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बेबाक बोल-बे-मिसाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक मामले में तो अपना लोहा मनवाते हैं। वे सब कुछ ऐसी मिसाल के साथ करते हैं कि वह बेमिसाल का खिताब पा जाता है।

पीएम मोदी ने 30 दिसंबर को ‘BHIM App’ लॉन्‍च की थी। (PTI File Photo)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक मामले में तो अपना लोहा मनवाते हैं। वे सब कुछ ऐसी मिसाल के साथ करते हैं कि वह बेमिसाल का खिताब पा जाता है। ‘भूतो न भविष्यति’ जैसा…। अपने हर फैसले का नतीजा भी वे खुद ही तय करते हैं। अगर वे स्वच्छ भारत अभियान छेड़ेंगे तो हफ्ते भर बाद ही उन्हें पूरा देश स्वच्छ दिखना शुरू हो जाता है। कम से कम आजादी के 70 वर्ष में तो ‘परालौकिक’ हो ही जाता है। नोटबंदी पर वे स्वयंसिद्ध फैसला सुना देंगे कि उसका विरोध करने वाले बेईमान हैं। और इस फैसले से इतिहास रच दिया है। और यह इतना ज्वलनशील था कि विरोधियों के किए अब तक के सभी भ्रष्टाचार का दहन हो गया। हां, खुद को बेमिसाल बनाने के रास्ते में उन्हें कोई रोड़ा दिखाई देता है तो रोड़ा हटाने के बजाए रास्ता ही बदल लेने का उनका हुनर भी गजब का है। उनका अंग्रेजी की इस कहावत में तो रत्ती भर भी विश्वास नहीं कि चैरिटी बिगिन्स एट होम (दयानतदारी की शुरुआत घर से होती है)। देश स्वच्छ हो, आपका कार्यालय चाहे गंदगी से भरपूर रहे। पूरे देश में नोटबंदी के बाद आॅनलाइन भुगतान की व्यवस्था हो लेकिन भाजपा दफ्तर की कैंटीन में तो नोटों के बिना भूखे ही रहें। दिवाली के समय स्वदेशी उत्पादों के लिए आंदोलन चल रहा हो तो भाजपा दफ्तर की ही सजावट चीनी झालरों से कर दी जाए।

हां, आईना दिखाने वाली इन खबरों को खारिज करना भी एक खास हुनरमंदी है। आखिर देशहित का लक्ष्य इतना जबर्दस्त है कि ऐसी ध्यान बंटाने वाली चीजों को नजरअंदाज ही करना पड़ता है। सारे स्वयंसेवी संगठन अपने चंदे का हिसाब दें लेकिन भाजपा चंदे का हिसाब क्यों दे? सवाल हो तो जवाब दरकिनार हो। यानी भाजपा के खजाने में जो चाहे डाल दें। ठीक भी है। देशहित के लिए काम करने वाली एकमात्र पार्टी पर जन-जन का ऐसा ही विश्वास होना चाहिए। लोकपाल तो इतिहास है अब तो नया शब्द चौकीदार है।
प्रधानमंत्री के बयानों के ऐतिहासिक वाक्यों की सार्थकता कम करने में उनकी पार्टी के ही लोग हैं। और, इसमें एक ही व्यक्ति सक्षम हैं – अमित शाह। याद रहे, नरेंद्र मोदी का सबसे ऐतिहासिक वादा कि विदेशों में जितना कालाधन है उसे वापस लाकर सबके खाते में 15-15 लाख जमा कर दिए जाएंगे। अमित शाह ने ही तय किया था कि इस वादे को चुनावी जुमला बना दिया जाए।

फिलहाल मुद्दे की बात, प्रधानमंत्री की एक ऐसी ही घोषणा है जो उन्होंने पार्टी की राष्टÑीय कार्यकारिणी की बैठक में की। उन्होंने निर्देश दिया कि चुनाव में नेतागण रिश्तेदारों को टिकट देने के लिए जोर न दें। महज दो से तीन हफ्तों में साफ हो जाएगा कि यह एक गंभीर सोची-समझी चुनावी सुधार की कवायद है या खोखली जुमलाबंदी। यानी जुमलों की फेहरिस्त में एक और इजाफा। यह भी जानना दिलचस्प होगा कि क्या यह सिर्फ इस चुनाव के लिए है या सबके लिए। यह मौजूदा रिश्तेदारियों के लिए होगा या पहले से चली आ रही विरासत की राजनीति पर भी चोट करेगा। हमारा मानना है कि इसमें भी उन्हें नाकामी ही झेलनी पड़ेगी। भारतीय जनता पार्टी में भाई-भतीजावाद का सवाल भी बाकी दलों से जुदा नहीं है। बड़े-बड़े धुरंधर जो दो-चार साल में मार्गदर्शक मंडल की शोभा बढ़ाने वाले हैं इसी को बढ़ावा दे रहे हैं।महाराष्ट्र के लोकप्रिय नेता गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद उनकी विरासत संभालने के लिए उनकी बेटी पंकजा मुंडे के नाम के अलावा कोई विकल्प सामने लाने की हिमाकत नहीं की गई। दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा के लिए राजनीति का प्रवेश द्वार सुगमता से खोल दिया गया था। मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी, यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह, रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर, प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन, बीएस येदुरप्पा के बेटे बीवाई राघवेंद्र, छत्तीसगढ़ में बलिराम कश्यप के बेटे केदार कश्यप वंशवादी परंपरा के वैसे वारिसों में से हैं जिन्हें पालने में ही युवराजों और युवरानियों का ताज पहना दिया गया था। पिता के बाद इनकी राह साफ। पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के बेटे युद्धवीर सिंह जूदेव भी राजनीति के अखाड़े में आए। बेटे और बेटियों को वारिस देने के साथ भाजपा भी उस लीक पर आगे बढ़ चुकी है जहां पति की मौत के बाद उसका विकल्प पत्नी बने। मध्यप्रदेश में तुकोजीराव के निधन के बाद उनकी पत्नी गायत्री राजे को ही उनकी विरासत सौंपी गई।

लोकसभा चुनावों के वक्त नरेंद्र मोदी ने राहुुल गांधी के कारण वंशवाद पर करारा हमला किया था। उत्तर प्रदेश में वंशवादी कई दिग्गजों के टिकट कटे भी थे। लेकिन लोकसभा चुनाव जीतने के बाद से भाजपा के आदर्शों के ब्रांड अंबेसडर बने प्रधानमंत्री आदर्शों की हार पर चुप्पी साध जाते हैं। राजनीतिक वारिसों को मंत्रिपद नहीं देने के फैसले पर पंजाब के सामने टिक नहीं सके। वहां के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की बहू और उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर को मंत्रिपद देना ही पड़ा।लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद आदर्शों की पहली बलि तो बिहार में ही चढ़ाई गई थी। बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए जब भाजपा बिहार में अंधाधुंध रैलियां कर रही थी तो वंशवाद का मुद्दा मोदी, शाह और नेताओं के भाषणों से गायब था। क्योंकि राजद, जद (एकी) और लोजपा की तरह ही भाजपा व उसके सहयोगियों के चुनावी उम्मीदवारों के नाम के साथ बड़े नेता रह चुके उनके पिता का कुलनाम जुड़ा था। रामविलास पासवान के बेटे चिराग बालीवुड में तो अपना करियर नहीं बना पाए थे, लेकिन राजनीति के मैदान में बिना मेहनत वे पिता के बाद दूसरे नंबर सरीखे थे और भाजपा को इस वंशवादी चेहरे से हाथ मिलाने में कोई गुरेज नहीं था। इसके पहले भी 2010 के चुनाव की कहानी याद है जब बक्सर के ब्रह्मपुर से सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर को उम्मीदवार बना दिया गया था। यह उदाहरण इसलिए भी काबिलेगौर है कि ठाकुर के बेटे के पहले इस सीट की दावेदारी दिलमणि देवी की थी। दिलमणि देवी बिहार में भाजपा की जमीन बनानेवालों में से एक कैलाशपति के भतीजे की पत्नी थीं। लेकिन सीपी ठाकुर का चेहरा बड़ा था तो फिर उनके बेटे की दावेदारी तो ज्यादा बनती थी। चारा घोटाले के दोषी पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्र भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं।

बिहार में हारने के बाद महाराष्टÑ और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में तो भाजपा की वंशवाद पर चुप्पी बढ़ी क्योंकि सहयोगी शिवसेना (उद्धव ठाकरे) और पीडीपी (महबूबा मुफ्ती) के खेवनहार अपने पिताओं के ही कारण जाने और माने गए।भाजपा के आदर्शवादी अभी यह दावा कर सकते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व वंशवादी प्रवृत्ति से मुक्त है। लेकिन यह भी सच है कि भाजपा के अभी दो प्रधानमंत्री देश पर राज कर चुके हैं और दोनों की संतानें नहीं हैं। हालांकि अटलबिहारी वाजपेयी के परिजनों को राजनीति में बहुत सहूलियतें मिलीं। उनके छोटे भाई की बेटी करुणा शुक्ला आसानी से राजनीति में आर्इं और वाजपेयी से जुड़े कई नामों की राजनीति में दमदार मौजूदगी रही। प्रधानमंत्री पद के इंतजारशुदा लालकृष्ण आडवाणी के पुत्र-पुत्री की आजमाइश तो हुई लेकिन वे अपनी कोई राजनीतिक पहचान नहीं बना पाए। और रही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तो सिर्फ इतना कह कर काम नहीं चल सकता कि मैंने देश के लिए परिवार छोड़ दिया। आदर्शों का ‘एकला चलो रे’ गान निजी तौर पर आपको नायक का दर्जा दे सकता है लेकिन देश और समाज को इससे सामूहिक फायदा नहीं हो सकता। चुनाव सिर पर है और उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में बहुत-सी सीटों पर उम्मीदवारों के नाम अभी रहस्य हैं। उत्तराखंड में कांग्रेसी चेहरों को भाजपा के पाले में लाने के बाद प्रचार का मुद्दा क्या रहेगा? लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी ने जो पगछाप छोड़ी थी तीसरे साल में उसके निशां मिट रहे हैं।

करिश्मा, मुखौटा और लोकतंत्र

भारत में आधुनिकता बनाम लोकतंत्र की कहानी को समझने के लिए हम फिर एक बार प्रेमचंद के ‘गोदान’ का सहारा लेते हैं। अंग्रेजों के बोलबाले के समय 1857 में क्रांति होती है। नवजागरण काल में भारतेंदु देशभक्ति की बात तो करते हैं लेकिन अंग्रेजों का गुणगाण भी करते हैं। कुछ समय बाद कांग्रेस पार्टी का जन्म होता है और ‘गोदान’ के सारे जमींदार कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। कल के जमींदार राय साहब कांग्रेस पार्टी के सदस्य बनकर संसदीय राजनीति में आ गए। वे जमींदारी करते हुए, खन्ना साहब के बैंक के शेयर खरीदते हुए लोकतांत्रिक पार्टी का हिस्सा बने रहे। भारत में आजादी के बाद आधुनिकता तो आई, लेकिन किंतु-परंतु के बीच सामंती परंपरागत अवशेष के साथ उसका कदमताल होता रहा। इसी का असर रहा कि यहां व्यक्ति केंद्रित राजनीति का दबदबा रहा जो राजनीतिक वंशवाद का ही एक रूप है।

लोकतंत्र नहीं करिश्मा

सत्ता पर व्यक्ति की केंद्रीयता स्थापित होने का पहला उदाहरण हैं इंदिरा गांधी। इंदिरा जब प्रधानमंत्री बनी थीं तो वे सिर्फ नेहरू की बेटी नहीं वरन कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में उनकी अर्जित साख भी थी। लेकिन एक अर्जित मुकाम पाने के बावजूद उन्होंने भारतीय राजनीति को व्यक्ति केंद्रित पहचान दी। ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ महज एक नारा नहीं, एक मानसिकता थी जो राजनीति में लोकतंत्र के बजाए करिश्मा को एक पुख्ता वजूद दे चुकी थी। इसी का चरम था आपातकाल। नेता के एक करिश्माई, रहस्यमयी बिंब की शुरुआत इंदिरा के साथ ही शुरू हुई।

करिश्मे का टूटना

आपातकाल के बाद चुनावों में इंदिरा की हार ने ही वह करिश्मा भी तोड़ा था। इंदिरा गांधी का हारना और फिर से उभरना भारतीय राजनीति का संक्रमण काल था। संगठित विरोध से इंदिरा का हारना और जनता पार्टी की सरकार ने सत्ता के और भी केंद्र बनने का विकल्प खोल दिया था।
पहचान की राजनीति में चेहरे का दबदबा

नब्बे के दशक के बाद नवउदारवादी व्यवस्था ने पहचान की राजनीति को एक नया आयाम दिया और इसी पहचान की राजनीति ने सत्ता के कई केंद्र खोले। नब्बे के दशक के बाद क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ। लेकिन क्षेत्रीय क्षत्रपों की नियति भी व्यक्ति केंद्रित होना ही रही। यहां पर शक्ति का हस्तांतरण बच्चों को हुआ, नहीं तो फिर उत्तराधिकारी को सौंपा गया। हम चाहे कांशीराम बनाम मायावती देखें या अभी जयललिता का मामला देखें। भारतीय राजनीति में पहले एक व्यक्ति का करिश्मा तैयार होता है और उसके बाद वह अपने करिश्मे की विरासत सौंपता है। कांशीराम ने मायावती को सौंपी, जयललिता औपचारिक घोषणा नहीं कर पार्इं लेकिन उनकी सबसे करीबी को सत्ता सौंपी गई। जब लालू यादव के जेल जाने का समय आया तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता सौंपी। राबड़ी देवी या शशिकला का चेहरा अहम नहीं है। अहम यह है कि वे किस करिश्माई चेहरे का मुखौटा हैं। भारतीय लोकतंत्र करिश्मे के मोहपाश में इतना फंस चुका है कि वह मुखौटे को अपनाने को तैयार हो जाता है लेकिन करिश्मे से बाहर नहीं आना चाहता है। वाइएसआर रेड्डी, बाला साहेब ठाकरे, करुणानिधि, लालू यादव, पंजाब का बादल परिवार, हरियाणा के ज्यादातर राजनीतिक परिवार इसी परंपरा के वाहक रहे जहां जनतांत्रिकता के बदले उसी सामंती व्यवस्था को तरजीह दी गई जिसमें राजा का बेटा ही राजा होता है या संतान की अनुपस्थिति में उत्तराधिकारी को सत्ता सौंपी जाती है।
जनप्रिय नहीं ‘जनवादी’ पार्टियां

मुख्यधारा की भारतीय राजनीति में वामदलों की इसलिए सबसे ज्यादा आलोचना होती है कि उनकी राजनीतिक व्यवस्था में व्यक्ति का, चेहरे का कोई महत्त्व नहीं है। ज्योति बसु के चेहरे को पार्टी के ऊपर तरजीह नहीं देना मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की ऐतिहासिक गलती के रूप में देखा जाता है। केरल में अच्युतानंदन के करिश्मे के ऊपर पिनराई विजयन को सत्ता मिलना मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श में आलोचना की बड़ी वजह है। भाकपा, भाकपा माले या अन्य वामंपथी दल भी करिश्मे की विरासत नहीं रखने के कारण मुख्यधारा से बेदखल हैं। ये दल ‘जनवादी’ नीतियों पर चलने का दावा करते हैं लेकिन मुख्यधारा में ये ‘जनप्रिय’ नहीं हैं।

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