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जेएनयू के वैज्ञानिक पता लगाएंगे कैसे बनते-पिघलते हैं उत्तरी ध्रुव के ग्लेशियर

इस शोध से न सिर्फ ग्लेशियर के बनने और पिछलने के कारणों का पता लगाया जा सकेगा बल्कि बाढ़ या बादल फटने जैसी घटनाओं के बारे में नए आंकड़ों के मिलने की भी उम्मीदें हैं।

Author Published on: October 29, 2019 6:09 AM
ऐसा पहली बार हुआ है जब उत्तरी ध्रुव की वाष्प भारत लाकर उस पर शोध किया जाएगा। (सांकेतिक तस्वीर)

पहली बार देश में उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक) की वाष्प पर शोध होगा। इस वाष्प के जरिए वैज्ञानिक यह पता लगाएंगे कि ग्लेशियर कैसे बनते और पिछलते हैं। इसका श्रेय जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के दो वैज्ञानिकों को जाता है। इसमें एक वैज्ञानिक का नाम डॉ श्याम रंजन है, जो आर्कटिक की वाष्प शीशी में भरकर भारत लेकर आए हैं।

दरअसल देश की पांच संस्थानों से वैज्ञानिकों के नौ सदस्यीय दल को उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक) भेजा गया था। इस दल में दो वैज्ञानिक जेएनयू के थे। यह दल जब पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक) के ग्लेशियर पर पहुंचा तो डॉ श्याम रंजन ने एक शीशी में वाष्प को भर लिया। हाल में ही यह दल उत्तरी ध्रुव से भारत लौटा है। दल के पास आर्कटिक के ग्लेशियर की वाष्प होने का पता चला। ऐसा पहली बार हुआ है जब उत्तरी ध्रुव की वाष्प भारत लाकर उस पर शोध किया जाएगा।

इस शोध से न सिर्फ ग्लेशियर के बनने और पिछलने के कारणों का पता लगाया जा सकेगा बल्कि बाढ़ या बादल फटने जैसी घटनाओं के बारे में नए आंकड़ों के मिलने की भी उम्मीदें हैं। हर साल देश में बाढ़ और बादल फटने से हजारों लोगों की जान चली जाती है, ऐसे में वाष्प के अध्ययन से इस दिशा मेंं महत्त्वपूर्ण जानकारी के पता चलने की भी उम्मीद है। यह शोध नवंबर के पहले हफ्ते से शुरू हो जाएगा और जल्द ही अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन के लिए भेजा जाएगा।

एक साक्षात्कार के दौरान जेएनयू के वैज्ञानिक डॉ. श्याम रंजन और शोधार्थी नवीन कुमार ने बताया कि ‘वैज्ञानिकों ने 33 दिन उत्तरी ध्रुव के वेस्त्रेब्रोगेन और फेर्रिबग्रीन ग्लेशियर पर बिताए। यहां हमारी टीम ने वाष्प एकत्रित किया और भारत लाए। उम्मीद है कि इससे हमें ग्लेशियर बनने और पिघलने के नए कारणों की जानकारी मिलेगी।’

उत्तरी ध्रुव वह बिंदु है, जहां पर पृथ्वी की धुरी घूमती है। यह आर्कटिक महासागर में पड़ता है। यहां करीब छह महीने सूरज का प्रकाश नहीं पहुंचता है। ध्रुव के आसपास का महासागर बहुत ठंडा है। यह हमेशा बर्फ की मोटी चादर से ढंका रहता है।

महासागरों और पृथ्वी की बफीर्ली जमीन के बारे में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आइपीसीसी) की आगामी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 और उसके पीछे के एक दशक में ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक में बर्फ की चादर करीब हर साल 400 अरब टन कम हुई है। इसके नतीजे में महासागरों का तल हर साल करीब 1.2 मिलीमीटर बढ़ा है और पहाड़ों के ग्लेशियर ने हर साल करीब 280 अरब टन बर्फ खोई है और जो 0.77 मिलीमीटर समुद्र तल हर साल बढ़ने के लिए जिम्मेदार है। पृथ्वी पर करीब 200,000 ग्लेशियर हैं, जो प्राचीन काल से ही पृथ्वी पर बर्फ का एक विशाल भंडार हैं। ध्रुवीय इलाके के बर्फ के चादर की तुलना में छोटा होने के कारण उन पर तापमान के बढ़ने का ज्यादा असर होता है।

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