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भूख बनाम भोजन की बर्बादी

अफ्रीका के एक गांव में जहां एक आदमी भूख मिटाने की जद्दोजहद कर रहा होता है उसी समय जर्मनी में कई गैलन भोजन फेंका जा रहा होता है।

Author Published on: January 26, 2020 2:17 AM
भोजन की बर्बादी रोकने के लिए भारत में अभी कोई मजबूत कानून नहीं है, जिससे इस समस्या पर रोक लग सके।

शहर हो या गांव, अब महंगी शादियों का चलन हर कहीं दिखने लगा है। एक से अधिक पकवान अब शहर से चल कर गांवों तक पहुंच गए हैं। पहले जहां लोगों को शादी में पूड़ी, सब्जी, पुलाव, रायता और एक मिठाई से ही छुटकारा मिल जाता था, वहीं अब लोग अपनी परिस्थिति और हैसियत की चिंता न करते हुए कर्ज लेकर शादियों में खूब खर्च करते हैं। कैटरिंग यानी खाने का आर्डर लेने वाली कंपनियों के मेन्यू सूची में एक हजार से ज्यादा आइटम होते हैं, जिसमें से मेहमानों के लिए कुछ खास को चुनने में ही लोग एक माह का समय लगा देते हैं। इन सबमें सबसे ज्यादा खर्च होता है सजावट और खानपान पर। सजावट तो एक बार होने के बाद उजड़ जाती है, लेकिन खाना बनने के बाद पूरा उपयोग न होने पर कूड़ेदान में ही दिखता है। आज भी बड़े-बड़े होटलों से काफी मात्रा में बचा हुआ खाना कूड़े की गाड़ियों से कचरा घर तक पहुंच रहा है। शादियों का खाना तो अगले दिन वहीं तंबू के आसपास कहीं पड़ा दिख जाएगा।

प्लेट में खाना छोड़ने की आदत और शादियों के बाद बचा खाना आखिर कितनी बड़ी समस्या है, इसका अंदाजा तमाम रिपोर्टों से लगाया जा सकता है। भोजन की बर्बादी से न केवल सरकार, बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं। दुनिया भर में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है, उसका एक-तिहाई यानी लगभग एक अरब तीस करोड़ टन बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों के खाने की जरूरत पूरी हो सकती है। भारत में बढ़ती संपन्नता के साथ ही लोग खाने के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं। खर्च करने की क्षमता के साथ ही खाना फेंकने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

आज भी देश में विवाह स्थलों के पास रखे कूड़ाघरों में चालीस प्रतिशत से अधिक खाना फेंका हुआ मिलता है। विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व का हर सातवां व्यक्ति भूखा सोता है। अगर इस बर्बादी को रोका जा सके तो कई लोगों का पेट भरा जा सकता है। विश्व भूख सूचकांक 2016 में भारत का सत्तानबेवां स्थान है। देश में हर साल 25.1 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है, लेकिन हर चौथा भारतीय भूखा सोता है। इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के कारण खराब हो जाती हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सड़सठ सौ करोड़ किलो खाना बर्बाद होता है। बताया जाता है कि इतनी खाद्य सामग्री से गरीबी रेखा के नीचे रह रहे देश के छब्बीस करोड़ लोगों का छह महीने तक पेट भरा जा सकता है। इसकी कीमत हर दिन की करीब दो सौ चौवालीस करोड़ रुपए है।

भारत में उन्नीस करोड़ पांच लाख से अधिक कुपोषित हैं, जिसको देखते हुए भोजन की बर्बादी के आंकड़े काफी डराते हैं। भारत में हर साल इक्कीस सौ करोड़ किलो गेहूं खराब हो जाता है, इतना ही गेहूं आस्ट्रेलिया में हर साल पैदा होता है। भारत में गरीबों को खाना खिलाने का चलन है। सभी धर्मों में इसका उल्लेख है, इसलिए देश के हर छोटे-बड़े मंदिर, मजार में लंगर चलते हैं। गुरद्वारों में तो गुरुनानक की सीख पर अमल करते हुए भूखों को खाना खिलाना ही सच्ची सेवा माना जाता है। लेकिन यहां खाने की बर्बादी नहीं देखी जाती। कहा जाता है कि भारत के कई गांवों में अतिथि सत्कार के साथ कभी थाली में जूठन छोड़ने का भी रिवाज रहा है। जूठन छोड़ने को एक अच्छा व्यवहार माना जाता था, लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव हुआ और यह प्रथा अब ज्यादा नहीं दिखती। बात खाने की बर्बादी से शुरू होती है और इसके निस्तारण तक जाती है। इसका इंतजाम भी देश के पास बहुत कारगर नहीं है।

इनके चलते भूखे नहीं सोते लोग

चाहे सामाजिक संस्था हो, कोई धार्मिक न्यास या फिर कोई निजी व्यक्ति। भारत में कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने लोगों को भूखे न सोने देने के लिए एक आंदोलन जैसा चला रखा है। इसमें अब कई कंपनियां भी शामिल हो गई हैं। दिल्ली से लेकर बंगलुरू, भुवनेश्वर, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, चंडीगढ़, नागपुर, पुणे, इंदौर, हैदराबाद जैसे शहरों में ये छोटे स्तर पर काम कर रहे हैं। भारत के सोलह शहरों में बर्बाद खाने को भूखों तक पहुंचाने के लिए जोमेटो ने फीडिंग इंडिया के नाम से एक अभियान चला रखा है। संस्था से जुड़े सदस्य उज्जवल बताते हैं कि करीब बीस हजार से अधिक लोग इस काम से जुड़े हुए हैं और अब शहरों की संख्या भी पचहत्तर से अधिक हो गई है। होटल, समारोह और कारखानों से बचा खाना इकट्ठा करके दो लाख पचास हजार लोगों तक पहुंचाया जाता है। वे बताते हैं कि उनके पास मैजिक वैन है, जो कॉल करने पर पहुंचती है और बचा हुआ भोजन लेकर आती है।

इसी तरह दिल्ली में भी फूड बैकिंग और रॉबिन हुड आर्मी यह काम कर रही है। रॉबिन हुड आर्मी दिल्ली सहित आठ शहरों में तेईस सौ पंद्रह वालेंटियर सदस्यों के साथ कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद, बंगलुरु, चेन्नई, पुणे, जयपुर और जबलपुर में लोगों को भूख से निजात दिलाने के लिए काम कर रहे हैं। मुंबई में डब्बावाला एसोसिएशन के अध्यक्ष सुभाष तालेकर भी रोटी बैंक नाम से एक संस्था चला रहे हैं। वे बताते हैं कि 2015 में डब्बावाला लोगों के साथ मिल कर इसे शुरू किया था। पहले साइकिल से इसे चलाते थे, आज उनके पास दो गाड़ियां हैं, जो पार्टी और समारोह में जाती है और वहां से बचा हुआ खाना लाकर मुंबई के टाटा अस्पताल, नायर हॉस्पिटल, केईएम अस्पताल और अन्य जगहों पर इसे बांटते हैं। तालेकर बताते हैं कि रोजाना करीब तीन सौ से चार सौ लोगों को खाना खिलाने का काम रोटी बैंक कर रहा है। तालेकर बताते हैं कि उनके साथ पंद्रह से बीस लोगों की टीम है। वह कहते हैं कि एक भारतीय खाना खाए और दूसरा नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए। एक घटना से विचलित होकर ही उन्होंने यह काम शुरू किया था।

इसी तरह जयपुर में अन्नक्षेत्र संस्था के साथ जुड़े लक्ष्मण बताते हैं कि इस संस्था को बारह साल हो गए। इसमें आठ लोग काम करते हैं। खुद की दो गाड़ियां हैं, जो कहीं भी जाकर बचे हुए भोजन को फेंकने से रोकते और उसे लेकर आते हैं। करीब पांच सौ से एक हजार लोगों को संस्था की ओर से खाना खिलाया जाता है। लक्ष्मण कहते हैं कि वे हर रोज अलग-अलग बस्तियों में जाकर खाना बांटते हैं। अगर रोज एक ही बस्ती में गए तो लोग इसी पर आश्रित हो जाएंगे जो ठीक नहीं है।

इसी तरह केरल के तिरुवनंतपुरम में साथी मंदिरम नाम से चल रहे एक रिहैबिलिटेशन सेंटर की ओर से रास्ते में सोने वाले दो सौ लोगों को खाना वितरित किया जाता था। यहां के कर्मचारी वीएम पणिक्कर बताते हैं कि भवन निर्माण की वजह से यह काम अभी कुछ दिनों से रुका हुआ है। साथी मंदिरम में रहने वाले लोगों के लिए भी बाहर से लोग खाना भेजते हैं। इनमें पार्टी और समारोह का खाना वितरित किया जाता है। इसी तरह गुरुग्राम में भी मेरा परिवार नाम से संस्था लोगों को खाना वितरित करती है। उत्तर प्रदेश के बरेली में भी रोटी बैंक नाम की संस्था लोगों के घरों से रोटी लेकर उसे रास्तों के गरीबों में वितरित करती है। लखनऊ के कुछ बड़े होटलों से बात करने पर पता चला कि वहां बचा खाना रोजाना बंटने को जाता है।

दुनिया का भी हाल बुरा है

खाना बर्बादी से पूरा विश्व परेशान है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के मुताबिक हर साल 1.30 लाख करोड़ किलो खाद्य सामग्री बर्बाद हो जाती है। 2030 तक यह आंकड़ा 2.1 अरब टन का हो जाएगा। खाने की बर्बादी में आस्ट्रेलिया के स्थिति वाकई चिंताजनक है। वहां तीन सौ इकसठ किलोग्राम खाना प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष बर्बाद किया जाता है। दूसरे नंबर पर अमेरिका के लोग हैं। वहां दो सौ अठहत्तर किलोग्राम खाना प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष बर्बाद होता है। जापान में एक सौ सत्तावन किलोग्राम, जर्मनी में एक सौ चौवन किलोग्राम, कनाडा में एक सौ तेईस किलोग्राम, फ्रांस में एक सौ छह किलोग्राम खाना बर्बाद होता है।

भारत में स्थिति थोड़ी ठीक है। यहां एक व्यक्ति एक साल में इक्यावन किलोग्राम खाना बर्बाद करता है। खाना बर्बाद करने वालों में दस प्रमुख देशों में कई विकसित देश हैं। अमेरिका जैसे विश्व की सबसे बड़ी ताकत भी इसमें शामिल है। डेनमार्क में छह सौ साठ किलोग्राम भोजन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष बर्बाद होता है। यहां सरकार ने कई जागरूकता कार्यक्रम चलाए, लेकिन उससे कोई फायदा नहीं दिखा। नीदरलैंड में छह सौ दस किलोग्राम खाने की बर्बादी प्रति वर्ष एक व्यक्ति करता है।

अफ्रीका के एक गांव में जहां एक आदमी भूख मिटाने की जद्दोजहद कर रहा होता है उसी समय जर्मनी में कई गैलन भोजन फेंका जा रहा होता है। वहां पांच सौ चालीस किलोग्राम भोजन की बर्बादी एक व्यक्ति एक वर्ष में करता है। मलेशिया में गरीबी बड़ी समस्या है फिर भी वहां पांच सौ चालीस से पांच सौ साठ किलोग्राम भोजन की बर्बादी एक साल में एक व्यक्ति करता है। फिनलैंड में यह आंकड़ा साढ़े पांच सौ किलोग्राम है। अमेरिका और आस्ट्रेलिया भी इसमें शामिल हैंं। कनाडा, जो कि उच्च श्रेणी का सिविलाइज्ड देश माना जाता है, वहां भी खाने की बर्बादी छह सौ चालीस किलोग्राम प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति है। कनाडा के टोरंटो में सबसे ज्यादा खाना फेंकते हैं। नार्वे चिकित्सकीय सेवाओं और सफाई के लिए मशहूर है, लेकिन यहां भोजन की बर्बादी रोक पाने में सरकार नाकाम रही। यहां तीन लाख पैंतीस हजार टन खाने की बर्बादी हर साल होती है।

लोगों ने सोचना शुरू कर दिया है

भोजन की बर्बादी रोकने के लिए भारत में अभी कोई मजबूत कानून नहीं है, जिससे इस समस्या पर रोक लग सके। शादियों में फिजूलखर्ची और धन की बर्बादी के खिलाफ कानून बनाने का विचार यूपीए शासन में राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने दिया था। तत्कालीन खाद्यमंत्री केवी थॉमस ने 2011 में भोजन की बर्बादी रोकने के इरादे से कानून बनाने की पहल की थी। शादियों में मेहमानों की संख्या नियंत्रित करने से लेकर कई अन्य बातें भी उस विधेयक में शामिल थीं। मगर मेहमानों की संख्या को कानूनी रूप से नियंत्रित करने के विरोध की आशंका को देखते हुए सरकार आगे बढ़ने से डर गई।
एक कांग्रेस सांसद ने भी शादियों में खाने की बर्बादी को रोकने के साथ-साथ विवाह के पंजीकरण को कानूनन अनिवार्य बनाने वाला एक निजी विधेयक लोकसभा में पेश किया था। पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री ने इस समस्या को मन की बात के जरिए रेडियो पर लोगों के साथ साझा की थी। उन्होंने उन लोगों की तारीफ की थी, जो लोगों को भोजन मुहैया करा रहे हैं और भोजन को बर्बाद होने से रोक रहे हैं।

भोजन और किराना उत्पादों के दान को प्रोत्साहित करने के लिए दुनिया के कई देशों ने कानून बनाया है। फ्रांस विश्व का पहला ऐसा देश बना, जिसने अपने यहां सुपर मार्केट द्वारा न बिकने वाले फलों, सब्जियों और अन्य खाद्य पदार्थों को नष्ट करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। उसने यह कानून 2015 में बनाया। बचे हुए खाद्य पदार्थों को दान करने को कहा गया है।

हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी इस मोर्चे पर हमसे ज्यादा प्रगतिशील है। जनवरी, 2015 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान की शीर्ष अदालत ने शादी-विवाह में होने वाली फिजूलखर्ची रोकने के आदेश दिए थे। इसे फैसले को आधार बनाते हुए पहले पंजाब और फिर सिंध सूबे की असेंबलियों ने बाकायदा विधेयक पारित किए। पाकिस्तान में कानून है कि शादी या अन्य समारोहों में एक से ज्यादा मुख्य व्यंजन नहीं परोसा जा सकता। इस कानून के उल्लघंन पर एक महीने की सजा और पचास हजार से दो लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। शुरुआत में वहां के बड़े लोगों ने इसका विरोध किया, कुछ लोग अदालत भी गए, मगर सुप्रीम कोर्ट ने कोई ढील देने से इनकार कर दिया। दूसरी तरफ, आम लोगों ने इस कानून का खुल कर स्वागत किया है। अब वहां खाने में सिर्फ एक सालन, चावल, रोटी, सलाद, ठंडा और गरम पेय पदार्थ और एक मीठा व्यंजन परोसा जा सकता है।

गजेंद्र सिंह

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