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गलत‍ियों से सीखना जानते हैं जेएनयू के वामपंथी, इसल‍िए लहराया परचम; राष्‍ट्रीय नेता नहीं लेते सबक

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में लेफ्ट पार्टियों ने अपना साझा उम्मीदवार मैदान में उताकर आसानी से चारों सीटों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव) पर जीत हासिल की।

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में वाम की जीत के बाद खुशी मनाते छात्र। (फोटो सोर्स अमित मेहरा)

(अंशुल त्रिवेदी)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में लेफ्ट पार्टियों ने अपना साझा उम्मीदवार मैदान में उताकर आसानी से चारों सीटों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव) पर जीत हासिल की। भाजपा-आरएसएस नीत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के उम्मीदवार चुनाव में ज्यादातर सीटों पर दूसरे स्थान पर रहे। जबकि बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन (बीएपीएसए) के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे। हालांकि यहां चुनावों के परिणामों का अर्थ समझने के लिए वाम और प्रगतिशील ताकतों की अनूठी संस्कृति को समझना चाहिए। जिनका प्रभुत्व लंबे समय से छात्र राजनीति में बना हुआ है।

यहां राजनीति की अलग ही संस्कृति है-
जेएनयू भारत के उन चुनिंदा विश्वविद्यालयों में से एक है जहां बिना पैसे और मसल पॉवर के उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं। जेएनयू की राजनीतिक संस्कृति बिना भय के प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने की पूरी आजादी देती है। मोहम्मद फारुख इसका जीता जागता उदाहरण हैं। जिन्होंने शारीरिक रूप से विक्लांग होते हुए अध्यक्ष पद का निर्दलीय चुनाव लड़ा। उन्होंने सालों से छात्र राजनीति कर रहीं पार्टियों के उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दी। चुनाव में फारुख ने 419 वोट हासिल किए। यहां भय मुक्त अभिव्यक्ति की आजादी 9 फरवरी, 2016 की विवादित घटना को भी याद दिलाती है जहां कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए गए। इस दौरान कई छात्रों को जेल भी जाना पड़ा।  इसमें तब के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार भी शामिल थे। लेकिन छात्रों के बीच कोई हिंसा की खबर सामने नहीं आई। इस घटना के बाद वाम दलों ने अपनी गलतियों से बहुत कुछ सीखा। और एक बार फिर अपनी मजबूत स्थिति बनाकर चुनावी मैदान में उतरे।

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वामपंथ का निरंतर बोलबाला-
अपनी स्थापना के बाद से ही जेएनयू की छात्र राजनीति मूल रूप से वैचारिक रही है। और लेफ्ट पार्टियों का शुरू से ही यहां कब्जा रहा है। जेएनयू लगातार राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर विकास को प्रभावित करता रहा है। यहां राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों ने कई बार वाम को हाशिए पर लाने की कोशिश की लेकिन ये पार्टियां अबतक नाकाम होती ही नजर आई हैं। यहां साल 1975 के आपातकाल, बाबरी मस्जिद, मंडल कमिशन के आंदोलन के ध्वस्त होने के बाद काफी विचार मंथन हुआ, जिन्हें वाम दलों ने चुनौती दी थी। साल 1990 में एनडीए शासन के दौरान एबीवीपी वाम विरोधी ताकत के रूप में उभकर सामने आया। यहां तक ये अध्यक्ष पद को भी जीतने में कामयाब रहा। लेकिन लंबे समय तक वह अपनी मजबूत स्थिति नहीं बनाकर ना रख सका।

वर्तमान में जेएनयू के हालात-
एक तरफ जहां देशभर में हिंदुत्व लहर चल रही है जो लगातार ताकतवर हो रही है। 9 फरवरी, 2016 की घटना के बाद तो माना गया कि विश्वविद्यालय में सरकार से प्रेरित विचारधारा के लोग विश्वविद्यालय में ताला लगवाना चाहते है। ऐसे माहौल में एबीवीपी ने तेजी से अपनी स्थिति मजबूत करना शुरू कर दी। और वाम दलों की वैचारों के खिलाफ बड़ी चुनौती पेश की। लेकिन एक बार फिर लेफ्ट ने चुनाव में अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई। और चारों प्रमुख सीटों पर जीत दर्ज कराई।

 

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