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बेबाक बोलः तिहाई के बरक्स- पलटते पासे

गुजरात में पाटीदारों के आंदोलन के बाद ऊना से उठता हुआ दलित विद्रोह।

महाश्वेता देवी की रचना ‘हजार चौरासी की मां’ की नंदिनी सवाल पूछती है, ‘जिसे लिखा नहीं जा रहा, पढ़ा नहीं जा रहा क्या वो हो नहीं रहा’। लिखे, बताए, समझाए गए के बरक्स जब गुजरात की जमीनी हकीकत चमकते विज्ञापनों के चीथड़ों से झांकने लगी तो वहां का चेहरा बदलना पड़ गया। गुजरात की नुमाइशी खिड़की से दिखा कि विकास और गैरबराबरी की साझेदारी कैसी हो सकती है। अपने हक की मांग करते दलितों ने वाया गुजरात उत्तर प्रदेश और पंजाब की सियासी जमीन पर असर छोड़ने के संकेत दे दिए हैं। तो 31.34 फीसद वोटों से सरकार बनाने वाली केंद्र सरकार बागी हुए वोटों से कैसे निपटेगी यही जानने की कोशिश करता इस बार का बेबाक बोल।

गुजरात में पाटीदारों के आंदोलन के बाद ऊना से उठता हुआ दलित विद्रोह। अखबारों ने कम छापा, चौबीस गुणे सात चैनलों ने कम दिखाया। लेकिन सोशल मीडिया पर जगह-जगह दलितों का निकलता जत्था, ब्राह्मणवाद और मनुवाद से आजादी के लिए शपथ लेते हाथ बता रहे थे कि गुजरात की कहानी जल्द ही बदलने वाली है। सबसे बड़ी बात यह थी कि दलितों का यह आंदोलन बिना किसी राजनीतिक दल की अगुआई के हो रहा था। और भाजपा या कांग्रेस जैसी पार्टियों के लिए चिंता की बात और सबसे ‘खतरनाक’ संदेश यह था कि दलित और मुसलमान दोनों एक साथ आ गए।
इस तथ्य को ध्यान में रखना इसलिए जरूरी है कि 2002 में गुजरात में गोधरा-कांड के बाद हुए कत्लेआम में ऐसे तमाम आरोप सामने आए थे कि मुसलमानों के खिलाफ दलितों का इस्तेमाल किया गया था। इस लिहाज से देखें तो ऊना की घटना के बाद मुसलिम समुदाय और दलितों का एकसाथ खड़ा होना तकरीबन डेढ़ दशक पहले ‘बनाए गए’ उस समीकरण को ध्वस्त करता है, जिसमें दलित और मुसलमान आमने-सामने एक दूसरे के खिलाफ थे। वह एक खास राजनीति का नतीजा था, लेकिन अब उसका सिरा पलटने लगा है। अत्याचार और पीड़ा कैसे पीड़ितों को एक साथ खड़ा कर देते हैं, यह ऊना की घटना से पैदा हवा ने साबित किया है!

और इस हवा ने विकास के चमकते चेहरे गुजरात का चेहरा बदल दिया। सोशल मीडिया पर गुजरात का सच दिखने के बाद मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने सोशल मीडिया (फेसबुक) पर ही इस्तीफा दिया। गुजरात में किस्सा कुर्सी का बदलने के पीछे तो फिलहाल उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव ही हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ आई, लेकिन उसके बाद से वहां हालात ठीक नहीं रहे हैं। इसके बावजूद, भाजपा इस महत्त्वाकांक्षा के साथ हर वह कदम उठाने के लिए तैयार है ताकि आगामी विधानसभा चुनावों को हर हाल में जीता जाए। पंजाब में एक ठहरी हुई जड़ व्यवस्था के खिलाफ लोगों के भीतर काफी गुस्सा है। आखिर इन दोनों राज्यों में भाजपा किस नारे के साथ जाए? विकास का नारा तो यहां बर्बाद हो ही चुका है, तो उत्तर प्रदेश में भाजपा कौन-सा ‘मॉडल’ दिखाएगी?

लोकसभा चुनावों में पहली बार विपक्ष को बांट कर वोट हासिल करने के लिए ध्रुवीकरण की रणनीति बनाई गई थी, जो सफल रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में जाट पूरी तरह से भाजपा के पाले में आ गए। लेकिन पिछले साल भर में हरियाणा में जाट आंदोलन और बाकी राजनीति के बाद जाटों के बीच भाजपा को लेकर जो उथल-पुथल हुआ है, उसके बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा अब कौन-सी रणनीति अपना सकती है? उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है और केंद्र में भाजपा की। सीबीआइ की नकेल केंद्र के पास रही है, जिसकी वजह से मुलायम सिंह और मायावती भाजपा सरकार के खिलाफ ज्यादा मुखर नहीं हो पाते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक गहरी तीव्रता के असर वाले मुद्दे के रूप में रोहित वेमुला की आत्महत्या और उससे जुड़ी परिस्थितियों के मामले में भी मायावती कोई बड़ा संघर्ष नहीं खड़ा कर पार्इं और औपचारिक बयानों तक सिमटी रहीं। लेकिन गुजरात में दलित उत्पीड़न का सुलगता मुद्दा मायावती के लिए तो संजीवनी साबित हो सकता है, मुलायम सिंह भी भाजपा के ‘सुशासन’ और ‘वाइब्रेंट गुजरात’ को आईने में रख कर सामने कर सकते हैं।
लौटते हैं गुजरात के परिदृश्य में। अब यहां मुसलमान और दलित एक साथ आए हैं। अमदाबाद से दलितों की जो दस दिन की यात्रा निकली ऊना के लिए, उसकी सरपरस्ती कोई राजनीतिक दल नहीं कर रहा है। आंदोलनकारी दलितों के जत्थों का स्वागत जगह-जगह मुसलमान कर रहे हैं। इधर दलितों के बीच भी इस बात को गहरी संवेदना के साथ नोट किया जा रहा है। इस आंदोलन का मुख्य मुद्दा यही है कि दलित अब गटर में नहीं उतरेंगे, मरे जानवरों की खाल उतारने या उनके निपटान का काम नहीं करेंगे। अभी तक एक खास समुदाय पर थोपे गए काम का बहिष्कार पूरे देश के लिए राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। कोई भी राजनीतिक दल यह कहने की हिम्मत नहीं कर सकता है कि जाओ हम तुम्हारे बीस या पच्चीस फीसद वोट का बहिष्कार करते हैं, तुम्हारे बिना भी हमारी सरकार बन जाएगी। भाजपा भी इस बीस या एकजुट होने के बाद उससे ज्यादा फीसद वोट की अहमियत जानती है। आखिर 31.34 फीसद से ही केंद्र में उसकी ऐतिहासिक सरकार बन गई।

भाजपा के सत्तानशीं होने का समीकरण भारतीय राजनीति में एक नया पाठ बन गया और अब गुजरात से एक नया समीकरण निकल रहा है जो उत्तर प्रदेश और पंजाब के लिए भाजपा को डरा रहा है। हालांकि यह भी सच है कि मतों के ध्रुवीकरण की राजनीति करने की कोशिश का खमियाजा बिहार में भाजपा बुरी तरह भुगत चुकी है। वहां तो तुरूप के पत्ते की तरह ओवैसी तक को भी उतारा गया जो आखिरकार खाली हाथ लौटे थे।
पहचान की राजनीति के दौर में दलितों का राजनीतिकरण इस तरह हुआ कि राजनीतिक दलों में ‘अन्य’ (अदर) के रूप में माने जाने वाले अब उठ कर एकजुट (टुगेदर) हो गए और गुजरात के समीकरण ने उनके लिए भाजपा को ‘अन्य’ बना दिया है। अगर यह समीकरण स्थिर रह गया तो इसके असर का अंदाजा भाजपा को है। कायदे से कहें तो अगर यह तस्वीर गुजरात से फैल कर देश का हिसाब बन जाती है, तो आने वाली राजनीति में भाजपा को अपनी जगह के बारे में सोचना पड़ सकता है। शायद इसी भावी तस्वीर को भांप कर भाजपा ने कुछ ‘साहसिक’ फैसले लेने शुरू किए हैं। लेकिन देखना यह होगा कि इन ‘साहसिक’ फैसलों का उसकी मूल राजनीति में क्या स्थान रहेगा।
लेकिन कई बार सत्ता की कुर्सी के लिए प्रत्यक्ष दिखते कारण सिर्फ तात्कालिक महत्त्व के होते हैं। अंदरखाने क्या चल रहा होता है, यह साधारण जनता की निगाह में नहीं आ पाता। आनंदीबेन पटेल के इस्तीफे के बाद गुजरात में मुख्यमंत्री के चुनाव के वक्त नितिन पटेल समर्थक मिठाई बांट चुके थे। लेकिन नेता चयन के लिए हुई बैठक में कमरे के अंदर इतनी गर्म बहस हुई कि बाहर पत्रकारों को भी खबर मिल गई कि अंदर क्या चल रहा है। अमित शाह के हठ के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दखल साफ दिख रहा था। गुजरात में वोट के हिसाब से तीन समुदाय अहमियत रखते हैं। शाह की रणनीति यह है कि संघ के जरिए वे स्थिति को नियंत्रित कर लेंगे, इसलिए उन्होंने पाटीदार को मुख्यमंत्री नहीं बनाया।

गुजरात का राजनीतिक ढांचा ऐसा है कि यहां लंबे समय से द्विदलीय प्रणाली की तरह ही सब कुछ चल रहा है। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के अलावा कोई पार्टी अपना जनाधार खड़ा नहीं कर पाई। हालांकि अब प्रदेश के युवा वर्ग को आम आदमी पार्टी अपने भ्रष्टाचार विरोधी एजंडे के साथ लुभा रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गुजरात पर पंजाब की तरह ही नजदीक से नजर जमाए हैं। प्रदेश की हर राजनीतिक गतिविधि पर अपनी विशेष टिप्पणी जारी करने में केजरीवाल सबसे आगे रहते हैं। उनकी पार्टी ने यहां अपना काडर खड़ा करना भी शुरू कर दिया है। पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल पर भी ‘आप’ डोरे डालने में मसरूफ है। लेकिन पंजाब में दलितों के लिए अलग से घोषणापत्र निकालने का दावा करने वाले बड़बोले आप नेता तो आनंदीबेन को हटाए जाने का श्रेय भी अपने ही नाम दर्ज कर चुके हैं। और यहीं से सामने आता है उनका दलितों को लेकर नजरिया। हैरानी की बात यह है कि ऊना से पैदा हुए तूफान के असर में होने वाले राजनीतिक उथल-पुथल और आनंदीबेन के इस्तीफे की पृष्ठभूमि से समूचा देश वाकिफ हो गया था, तब अरविंद केजरीवाल ने आनंदीबेन के इस्तीफे के लिए आम आदमी पार्टी के बढ़ते कद और आंदोलन का हवाला देकर अपनी पीठ खुद ही ठोकी। हालांकि इस संदर्भ में उनके बयान को हास्यास्पद ही माना गया, खासतौर पर दलित राजनीति और आंदोलन पर नजर रखने वाले लोगों और समूहों के बीच।

खैर, पाटीदारों को जिस तरह से भाजपा प्रश्रय दे सकती है, वह शायद कांग्रेस में संभव न हो। खास तौर पर ऐसी स्थिति में जबकि प्रदेश में पिछले तीन कार्यकाल में धार्मिक आधार पर मतदाताओं का जबर्दस्त ध्रुवीकरण रहा है। शायद यही कारण है कि अमित शाह ने विजय रुपानी को मुख्यमंत्री बना कर अपने जीवन का सबसे बड़ा दांव खेला है। प्रदेश के जैन बनिया समुदाय के लोग साथ हो जाएं और किसी भी कारण से पटेल खुद में ही सिमटे रहें, तो क्या कांग्रेस और क्या आप! किसी की भी क्या बिसात! लेकिन ऐसा न हो कि वे हार्दिक पटेल को कुछ कम आंक रहे हों, क्योंकि इसी तरह के आंदोलन की पृष्ठभूमि से कभी केजरीवाल भी पैदा हुए थे। किसी के तसव्वुर में भी नहीं था कि केजरीवाल देश की राजधानी की 70 में से 67 सीटें हासिल कर पाएंगे और देश के राज्यों पर एक के बाद एक तेजी से कब्जा रही भाजपा तीन के शर्मनाक आंकड़े पर सिमट जाएगी।

राजनीति में ऐसी बेलौस रणनीति के लिए कभी कांग्रेस ही विख्यात थी और है भी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संरक्षित भारतीय जनता पार्टी से अपेक्षाकृत अनुशासित राजनीति की उम्मीद की जाती थी। लेकिन गुजरात को देखकर लगता है कि पार्टी तेजी से कांग्रेस के रंग में रंगती जा रही है। पंजाब, उत्तर प्रदेश के बाद पार्टी का चुनावी इम्तिहान गुजरात में ही होने जा रहा है। नरेंद्र मोदी बरास्ता गुजरात ही देश के प्रधानमंत्री के पद पर गद्दीनशीन हुए हैं। गुजरात की गद्दी और उसके वारिसों को तय करने में किसका कितना हाथ रहा है, यह अब लोग समझते हैं। इसलिए वहां के चुनावी परिणामों को किसी भी दूसरे के सिर पर फोड़ना आसान नहीं होगा। हालांकि रुपानी के पदग्रहण समारोह से दूर रहकर मोदी ने जो संकेत दिया है, उसे समझना इतना भी कठिन नहीं।

इसके बावजूद यह भी सच है कि अब शायद किसी भी राज्य को मोदी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल नहीं बनाया जाएगा। बिहार में प्रतिष्ठा खोने के बाद यह अहसास और भी तीव्र हुआ है। इसलिए अभी से तैयारी इस बात की हो रही है कि गुजरात में जो होगा, वह अमित शाह का ही किया-धरा होगा। यही वजह है कि उन्हें खुला हाथ दिया गया है कि वे जिसे चाहे उठाएं और जिसे चाहे पटक दें। ऐसे में गुजरात में अप्रत्यक्ष तौर पर कुर्सी की कमान शाह के हाथों में ही है। इस लिहाज से देखें तो यह समझ आ सकता है कि गुजरात की समूची राजनीतिक गतिविधियों से मोदी दूर तो शाह करीब क्यों! लेकिन यह दांव इस बार कुछ ज्यादा ही बड़ा है।

दरअसल, इस बार गुजरात में भाजपा से तीन समुदाय अलग हो रहे हैं। इन तीनों का समीकरण आगे क्या आकार लेता है, यह तो वक्त ही बताएगा। मुद्दे की गंभीरता देखते हुए प्रधानमंत्री गोरक्षकों की दुकानदारी पर अपना गुस्सा उतारने की दुनियादारी निभा चुके हैं, लेकिन दलितों की बुनियादी सामाजिक-आर्थिक हालात से उपजे भेदभाव और अत्याचार के मामलों पर वे अब तक चुप ही रहे हैं। उनकी चुप्पी इस बात पर असमंजस पैदा करती कि भाजपा इनके ‘फीसद’ का क्या करेगी। विकास के नारे का ‘विकास’ नहीं कर पाए और ध्रुवीकरण के नए समीकरण मजबूत चुनौती दे चुके हैं। ‘चाय पर चर्चा’ से पहुंची ‘गाय पर चर्चा’ अब बड़ी बहस हो चुकी है, जिससे निपटना उनके लिए आसान नहीं रह गया है। अब गाय बनाम वोटों के फीसद की रणनीति के लिए भाजपा संघ की ओर उम्मीद की नजर टिकाए हुए है। ऐसे में रुपानी कितना ‘आपदा प्रबंधन’ कर पाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा।

दलित पर चर्चा

55 सालों तक क्या किया?
यह भ्रम पैदा किया जा रहा है कि भाजपा सरकार के आने पर दलितों के उत्पीड़न के मामले बढ़े हैं। सरकार के आंकड़े सामने हंै। आपके (कांग्रेस) पास कोई अंतरराष्ट्रीय आंकड़े हैं तो पेश करें। प्रमाण दीजिए। आपने 55 वर्षों तक देश पर राज किया। अगर इतने वर्षों में दलितों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास की चिंता की गई होती तब आज ऐसी घटनाएं नहीं होतीं।
– राजनाथ सिंह, गृह मंत्री
ठोस कार्रवाई क्यों नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विषय पर हाल ही में कहा कि दलितों को नहीं मारो, मारना है तो मुझे गोली मार दो। साथ ही गोरक्षा से जुड़े लोगों में असामाजिक तत्त्वों के होने का जिक्र किया। लेकिन ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? प्रधानमंत्री के पास ऐसी जानकारी है लेकिन फिर भी दलितों की सुरक्षा के लिए ठोस पहल केंद्र सरकार क्यों नहीं कर रही है? वर्तमान सरकार के दौरान अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए बजटीय आबंटन में कटौती की गई है।
– पीके बीजू, माकपा
बनेगी कांग्रेस की सरकार
वर्तमान सरकार के दौरान देश में दलितों के खिलाफ अत्याचार के अब तक के सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। और यदि इस तरह दलितों पर अत्याचार पर सरकार मौन रही तो 2019 के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनना तय है।
– केएच मुनियप्पा, कांग्रेस
सामाजिक सोच का सवाल
यह केवल कानून एवं व्यवस्था का प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक सोच का प्रश्न है। ऐसी घटनाएं इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि दलित आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं और हमें उनके इस प्रयास में सहयोगी बनना होगा। हिंदुस्तान में दलितों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करने की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों ने अपने सिर पर ले रखी है, फिर चाहे वह कांग्रेस हो, भाजपा हो, वाम दल हों या कोई अन्य दल हों। देश की शिक्षा व्यवस्था ने दलितों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करने में भूमिका क्यों नहीं निभाई?
– उदित राज, भाजपा सांसद
मिले आर्थिक और सामाजिक न्याय
दक्षिण में पेरियार आंदोलन से पहले समाज में दलित समुदाय के लोगों के लिए जलाशय, कुएं और यहां तक कि श्मशान घाट तक अलग होते थे। उन्हें मंदिरों में प्रवेश की मनाही थी। दलितों के साथ भेदभाव को समाप्त करने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की जरूरत है।
– डॉक्टर के गोपाल, अन्नाद्रमुक
कांग्रेस के साथ नहीं दलित
कांग्रेस ने आंबेडकर को भुला दिया इसलिए यह समाज कांग्रेस से दूर होता जा रहा है और भाजपा के करीब आ रहा है इसलिए विपक्षी पार्टी को परेशानी हो रही है। राज्यों में दलित समाज पर अत्याचार की कितनी घटनाएं हो रहीं हैं, उससे अधिक अहम है कि इन्हें कैसे रोका जाए। गुजरात के दलित कांग्रेस के साथ नहीं हैं। इसका कारण है कि जब गुजरात के गोधराकांड में मारे गए सारे लोग दलित थे तो कांग्रेस ने कुछ नहीं कहा और बाद में जब दंगों में लोग मारे गए तो उसे चिंता हुई। जब राज्यों में चुनाव होने होते हैं तो विपक्ष इस तरह के मुद्दे उठाता है।
– अर्जुन राम मेघवाल, केंद्रीय मंत्री

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