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क्या आज आम भारतीय नेहरू को याद कर सकता है?

Jawaharlal Nehru Birth Anniversary: आज सही मायनों में नेहरू की उसी सामंजस्यता की बहुत जरुरत है, वसुदैवता परिवारों की इकाई तक समाप्त होती जा रही है, तो राजनीतिक स्तरों पर मिल पाना किसी सपने से कम नहीं।

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू। (फोटो सोर्स इंडियन एक्सप्रेस)

Jawaharlal Nehru Birth Anniversary: वर्तमान में भारत की समष्टि से व्यष्टि की ओर सिमटती राजनीति के कारण आम भारतीय तक देश के महापुरुषों को याद करते हुए घबराने लगे हैं। जब भी किसी ऐतिहासिक राजनीतिक भारतीय महापुरुष को लेकर बात करनी होती है, तो सबसे पहले ध्यान जाता है कि कहीं यह विचारविमर्श आपको किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा विशेष से न जोड़ने लगे। आज 14 नवम्बर को जब कोई लेखक पंडित नेहरू पर लिखना चाहता है, तो लोगों के पूर्वाग्रही दृष्टिकोणों के भय परेशान करने लगते हैं। निरपेक्ष भारत में भी धर्मगत, जातिगत, दलगत, महापुरुषगत सापेक्षताएं कुछ लिखने कहने के पहले दस बार सोचने को मजबूर करने लगी हैं। निःसंदेह इसके लिए किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल को दोष नहीं दिया जा सकता। ऐसी भयावहता की परिस्थिति को जन्म देने में सभी की बराबर भूमिका कही जा सकती है।

सत्ताओं के वर्ष और संघर्ष कितने भी रहे हों, परन्तु भारत का अधिकांश समय छींटाकशी और अनर्गल विलापों में ही नष्ट होता रहा है। सम्भवतः होता भी रहेगा। इन सबके बीच जो देश ने सकारात्मक पाया है, वही सही मायने में विकास है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और उनकी यथाशक्ति साकारसृजिता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करता है। नेहरू को भारत में जो भी स्थान मिला, वो उनकी सृजनशक्ति ही कही जा सकती है। विरोधी यदि यह मानते हैं कि उनकी हठधर्मिता और धनाढ्यता से उन्होंने वह सब पाया, किसी की अपने आगे चलने नहीं दी, तो इसमें भी कहीं न कहीं उस व्यक्ति विशेष की दृढ़ सोच दर्शाती है। नेहरू को प्रेम करने वाले भी इसलिए हैं क्योंकि वे कहीं न कहीं उनकी सोच और समझ का निरादर नहीं कर सकते। अर्थात् दोनों ही तथ्य नेहरू को एक सोच का दर्जा देते हैं।

निष्पक्षतौर पर विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट दिखता है कि स्वतंत्रता के बाद से आधुनिक भारत के निर्माण में नेहरू ने अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रयोग किया। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश में कृषि, उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा, विदेश, व्यापार आदि लगभग सभी क्षेत्रों में एक नई विचारधारा के साथ काम को शुरु करने की सोच उनकी लेखकीय और वैज्ञानिक शैली को दर्शाती है। किसी राष्ट्र प्रमुख का किसी क्षेत्र विशेष में सफल होना या न होना उसकी व्यक्तिगतता पर बिल्कुल निर्भर नहीं करता। आज जो लोग किसी भी महापुरुष के बारे में सुन या बोल रहे हैं, वो सिर्फ दस्तावेजों के आधार पर हैं। एक घर में रहकर भी लोग अपने ही सदस्यों के व्यक्तिगत व्यवहार को समझ नहीं पाते, तब दस्तावेजों के आधार पर किसी की व्यक्तिगतता का विश्लेषण सटीकता के साथ कर पाना बेहद मुश्किल है। फिर नेहरू एक प्रधानमंत्री के नाते पूरे देशरुपी परिवार के ऐसे सदस्य थे, जिनके जितने चाहने वाले रहे होंगे, तो उतने ही नफरत करने वाले भी। ऐसे में नेहरू की व्यक्तिगतता के आधार पर उनको कोसने वाले कितने सही हो सकते हैं, इसमें संदेह है।

भारत में राजनेताओं के व्यक्तिगत होते दौर ने सम्पूर्ण राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय व्यवस्था को चरमरा दिया है। भाषाएं और भाव स्तरहीनता की हदों को पार कर रहे हैं। राष्ट्र के उत्तरदायीपूर्ण पदों तक पहुंचने के लिए असत्यता के इस्तेमाल में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं हो रही है। देश के समस्त निकषों पर नेताओं का खरापन उतर ही नहीं पा रहा है। जिम्मेदार सब हैं, क्योंकि नेहरू जैसी समग्र विद्वसोच का अभाव दिखता है। उच्च महत्वाकांक्षाओं के कारण ही सही (जैसा कि उनके विरोधी आरोप लगाते हैं) स्वयं को सर्वोपरि रखकर भी सबको साथ लेकर चलने की सीख नेहरू के व्यक्तित्व से सीखी जा सकती है। क्योंकि जो साथ काम कर रहे थे वे निरामूर्ख तो कदापि नहीं थे, कि भेड़चाल में काम करते रहे हों। वो एक यथोचित सामंजस्य का दौर रहा होगा या कि भारत की मिट्टी की वसुदैव कुटुम्बता की आनुवांशिकताएं रही होंगी, जिसमें नेहरू भी समाए ही रहे होंगे।

आज सही मायनों में नेहरू की उसी सामंजस्यता की बहुत जरुरत है, वसुदैवता परिवारों की इकाई तक समाप्त होती जा रही है, तो राजनीतिक स्तरों पर मिल पाना किसी सपने से कम नहीं। हां यह बिल्कुल सच है कि भारत ने सपने देखना नेहरू से सीखा, यहां तक कि साकार करना भी सीखा। नेहरू को उनके राजनीतिक दल और व्यक्तिगत व पारिवारिक प्रवृत्तियों से इतर एक लेखकीय और वैज्ञानिक सोच के आधार पर देश निरपेक्ष तौर पर याद कर सकता है। तब शायद किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

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