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एक सपने की मौत

दिल्ली के रायन इंटरनेशनल स्कूल में शनिवार को एक सपने की भी मौत हुई। एक सपना जो नन्हें दिव्यांश की आंखों ने देखा और जो साकार होने से पहले ही आपराधिक लापरवाही की वजह से टूट गया।

दिल्ली के रियाल इंटरनेशनल स्कूल का स्टूडेंट दिव्यांश

दिल्ली के रायन इंटरनेशनल स्कूल में शनिवार को एक सपने की भी मौत हुई। एक सपना जो नन्हें दिव्यांश की आंखों ने देखा और जो साकार होने से पहले ही आपराधिक लापरवाही की वजह से टूट गया। एक सपना जो दिव्यांश के परिवार ने उसे लेकर देखा और जिसे साकार करने के लिए उन्होंने एक नामी-गिरामी स्कूल में उसे पढ़ने के लिए भेजा। लेकिन इस सपने का हासिल निहायत हौलनाक और दहला देने वाला निकला। नन्हें दिव्यांश ने जिस स्कूल के प्रांगण में जिंदगी से लड़ने और उसकी चुनौतियों से निपटने का सबक सीखना था, वहीं उसे काल के गाल में समा जाना पड़ा।

सोमवार को शायद स्कूल सामान्य तौर पर चल पड़ेगा। अपनी रोजमर्रा की प्रार्थना और पढ़ाई के दौर से। सोमवार नहीं तो अगले सोमवार तक तो वहां सब सामान्य हो ही जाएगा। लेकिन स्कूल के खेल-कूद और कक्षा अनुशासन में अगर कुछ नहीं होगा तो वह है दिव्यांश। जो स्कूल की कथित लापरवाही के चलते खुले सेप्टिक टैंक में गिर कर अपनी जान गंवा बैठा। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जहां दिव्यांश ने अपनी पढ़ाई के दौरान, डेढ़ साल के अंतराल में अनुशासन का शुरुआती पाठ पढ़ा वहीं वह पाठ पढ़ाने वालों की ही अनुशासनहीनता का शिकार हो गया। दिव्यांश की मौत से यह बड़ा सवाल उठता है कि ऐसी आपराधिक लापरवाही को रोकने के लिए क्या स्कूल प्रबंधन को अपने यहां सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त मुहैया कराने को लेकर अनुशासित नहीं होना चाहिए?

देश में शिक्षा प्रणाली पर बहस बड़ी पुरानी है लेकिन अफसोस की बात यह है कि पिछले एक अरसे से शिक्षा की मिशनरी भावना को गहरी ठेस लगी है क्योंकि स्कूलों, कालेजों और उच्च शिक्षा संस्थानों के नाम पर दुकानें खोली जा रही हैं और खेद की बात यह है कि लगभग सभी सरकारें इसे बढ़ावा दे रही हैं।

इससे भी बड़े खेद की बात यह है कि हालिया दिनोें में ज्यादातर स्कूलों का प्रबंधन राजनीतिकों के हाथों में सरक गया है। दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल ने अपना नाम बेचना शुरू किया और उसके खरीदार भी ज्यादातर राजनीतिक ही हैं। स्कूल का दिल्ली प्रबंधन भी एक आला नेता के हाथों में है। इसी स्कूल की देखादेखी कई स्कूलों ने अपना ब्रांड बेचना शुरू किया और शृंखला बनाने की इसी होड़ में कई कारोबारी आगे आए और मुनाफाखोरी के लिए प्रतिष्ठित स्कूलों के नाम खरीदने शुरू कर दिए और जाहिर है कि सुरक्षा मानक ताक पर रख दिए।

स्कूलों के नाम पर निजी प्रबंधन के तहत कुकुरमुत्तों की तरह जो दुकानें खुली हैं उनमें सुविधाओं के नाम पर भारी भरकम फीस वसूली जाती है। फीस के मुद्दे पर दो मत हो सकते हैं कि यह ज्यादा हो कि न हो। एक पक्ष यह है कि चूंकि ज्यादा सुविधाएं हैं इसलिए उनकी कीमत भी ज्यादा है। लिहाजा बहुत सारे मामलों में फीस और उसमें बढ़ोतरी न्यायोचित ठहरा दी जाती है। लेकिन उन सुविधाओं का रख-रखाव कौन करेगा? यह एक अलग सवाल है। सुविधाओं की जब कीमत ज्यादा ली जा रही है तो उनको बनाए रखना भी तो जरूरी है।

सभी अभिभावक स्कूल प्रबंधन की क्षमता पर विश्वास रखते हुए ही उसे ज्यादा फीस देने से भी गुरेज नहीं करते। ऐसे में ऐसी लापरवाही का दोष भी तो प्रबंधन पर ही जाएगा। इस मामले में मुकदमा दर्ज करते हुए क्यों न प्रबंधन पर विश्वासघात का दोष भी लगाया जाए। अपनी गलती के लिए रटी रटाई सफाई तो सबके पास होती है लेकिन उसकी आड़ में लापरवाही से बचाव कैसे हो सकता है? यह कहना, कि बच्चे के गुम होने के बाद उसे ढूंढ़ने की जो प्रक्रिया तय की गई है उस पर पूरा अमल किया गया, सिरे से खारिज होने लायक है। बच्चा कक्षा से निकल कर काफी दूर स्थित सेप्टिक टैंक तक पहुंच गया। क्या कोई बताएगा कि सेप्टिक टैंक से जुड़े जो सुरक्षा उपाय तय हैं उनका पालन क्यों नहीं किया गया? क्या कोई बताएगा कि टैंक कब से ऐसे ही खुला पड़ा था और उसे ढका क्यों नहीं गया?

स्कूल प्रबंधन की ओर से दी गई इस लचर सफाई पर तरस आता है। पढ़े लिखों से यह अपेक्षा शायद ही किसी को हो। सच यह है कि दिव्यांश की मौत एक हादसा न होकर एक अपराध है जिसकी सजा भी तय मानदंडों के अनुसार ही हो। दिव्यांश की मौत को भी बलिदान की श्रेणी में ही रखा जाएगा और सच भी यही है कि दिव्यांश स्कूल की आपराधिक लापरवाही की बलि चढ़ गया।

दिव्यांश की मौत अब जांच के दायरे में है लेकिन ऐसा न हो कि यह जांच दूसरी जांच समितियों की तरह एक रिपोर्ट मात्र बन कर रह जाए। यह मौका है ऐसी तमाम लापरवाहियों को सूचीबद्ध करके उनके लिए भविष्य में भी जवाबदेही तय करने का। तय प्रक्रिया की दुहाई देकर बच निकलने का रास्ता बंद करना होगा। यह मौका है शिक्षा के बाजारीकरण पर एक बहस छेड़ने का ताकि भविष्य में किसी भी बच्चे को दिव्यांश जैसी नियति से बचाया जा सके। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं कि बच्चों को खेलते कूदते चोट आ जाए और उनको सभी स्वीकारते हैं लेकिन यहां मसला लापरवाही से जुड़ा है। जिसके लिए सबक पढ़ाने वालों को ही सावधानी का सबक सिखाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

देश की राजधानी में ऐसी घटना पर सहज ही विश्वास नहीं होता। स्कूलों में ऐसी लापरवाही का खमियाजा तो उनको भुगतना है जिनके लिए दिव्यांश की मौत का नासूर ताजिंदगी रिसता रहेगा। सरकारों को भी चाहिए कि ऐसे मसले पर वे जोर इस बात पर रखें कि उनका दोहराव रुके। देश के दूसरे हिस्सों से भी अक्सर ऐसी खबरें आती हैं। क्यों न स्कूलों में छात्रों की सुरक्षा से जुड़े जो मानक तय हैं उन पर एक पुनर्दृष्टि डाली जाए और अगर उनमें बदलाव की जरूरत है तो यह काम पूरी गंभीरता से किया जाए। तब तक जो मापदंड हैं उनको सख्ती से लागू किया जाए।

क्यों हमें जगाने के लिए एक हादसे की जरूरत है? क्यों हमें अपने कर्तव्य पालन कोप्रेरित करने के लिए किसी दिव्यांश को अपने प्राण देने पड़ें? आखिर छात्रों की सुरक्षा, स्कूल प्रबंधन का कर्तव्य ही तो है। यह दुखद है कि ऐसे नाजुक मौके पर भी प्रबंधन का बचाव का रास्ता क्रूर और संवेदनहीन ही रहा। ‘हमारा कुसूर नहीं है।’ इस स्वार्थपरक रक्षात्मक तर्क के आलोक में तो यह और भी जरूरी है कि किसका कुसूर है। यह तय किया जाए और उसका हिसाब भी लिया जाए। तभी उन मां-बाप को इंसाफ मिलेगा, जिन्हें अब सिर्फ इंसाफ की ही दरकार है। दिव्यांश और उसके सपने तो सो ही चुके।

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