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रम्य रचनाः मोची भया उदास

मेरी चप्पल टूट गई थी। ‘पुरानी’ थी इसलिए टूट गई। नई चप्पल नहीं टूटती है। आजकल नया ब्रांड या मॉडल आने से नई चीज पुरानी हो जाती है, बदल ली जाती है।

Author Updated: January 31, 2016 2:43 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

मेरी चप्पल टूट गई थी। ‘पुरानी’ थी इसलिए टूट गई। नई चप्पल नहीं टूटती है। आजकल नया ब्रांड या मॉडल आने से नई चीज पुरानी हो जाती है, बदल ली जाती है। यूज ऐंड थ्रो देवी के आशीर्वाद से टूटती नहीं है। पुरानी ‘वस्तु’ घर की बाई, वाचमैन, कूड़ेदान आदि की शोभा बढ़ाती है। सुना है, आज के बाजार में व्यक्ति भी वस्तु हो गया है। ‘पुराना’ हो गया व्यक्ति भी यूज ऐंड थ्रो देवी की कृपा से इस्तेमाल हो रहा है।
मैं और मेरी पत्नी अपने बेटे के घर में थे। बेटे ने आलीशान फ्लैट लिया था। कम कीमत में आलीशान फ्लैट लेना हो तो कुछ समय वीराने में रहने की आदत डालनी पड़ती है। आलीशान फ्लैट वह होता है, जिसका कोई ‘पड़ोस’ नहीं होता।
मेरा बेटा बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता है। उसकी कंपनी का मुख्यालय अमेरिका में है। जब भारत में दिन होता है तो अमेरिका में रात होती है। दिन तो काम करने के लिए बना है, इसलिए उसका दफ्तर तो दफ्तर है ही, घर भी दफ्तर है। दफ्तर से जब घर आता है तो उसके कान में इयर प्लग ठुंसा होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनी के पास सभी राष्ट्रों का धन होता है। यहां समय ही धन है। बाई वन गेट वन फ्री की शैली में कंपनियां आपको दो आदमी की तन्खाह देती हैं और आपसे चार आदमी का समय खरीद लेती हैं। चैबीस घंटों में आपका अपना समय कुछ नहीं होता है।
मेरी चप्पल टूट गई थी। मैंने बेटे से कहा- बेटा मेरी चप्पल टूट गई है। वह सुबह वाली हड़बड़ी में था। सुबह हो या शाम, वह हड़बड़ी में ही होता है। उसने मेरी ओर हड़बड़ निगाह से देखा और तपाक से डाइनिंग टेबल पर रखा अपना लैपटॉप खोल लिया। उसके एक कान में इयर प्लग था। मुझे लगा उसने मेरी बात सुनी नहीं। मैंने ‘अपने’ बेटे से फिर कहा- बेटा, मेरी चप्पल टूट गई है।
‘मैंने सुन लिया पापा, चिल… आपका ही काम कर रहा हूं।’ उसने दूसरे कान से, जिसमें इयर प्लग नहीं लगा था, सुना लिया था।
‘पर तुम तो कंप्यूटर के समाने बैठे हो, अपना काम कर रहे हो।’
अपना नहीं, आपका काम। आप तो जानते हैं यह कॉलोनी नई है और हम भी यहां नए हैं। मुझे यहां की शॉप्स की ज्यादा जानकारी नहीं है। गूगल सर्च में देख रहा हूं आसपास कोई जूतों का शोरूम हो तो वहां से नई चप्पल ले आना।’
नई की जरूरत नहीं है। बस थोड़ी-सी टूटी है, कोई भी मोची पांच मिनट में गांठ देगा।
मोची तो पांच मिनट में गांठ देगा, पर मोची को ढंूढने में पांच घंटे भी लग सकते हैं। इससे अच्छा है नई ले लो।
तुम कोई मोची ढूंढ दो… मैं उसके पास चला जाऊंगा।
गूगल सर्च पर मोची नहीं मिलेगा… मिला तो इस एरिया का नहीं होगा और महंगा होगा। लगता है मेरी कॉल आ रही है… अभी मेरे पास टाइम नहीं है। ऐसा करता हूं शाम को सर्च करता हूं और हो सकता है आॅनलाइन अच्छी डील मिल जाए।’ यह कह कर वह कंप्यूटर से उठ गया और दूसरे कान में इयर प्लग ठूंस लिया।
जैसे महापुरुष सत्य की तलाश में निकलते हैं, चुनावकाल में नेता वोटर की तलाश में निकलता है, पुलिसवाला शिकार की तलाश में निकलता है, मैं मोची की तलाश में निकला। चारों ओर खुला मैदान मुझे चुनौती दे रहा था कि मोची ढूंढ कर तो दिखा। नैतिक मूल्यों-सा दुरूह मोची मुझे, भ्रष्टाचार मंत्रालय में ईमानदारी-सा, बचे पेड़ की छांह में बैठा दिख गया। उससे कुछ दूरी पर पान, बीड़ी, सिगरेट और गुटखे वाले का खोखा था। जैसे सब्जी आदि की दुकान नई कॉलोनी की प्राथमिकता है वैसे ही पान, बीड़ी, सिगरेट और गुटखे वाले का खोखा भी। इसे खोलने के लिए बस पुलिस की कृपा चाहिए होती है।
मोची उदास बैठा था। वह आभासित मक्खियां मार रहा था। आजकल हमारे जीवन में आभासित दुनिया बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है। जीवन में मित्रों और संबंधियों के पास मिलने का समय नहीं है और हर बार न मिलने के बहाने ढूंढने पड़ते हैं। पर फेसबुक या वाट्स ऐप पर एक ढूंढो तो हजार मित्र मिलते हैं। अनेक बार तो मित्रों को अनफ्रेंड करना पड़ता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पति-पत्नी, एक-दूसरे से जितना आभासी दुनिया में मिलते हैं, उतने भासित दुनिया में नहीं।
मोची है कि उसके पास काम नहीं है, काम नहीं है तो धन नहीं है। समय ही समय है। इसलिए वह उदास है। बहुराष्ट्रीय कंपनी की संतानों के पास धन बहुत है, पर समय इल्ले है। इसलिए उनका परिवार उदास है।
मैंने मोची से कहा- मेरी चप्पल टूट गई है, क्या इसे गांठ दोगे।
और हम बैठे किसलिए हैं? उसके स्वर में कड़वाहट-सी थी।
पर भाई नारजगी से क्यों बोल रहे हो?
आप जो हमारा मजाक बना रहे हैं। सुबह से दोपहर हो गई मक्खियां मारते। शाम को ठुल्ला आ जाएगा अपना हक मांगने। आप पूछ रहे हो कि चप्पल गांठोगे…
नाराज क्यों होते हो, निराश मत होओ अभी कॉलोनी नई है, धीरे-धीरे ग्राहक आने लगेंगे।
क्या खाकर आएंगे ग्राहक। अपनी तो किस्मत में खोट है। कॉलोनी बस जाएगी, पर हमारी दुकान का सूखा कम न होगा। वो समाने पान वाले की दुकान देख रहे हैं। रोज सौ-दो सौ लोग आते हैं उसकी दुकान में। सरकार ने गुटखा बंद किया हुआ है, पर ब्लैक में उससे जितना चाहे ले लो।
घबराओ मत, एक दिन पकड़ा जाएगा…
मेरी बात सुन कर वह बहुत जोर से हंसा। उसने मुझे ऐसे देखा जैसे चुनाव के बाद मंत्री बना नेता मतदाता को देखता है, न्यायालय को गरीब देखता है या फिर कोई अक्लमंद मूर्ख को देखता है।
ऐसे हंस क्यों रहे हो… मैंने कुछ गलत कहा…
आपने कानूनन सही कहा, पर अगर कानून उसकी दुकान में आकर खुद गुटखा लेता हो तो आप क्या करेंगे? बाबूजी नशा चाहे गुटखे का हो, सत्ता का या फिर भ्रष्टाचार का, उसका नशाखोर पकड़ा नहीं जाता, यही घबराने की बात है। मेरे पास पैसा होता तो क्या मैं यह नीच काम करता…
मेरे भाई, काम कोई भी नीच नहीं होता है…
पर बाबूजी आज के समय में जिसके पास पैसा नहीं है, वह नीच ही माना जाता है। ऐसे नीच लोगों को न तो न्याय मिलता है और न ही सम्मान। जिस काम से पैसा न मिले तो वो नीच ही है… मैं तो सोच रहा हूं कि कल से मैं भी पान का खोखा खोल लूं…
पर इस तरह तुम जैसे लोग हमारे समाज से गायब हो जाएंगे, मोची इतिहास का विषय मात्र रह जाएगा।
इस बार वह हंसा नहीं, हल्का-सा मुस्काया और मेरी तरफ देखा और बोला- बुरा न मानें तो एक बात पूछूं बाबूजी!’
हां पूछो।
आपको क्या घर में खाना परोसा जाता है?
मैं कुछ अचकचाया और फिर बोला- परोसा तो नहीं जाता, पर टेबल पर डोंगे आदि में रख दिया जाता है और हम अपनी इच्छानुसार ले लेते हैं।
इसका मतलब ‘परोसा’ शब्द आपके घर से गायब हो गया है। यह कह कर वह मंद-मंद मुस्काता-सा मेरी चप्पल गांठने लगा।
मैं उसका क्या जवाब देता, चुप रहा।
सोचा कि हमारी जिंदगी से गांठने वाले गायब हो गए तो क्या होगा?

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