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नागरिकता संशोधन विधेयक: कितनी है हकीकत और कैसे-कैसे हैं सवाल

मौजूदा कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है।

Author Updated: December 10, 2019 3:30 AM
मौजूदा कानून के तहत भारत में अवैध तरीके से दाखिल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है।

नागरिकता (संशोधन) विधेयक को सोमवार को लोकसभा में पेश किया गया। इसके जरिए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता दी जा सकेगी। पूर्वोत्तर में चल रहे विरोध के कारण इस विधेयक का संशोधित मसविदा रखा गया। केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय को पूर्ण रूप से और असम एवं त्रिपुरा के कुछ हिस्सों को इस विधेयक से बाहर रखा है। मणिपुर के सरकार ने विशेष प्रावधानों का ऐलान किया है।

क्या है संशोधन विधेयक: इस विधेयक में बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव है। मौजूदा कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है। इस विधेयक में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर छह साल कर दी गई है। इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में कुछ संशोधन किए जाएंगे, ताकि लोगों को नागरिकता देने के लिए उनकी कानूनी मदद की जा सके। मौजूदा कानून के तहत भारत में अवैध तरीके से दाखिल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान है।

क्या है नागरिकता अधिनियम, 1955: नागरिकता अधिनियम, 1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा एक विस्तृत कानून है। इसमें बताया गया है कि किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता कैसे दी जा सकती है और भारतीय नागरिक होने के जरूरी शर्तें क्या हैं? नागरिकता अधिनियम में अब तक पांच बार (1986, 1992, 2003, 2005 और 2015) संशोधन किया जा चुका है। भारतीय नागरिकता तीन आधार पर खत्म हो सकती है- अगर कोई स्वेच्छा से भारतीय नागरिकता छोड़ दे, अगर कोई किसी दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर ले, अगर सरकार किसी की नागरिकता छीन ले।

अवैध प्रवासी और उनके लिए प्रावधान:नागरिकता कानून, 1955 के मुताबिक अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती है। अवैध प्रवासियों को या तो जेल में रखा जा सकता है या फिर विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के तहत वापस उनके देश भेजा जा सकता है। लेकिन केंद्र सरकार ने साल 2015 और 2016 में उपरोक्त 1946 और 1920 के कानूनों में संशोधन करके अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को छूट दे दी है। यह छूट उपरोक्त धार्मिक समूह के उनलोगों को प्राप्त है जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत पहुंचे हैं।

भारत आने वाले शरणार्थी: धार्मिक आधार पर भारत के पड़ोसी तीन देशों- पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से लोग पलायन कर यहां आते रहे हैं। पाकिस्तान के अखबार डॉन ने पाकिस्तान सरकार के आंकड़े छापे हैं कि वहां करीब पांच हजार हिंदू परिवार हर साल भागकर भारत पहुंचते हैं। आमतौर पर ये शरणार्थी राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश में शरण लेते हैं। वर्ष 2018 में भारत सरकार ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान से आए 12,732 मुसलमानों और सिखों को नागरिकता दी। इससे पहले 2017 में 4712 को शरण दी गई। 2016 में 2298 हिंदू और सिख शरणार्थियों को शरण मिली। केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 83,438 बांग्लादेशी नागरिक शरणार्थी बनकर रह रहे हैं। इनके अलावा एक लाख से ज्यादा श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी भारत में रह रहे हैं। मोटे तौर पर माना जा रहा है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से करीब दो लाख हिंदू और सिख शरणार्थी भारत में रह रहे हैं। केंद्र की मौजूदा सरकार ने पिछले साल मई में इन शरणार्थियों के लिए लॉन्ग टर्म वीजा (एलटीवी) जारी करने सहित कई कदम उठाए।

पूर्वोत्तर के राज्यों का मामला: नागरिकता संशोधन विधेयक के मसविदे में कहा गया है, असम, मेघालय, मिजोरम या त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों में इस अनुच्छेद के प्रावधान लागू नहीं होंगे। इन इलाकों संविधान की छठी अनुसूची और ‘द इंटर लाइन परमिट’ (आइएलपी) के प्रावधान लागू हैं। इन प्रावधानों को बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्युलेशन, 1873 के तहत अधिसूचित किया गया था। आइएलपी प्रणाली अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम में लागू। नगालैंड का दीमापुर शहर आइएलपी में नहीं है। आइएलपी के तहत अन्य राज्यों के लोगों को यहां के इलाकों में जाने के लिए विशेष परमिट की जरूरत होगी।

दीपक रस्तोगी 

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