तानी हुकूमत तो उसके खिलाफ ऐसे खड़ी हो गई जैसे एकमात्र यही व्यक्ति विशेष तख्तापलट ही कर देगा। महज एक व्यक्ति विशेष जो कि एक दूसरे देश का नागरिक है, के प्रति ऐसी दीवानगी के लिए हो सकता है कि इस व्यक्ति को दस साल तक जेल में सड़ना पड़े। इसके विपरीत भारत में कोई भी क्रिकेट के मैदान में पाकिस्तान का झंडा लहरा देता है। कश्मीर में तो आलम यह है कि गली-कूचे में हुई सभा में भारत विरोधी नारे लगते हैं और तिरंगा जलाया जाता है। चिंता यह है कि मौजूदा सरकार में शैक्षणिक संस्थानों में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो होता है या जो हो रहा है वह छात्रों व शिक्षकों की अभिव्यक्ति और विरोध के अधिकार तक ही महदूद होता तो शायद कोई विवाद भी न उठता। लेकिन सच यह है कि देश में लगभग मुफ्त उच्च शिक्षा के प्रतीक इस विश्वविद्यालय में हाल ही में जो हुआ उसे अभिव्यक्ति की आजादी मान कर ही नहीं बख्शा जा सकता। यही वजह है कि विवाद के बाद परिसर में जाकर माकपा अध्यक्ष सीताराम येचुरी ने छात्रों के समर्थन में आवाज तो उठाई लेकिन यह साफ भी किया कि देशद्रोह को कोई न्यायोचित नहीं ठहरा सकता और उसके दोषियों के खिलाफ तो कार्रवाई होनी ही चाहिए। जाहिर है कि ऐसे ही सुर बाकी सबके भी हैं। लेकिन कहीं भी आग जल रही हो और सभी राजनीतिक दल उस पर अपनी रोटियां सेंकने के लिए न निकलें यह तो हो ही नहीं सकता। लिहाजा जेएनयू भी राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप का अड्डा बन गया।

सभी दल एक-दूसरे पर हमलावर हुए। परिसर का रुख किया और अपने-अपने तरीके से आग में घी डाला। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ही देखिए। मामले में पुलिस केस दर्ज हो चुका, गिरफ्तारी हो चुकी, मामला न्यायालय तक पहुंच गया, उस पर न्यायालय ने अपनी तल्ख टिप्पणी भी कर दी, फिर भी मजिस्ट्रेटी जांच का आदेश जारी कर दिया। यह दीगर है कि यह सब उनकी कम्युनिस्ट नेताओं के साथ बैठक के बाद हुआ। देश के शिक्षण संस्थानों व छात्र और शिक्षक संगठनों पर वामपंथियों की पैठ रही है। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों के बाद हालात बदल गए। यही वजह है कि जेएनयू का विवाद जो आम हालात में उतना न भी भड़कता, हाथ से निकलता हुआ दिखाई दिया। यहां अब लड़ाई भाजपा और पहले वामपंथियों और फिर बाकी तमाम दलों में बंटती हुई नजर आ रही है।

अब तक जेएनयू में वामपंथियों का बोलबाला रहा है, और दक्षिणपंथी विचारधारा वहां अघोषित रूप से प्रतिबंधित ही रही है। अब तक किसी न किसी तरह से देश में कांग्रेस का एकछत्र शासन रहा है और कांग्रेस वैचारिक रूप से वामपंथियों पर निर्भर रही है। और, अब जब केंद्र में राजग नीत सरकार है तो वह शैक्षणिक परिसरों में वामंथी एजंडे को क्यों कबूल करेगी?

जेएनयू इससे पहले भी विवादों में रहा है। अफजल गुरु के समर्थन में प्रदर्शन हों या फिर बीफ पार्टी की योजना, यह सब इस परिसर को विवादों में लाते ही रहे हैं। और अब खुलेआम ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी’ , ‘इंडिया गो बैक, गो बैक’, ‘अजफजल तेरे खून से इनकलाब आएगा, आएगा’ जैसे नारे लगे। क्या ये नारे वामपंथी पार्टियों के एक-दूसरे पर हावी होने की चाह का नतीजा थे। एक शैक्षणिक परिसर में ‘औसत सोच’ वाली भीड़ के बीच आप किस आधार पर कश्मीर और अफजल गुरु पर बहस छेड़ देते हैं। क्या वह भीड़ उस गंभीरता को समझने लायक थी। और इस ‘बौद्धिक केंद्र’ से निकले नारे जब दूर-दराज में बैठे आम लोगों तक पहुंचे तो क्या आम जनता उस ‘बौद्धिक संदर्भ’ को समझेगी?

वामपंथी दलों के बीच अस्मितावादी उभार के बीच विचारों का जो भटकाव आया है, वह उसे कमजोर ही करेगा। क्या देश में सब लोगों के बीच रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा की बुनियादी जरूरतों का मसला हल हो गया है जो वे एक चौपालनुमा सभा में अफजल को फांसी देने पर बहस करने बैठ जाते हैं। सर्वहारा की बहस पर अफजल का मामला कैसे हावी हो गया? आप राज्य के हर फैसले के खिलाफ प्रतिक्रियावादी बनकर हल्ला मचाएंगे तो जनता के बीच अप्रासंगिक हो जाएंगे और सिर्फ अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में तालियां ही बटोर पाएंगे।

आखिर कानून का खौफ न हो तो किसी भी समाज में बचता ही क्या है सिवा अराजकता के। ऐसे में उसके हनन की ऐसी कोशिश भी क्यों हो? लेकिन यह कोशिश चारों तरफ से हो रही है। केंद्र में प्रचंड बहुमत से काबिज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के बनने के बाद उनकी पार्टी ने शिक्षा के भगवाकरण पर जोर दिया। संविधान से ज्यादा गीता की बात होने लगी। केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने श्रीमद्भगवद गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग कर दी और मनोहर लाल खट्टर की अगुआई में बनी हरियाणा की ‘स्वयंसेवक सरकार’ के अति उत्साही मंत्री रामबिलास शर्मा ने गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया। हरियाणा में शिक्षा का भावी रंग-रूप तय करने की जिम्मेदारी भगवा शिक्षा के प्रबल समर्थक दीनानाथ बतरा को सौंप दी।

स्कूलों में नैतिक शिक्षा पर शायद ही किसी को एतराज हो लेकिन धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक शिक्षा की स्वीकायर्ता पर जोर क्यों दिया जा रहा है। इसके लिए मदरसों की तर्ज पर धार्मिक संस्थान हो और जो कोई भी उनमें पढ़ना चाहे वह स्वतंत्र हो। लेकिन इसकी अनिवार्यता पर बहस भी तो वाजिब है। और हां, इसके प्रतिकार का यह तरीका भी नहीं कि स्कूलों, कालेजों व विश्वविद्यालयों के परिसरों को देश के खिलाफ ही खड़ा करने की कोशिश हो। इतिहास के पन्नों पर जेएनयू वामपंथी व नक्सल विचारधारा के गढ़ के रूप में तो दर्ज है ही। और इस बात से भी इनकार नहीं है कि वामपंथ ने भारत में ऐसा मजबूत विपक्ष तैयार करने में हमेशा मदद की है जिससे कि सत्ताधारी दल निरंकुश न हो। लेकिन अब जब विपक्ष के मुंह से ही राष्ट्रविरोधी बोल निकलेंगे तो फिर हम सरकार की निरंकुशता पर सवाल कैसे उठाएंगे। लोकतंत्र की नीति भी यही है कि विपक्ष को सरकार से ज्यादा जिम्मेदार होना और दिखना पड़ता है।

देश के बहुत से विश्वविद्यालयों को यह फख्र हासिल है कि उन्होंने कई राष्ट्रीय नेताओं को जन्म दिया और ये सब किसी एक खास पार्टी के न होकर सभी पार्टियों के रहे। इन सब नेताओं ने देश के विकास और नीति निर्धारण में अहम योगदान भी दिया और दे रहे हैं। आज भी सरकार और सार्वजनिक जगहों पर जेएनयू के विद्यार्थी रहे लोग अहम जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं, और जेएनयू से जुड़ा होने के कारण उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी है। लेकिन यह तभी संभव हो पाया जबकि उन सबकी राजनीति की दिशा तय की। दिशाहीन या सिरे से गलत दिशा की ओर अग्रसर राजनीति हमें कानून के दायरे से बाहर कर देती है और कानून के दायरे से जो बाहर है, वह समाज के दायरे से बाहर होगा ही। कहना न होगा कि जेएनयू में भी यही हुआ। उसके बाद जो हो रहा है वह महज एक स्वाभाविक प्रक्रिया ही है कि सभी दलों के नेता वहां पहुंच कर अपने हित साधने में जुटे हैं। यह अलग बात है कि सबको वहां एक-दूसरे का जाना गलत महसूस हो रहा है।

सभी राजनीतिक दल चाहते हैं कि उनकी पार्टी कालेजों और विश्वविद्यालयों में अंकुरित हो। ऐसा न होता तो अभी नन्ही किलकारियां मार रही आम आदमी पार्टी दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में अपनी पूरी ताकत न झोंक देती। खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल अपने लाव-लश्कर के साथ वहां प्रचार के लिए पहुंचे। इसके साथ ही केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार होने के कारण विश्वविद्यालयी परिसरों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ‘अच्छे दिन’ आ ही गए हैं।

एक पखवाड़े पहले भी हमने कहा कि विश्वविद्यालय परिसरों की खूबसूरती ही वहां के वैचारिक मतभेद हैं। इसी विश्वविद्यालय से हमें सीताराम येचुरी भी मिलते हैं तो अरुण जेटली भी। और भारत जैसे देश में घर-आंगन-बैठकी तक देश की राजनीति से प्रभावित होते हैं तो फिर हम यह उम्मीद कर भी नहीं सकते कि राजनीति शैक्षणिक परिसरों की चौहद्दी न लांघे। छात्रों में राजनीति और विश्वविद्यालयों के प्रबुद्ध वर्ग का भी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित होना कुछ गलत नहीं। जो गलत है, वह है इसका दिशाभ्रम जो पार्टी के आधार पर किया जाता है। प्रबुद्ध वर्ग के लिए यह आवश्यक है कि वह देश की राजनीति को दिशा दे। लेकिन अपनी विचारधारा के प्रचार की होड़ में देश के प्रति अपनी भूमिका को भी लेकर सचेत रहे। राष्ट्र भक्ति और राष्ट्रदोह को बांटने वाली एक महीन सी रेखा होती है जिसके आरपार देखने के भयानक परिणाम हो सकते हैं जो जेएनयू में हुआ भी।

यहां सवाल एक व्यक्ति विशेष कन्हैया का नहीं वरन एक विचारधारा का है। स्वतंत्र भारत में क्या अलगाव पैदा करने वाली ऐसी विचारधारा का स्थान हो सकता है? सरकार ने जेएनयू में जो हड़बड़ी में फैसले किए उनसे कन्हैया तो एक नायक की सी स्थिति में आ गए। लेकिन क्या ऐसे नायकत्व का (यानी अगर यह सच है कि उन्होंने नारे लगाए) का कोई औचित्य है। एक संप्रभु व धर्मनिरपेक्ष देश के विश्वविद्यालय कई आजाद लबों और विचारधाराओं का संगम होते हैं। लेकिन उसका इजहार क्या वैसा होना चाहिए जैसा कि जेएनयू में हुआ। देश के विरोध में नारा चाहे कोई लगाए किसी भी पार्टी या संगठन से जुड़ा व्यक्ति लगाए वह किसी को भी मान्य नहीं होगा। जेएनयू के विवाद को भी इसी नजरिए से देखना होगा। यह मसला अब न्यायालय में है। लिहाजा इस पर शांति से इंसाफ का इंतजार करना चाहिए न कि इसे भड़का कर हित साधने की कोशिश करनी चाहिए। और, अभी जिस तरह से गली-मोहल्लों में छुटभैए नेताओं के बीच ‘राष्ट्रदोह’ को लेकर फसाद शुरू हो गए हैं, उससे सरकार और उसके समर्थकों को यह सबक भी सीखना है कि ‘राष्ट्रदोह’ को इतना हल्का जुमला न बना दिया जाए कि यह आम गाली-गलौच और चुटकुलों का हिस्सा बन कर रह जाए।

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