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जनसत्ता संवाद: ड्रोन से बन रहा देश का डिजिटल नक्शा

फिलहाल सर्वे ऑफ इंडिया के 2500 से ज्यादा भू-नियंत्रण केंद्र हैं, जिनसे आंकड़े लेकर नक्शा खींचा जाता है।

देश का मौजूदा नक्शा ब्रिटिश सर्वेयर कर्नल जॉर्ज एवरेस्ट ने 1 मई 1830 को बनाया था।

सर्वे ऑफ इंडिया’ नवीनतम तकनीक की मदद से भारत का डिजिटल नक्शा बनाने की तैयारी में है। यह काम ड्रोन की मदद से किया जाएगा। इसमें जितने आंकड़े आसमान से जुटाए जाएंगे, उतने ही जमीन पर भी जमा किए जाएंगे। भारत सरकार का विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग डिजिटल मैपिंग की परियोजना में में दो साल तक सर्वे ऑफ इंडिया की मदद करेगा।

शुरुआती दौर का काम महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा में शुरू किया गया है। इसके लिए तीन डिजिटल केंद्र बनाए गए हैं। यहां से पूरे देश का भौगोलिक डिजिटल डेटा बनाया जाएगा। राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते संवेदनशील स्थानों का नक्शा नहीं बनाया जाएगा। सर्वे ऑफ इंडिया का कहना है कि यह नक्शा 10 सेंटीमीटर तक की सटीक पहचान सुनिश्चित करेगा। फिलहाल सर्वे ऑफ इंडिया के 2500 से ज्यादा भू-नियंत्रण केंद्र हैं, जिनसे आंकड़े लेकर नक्शा खींचा जाता है। ऐसे केंद्र देश में हर 30 से 40 किमी के दायरे में समान रूप से बांटे गए हैं।

डिजिटल नक्शा बनाने के लिए कोर्स (सीओआरएस) प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके जरिए चंद सेंटीमीटर की निश्चितता से तत्काल ऑनलाइन 3डी पोजिशनिंग निर्धारित की जाती है। उपग्रह से नियंत्रित होने वाली जीपीएस प्रणाली और गूगल मैप्स के मुकाबले यह डिजिटल नक्शा ज्यादा सटीक और स्पष्ट होगा।

देश का मौजूदा नक्शा ब्रिटिश सर्वेयर कर्नल जॉर्ज एवरेस्ट ने 1 मई 1830 को बनाया था। बदलते वक्त के साथ भारत में बुनियादी ढांचे के विकास की आवश्यकता बढ़ रही है। इसके लिए सटीक मानचित्रों की जरूरत पड़ रही है। इसके मद्देनजर भारत का 252 साल पुराना वैज्ञानिक संस्थान सर्वे ऑफ इंडिया, ड्रोन की मदद से भारत के कुल 32 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से 24 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की मैपिंग करेगा। अभी उपलब्ध मानचित्रों में वास्तविक और दर्शाई गई दूरी का अनुपात दस लाख से पचास लाख तक होता है। नए डिजिटल मानचित्रों में यह अनुपात 1:500 होगा। इसका मतलब है कि मानचित्र पर एक सेंटीमीटर दूरी, 500 सेंटीमीटर को दर्शाएगी। इस परियोजना में करीब 300 ड्रोन का इस्तेमाल किया जाएगा।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा के मुताबिक, ‘यह परियोजना ‘नेटवर्क ऑफ कंटिन्यूअस्ली ऑपरेटेड रेफरेंस स्टेशंस’ (कोर्स) नामक कंप्यूटर प्रोग्राम पर आधारित है। कोर्स कुछ सेंटीमीटर के पैमाने पर भी ऑनलाइन 3डी पॉजिशनिंग आंकड़े उपलब्ध करा सकता है। इस्तेमाल किए जाने वाले ड्रोन में कोर्स प्रोग्राम से लैस सेंसर लगे होंगे। करीब 200 से 300 मीटर की ऊंचाई पर उड़ने वाले ये ड्रोन जब जमीन की तस्वीरें लेंगे, तो उस स्थान के सटीक देशांतर और अक्षांश का पता लगाया जा सकेगा।’

प्रोफेसर शर्मा के मुताबिक, ड्रोन मैपिंग से प्राप्त आंकड़ों की वैधता का परीक्षण भौगोलिक सूचनाओं की मदद से किया जाएगा। सर्वे ऑफ इंडिया के देशभर में करीब 2500 भू-नियंत्रण केंद्र हैं, जिन्हें उनके मानकीकृत समन्वय के लिए जाना जाता है। डिजिटल मैपिंग परियोजना में ‘नमामि गंगे’ मिशन को भी शामिल किया गया है। इसके तहत गंगा नदी के दोनों किनारों के 25 किलोमीटर के दायरे में बाढ़ प्रभावित मैदानों का नक्शा तैयार किया जाएगा। इसका उद्देश्य गंगा में अपशिष्ट प्रवाहित करने वाले स्रोतों, किनारों के कटाव और उनकी ऊंचाई का पता लगाना है। यह जानकारी बाढ़ से निपटने में भी मददगार हो सकती है।

डिजिटल मानचित्र सभी सरकारी विभागों के लिए नि:शुल्क उपलब्ध होंगे। हालांकि, मानचित्रों का उपयोग करने वाली व्यावसायिक परियोजनाओं को अपने लाभ का एक हिस्सा सर्वे ऑफ इंडिया को देना होगा। परियोजना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, अब तक हवाई फोटोग्राफी की मदद से नक्शा तैयार किया जाता रहा है, जिसमें हवाई जहाज पर कैमरा लगाकर तस्वीरें ली जाती हैं। शुरुआती दौर में तो नक्शे बनाने के लिए सर्वेक्षकों को दुर्गम इलाकों एवं घने जंगलों में अपनी जान जोखिम में डालकर जाना पड़ता था।

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