ताज़ा खबर
 

क्या सचमुच जदयू में बगावत होगी? शरद यादव उसके नायक होंगे?

जदयू के दोनों शीर्ष नेताओं के बीच "मतभेद" की ताजा वजह साल 2016 में नीतीश द्वारा शरद को जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से बेदखल किए जाने को बताया जाता है।
Author July 27, 2017 17:40 pm
23 जुलाई को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के विदाई भोज में शरद यादव (बाएं) और मुलायम सिंह यादव। (PTI Photo by Shahbaz Khan)

बिहार जिसके होनी की आशंका पिछले कुछ महीनों से जतायी जा रही थी वो बुधवार (26 जुलाई) रात हो गई। “सांप्रदायिक ताकतों को रोकने” के लिए नीतीश कुमार ने साल 2015 में पुराने राजनीतिक दुश्मन लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाया था, तो अपनी सरकार के दो साल पूरे होने से पहले ही “भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने” के लिए नए दोस्त का हाथ झटक दिया। नीतीश और लालू के ब्रेक-अप के पहले से ही मीडिया में खबरें आ रही थीं कि जदयू टूट सकती है। लालू यादव और उनके पुराने साथियों पर जदयू विधायकों से तोल-मोल के आरोप लगे। एक अंग्रेजी दैनिक ने दावा किया कि लालू ने नरेंद्र मोदी सरकार के दो मंत्रियों के पास अपने दूत भेजे थे और कहलवाया था कि आप कहें तो “हम नीतीश के नीचे से कुर्सी खींच लें।” अब जब नीतीश बीजेपी के समर्थन से दोबारा मुख्यमंत्री बन चुके हैं तो एक बार फिर ये आशंका जतायी जा रही है कि विश्वास मत प्राप्त करना उनके लिए टेढ़ी खीर होगी और जदयू टूट जाएगी।

गुरुवार (27 जुलाई) को नीतीश ने सीएम की और बीजेपी नेता सुशील मोदी ने डिप्टी-सीएम पद की शपथ ली। लेकिन शरद यादव शपथ-ग्रहण में नहीं पहुंचे। वहीं जदयू के राज्य सभा सांसद अली अनवर ने मीडिया में खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी। अली अनवर ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, “नीतीश जी ने अपनी आत्मा की आवाज पर बीजेपी के साथ जाने का फैसला किया लेकिन मेरा जमीन गंवारा नहीं करता।” इससे पहले जब नीतीश ने विपक्षी एकता तो झटका देते हुए एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा की थी तो केरल से जदयू सांसद वीरेंद्र कुमार ने पार्टी की राय को दरकिनार कर दिया। वहीं शरद यादव तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को गैर-जरूरी बता चुके हैं, जबकि बिहार के रंगमंच पर खेले गए इस नाटक की धुरी तेजस्वी के इस्तीफे की मांग को बनाई गई है।

खबरों में दावा किया गया कि जदयू के 71 विधायकों में से एक दर्जन से ज्यादा विधायक और करीब आधा दर्जन सांसद (पार्टी के पास कुल 12 सांसद हैं) बीजेपी के साथ गठबंधन करने पर पार्टी से बगावत कर सकते हैं। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार सरफराज आलम, मुजाहिद आलम, सरफुद्दीन आलम और नौशाद आलम जैसे जदयू विधायक बागी हो सकते हैं। जदयू और बीजेपी के फिर से हमराह होने के बाद  शरद यादव और अली अनवर के रुख से बगावत के अंदेशों को हवा मिल रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने शरद यादव से चर्चा की है। गुरुवार को ही लालू यादव ने भी कहा कि वो शरद यादव से बात करेंगे। तो क्या सचमुच जदयू में बगावत होगी और शरद यादव उसके नायक होंगे?

जदयू के दोनों शीर्ष नेताओं के बीच “मतभेद” की ताजा वजह साल 2016 में नीतीश द्वारा शरद को जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से बेदखल किए जाने को बताया जाता है। जाहिर है शरद के लिए ये अपमानजनक रहा होगा। लेकिन शरद को पता है कि नीतीश ही जदयू का एकमात्र स्वीकार्य चेहरा हैं और उनके बिना पार्टी का वजूद ही खतरे में होगा। राजनीतिक अंदरखाने में ये भी चर्चा है कि जदयू और बीजेपी का गठजोड़ बिहार के अलावा केंद्र में भी रंग दिखाएगा। जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश कुमार और शरद यादव मंत्री थे उसी तरह नरेंद्र मोदी सरकार में भी जदयू के दो नेताओं को मंत्री पद दिया जा सकता है। शरद यादव की हालिया नाराजगी और एनडीए सरकार में मंत्री पद के अनुभव को देखते हुए अगर केंद्रीय कैबिनेट में एक सीट उन्हें मिले तो किसी को हैरत नहीं होगी। और ऐसा हुआ तो शायद शरद को भी नीतीश से कोई शिकायत नहीं होगी। जदयू के कुछ नेताओं का दावा है कि जब नीतीश बीजेपी से अलग हुए थे तो शरद उसके खिलाफ थे। लेकिन अब शरद नीतीश के खिलाफ चले भी जाते हैं तो बिहार और पार्टी के अंदर उनकी सीमित ताकत को देखते हुए उनके लालू के साथ जाने से जदयू की सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।

रही बात असंतुष्ट विधायकों की तो ध्यान रहे अभी नीतीश कुमार ने अपने नए मंत्रिमंडल का गठन नहीं किया है। जाहिर है “धर्मनिरपेक्षता” और “सत्ता” के बीच संघर्ष होगा तो बड़े-बड़ों के बगावती तेवरों पर पानी पड़ जाएगा। रही बात यादव विधायकों के लालू के साथ जाने की तो लालू यादव द्वारा अपने नौसिखुए बेटों को पहली बार विधायक बनते ही मंत्री बनाने के बाद स्थानीय यादव नेता बिफर पड़े थे। दबंग नेता पप्पू यादव पहले ही राजद से निष्कासित हैं। राम कृपाल यादव को लालू के पुत्री मोह की वजह से बीजेपी से हाथ मिलाना पड़ा था। बिहार के वरिष्ठ नेता नवल किशोर यादव ने भी ऐसी ही वजहों से राजद छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया था। राजनीति जानकारों की मानें तो इन सभी नेताओं को देर-सबेर ये “ज्ञान” हो गया कि दशकों तक लालू के “आज्ञापालन” के बाद उन्हें उनके ‘नौसिखुए” बेटों का हुकुम बजाना पड़ेगा। अपने राजनीतिक भविष्य की राह में तेज और तेजस्वी नामक रोड ब्रेकर देखकर जदयू के महत्वाकांक्षी यादव नेता शायद ही विद्रोह की राह पकड़ें। राजनीतिक चारागरों की मानें तो असंतुष्ट विधायक के दर्द को मंत्री पद की दवा से करार आ ही जाएगा। खबरों के अनुसार गुरुवार शाम शरद यादव, अली अनवर और वीरेंद्र कुमार की बैठक होनी है। जदयू के बाकी बागी बताए जाने वाले नेता भी बैठक में शामिल हो सकते हैं। उसके बाद साफ हो जाएगा कि बगावत का ये ऊंट किस करवट बैठेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.