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इंटरनेट का उपयोग क्या हमारा बुनियादी मानवाधिकार है?

जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने और अब संशोध‍ित नाग‍र‍िकता कानून आने के बाद हो रहे व‍िरोध को दबाने के ल‍िए जगह-जगह इंटरनेट बंद क‍िया गया। इसके मद्देनजर कुछ तथ्‍य बता रहे हैं डॉ. स्वर्ण सुमन, असिस्टेंट प्रोफेसर (जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।

CAA, CAB, CAA unrest, internet shut down, internet, Internet access, Internet access block, india, UNO, nrc, npr, United Nations, Citizenship amended act 20192011 में स्पेन ने ब्रॉडबैंड इंटरनेट को कानूनी अधिकार का दर्जा दिया। (Photo Source, Illustration: Mithun Chakraborty)

डॉ. स्वर्ण सुमन

संशोध‍ित नाग‍र‍िकता कानून के व‍िरोध को लेकर सारे देश में अराजक स्थिति उत्पन्न हो गयी है। सुरक्षात्मक उपाय के मद्देनजर सरकार ने वाराणसी समेत देश भर के कई शहरों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी ताकि लोगों को सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान से वंचित रखा जा सके। वास्तव में दुनिया भर के देशों की सरकार ने अपने खिलाफ उठे आंदोलन में सोशल मीडिया के प्रभाव को देखते हुए इस पर नियंत्रण और इसकी सीमाएं तय करनी शुरू कर दी है। ज्यादातर सेंसरशिप को यह कहकर न्यायोचित ठहराया जाता है कि ऐसा करना राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से लड़ने के ल‍िए जरूरी है। लेकिन, अक्सर सरकार इनका प्रयोग ऐसी सामग्री को सेंसर करने के लिए करती है जो उन्हें पसंद नहीं है या जिनसे वो असहमत हैं। सवाल खड़ा होता है कि क्या लोगों को इंटरनेट के उपयोग और ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है?

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2011 को जारी रिपोर्ट ‘United Nations Special Rapporteur on the Promotion and Protection of the Right to Freedom of Opinion and Expression’ में कहा है कि लोगों को इंटरनेट के उपयोग से अलग रखना मानव अधिकारों का उल्लंघन और अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। इंटरनेट तक पहुंच सभी मनुष्यों का अधिकार है और किसी राष्ट्र को अपने नागरिकों को इंटरनेट के पहुंच से रोकने के लिए कोई नियम नहीं बनाना चाहिए।

ये देखते हुए कि इंटरनेट असमानता से लड़ने के साथ-साथ मानव प्रगति और विकास को बढ़ावा देने जैसे बहुत से मानवाधिकारों के लिए एक अनिवार्य साधन बन चुका है, इसलिए इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराना सब देशों की प्राथमिकता होनी चाहिए। इस विचार को आगे बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद के सभी 47 सदस्य देशों ने 5 जुलाई 2012 को इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए कि लोगों को इंटरनेट से जुड़ने और स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्ति की गारंटी दी जानी चाहिए।

कुछ देशों में इंटरनेट का उपयोग एक कानूनी अधिकार के रूप में भी मौजूद है। 2010 में फ़िनलैंड दुनिया का पहला देश बना जिसने अपने नागरिकों के लिए ब्रॉडबैंड इंटरनेट उपयोग को कानूनी अधिकार प्रदान किया। 2011 में स्पेन ने ब्रॉडबैंड इंटरनेट को कानूनी अधिकार का दर्जा दिया। भारत की बात करे तो 2019 में केरल उच्च न्यायालय ने इंटरनेट के अधिकार को शिक्षा के मौलिक अधिकार के एक भाग के साथ-साथ अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार के अंतर्गत माना था।

आज अधिकांश चीजें इंटरनेट आधारित हो गयी हैं। सूचनाओं का आदान-प्रदान, संचार, व्यापार, शिक्षा, मनोरंजन के साथ-साथ दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों के लिए इस माध्यम पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है। स्थिति यह उत्पन्न हो गयी है कि लोगों को सूचना के इस शक्तिशाली उपकरण से वंचित रखना निश्चय ही उनके सर्वांगीण विकास के लिए बाधक होगा। इसलिए भौतिक दुनिया के मानव अधिकारों को डिजिटल दुनिया में भी उसी रूप में संरक्षित किये जाने की जरूरत है।

(इसमें व्‍यक्‍त व‍िचार लेखक के न‍िजी हैं।)

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