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बदलना होगा मौसम को देखने का अंदाज : हर्षवर्धन

राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ से 60 के दशक में अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने वाले हर्षवर्धन दिल्ली की सत्ता के गलियारों में अपनी छाप छोड़ने के बाद अब केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री हैं। हर्षवर्धन का मानना है कि अगर मौसम और विज्ञान का तालमेल सही बैठ जाए तो बहुत से क्षेत्रों में देश की सेहत दुरुस्त हो सकती है। मौसम की नब्ज पकड़ते हुए डॉक्टर हर्षवर्धन से जनसत्ता के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत
केंद्रीय मंत्री व चांदनी चौक से सांसद डॉ. हर्षवर्धन

सवाल : कुछ समय पहले तक देश का मौसम विभाग बहुत भरोसेमंद नहीं रहा था। अगर खबर धूप की है तो लोग बारिश की आशंका से भी घिर बैठते थे और चेतावनी बारिश की हो तो भी घर के आंगन में पापड़ सूखने के लिए डाल दिए जाते थे। लेकिन पिछले समय में हालात बदले हैं। मौसम विज्ञान को एक विधा की तरह लिया जा रहा है और विभाग की भविष्यवाणी से आम लोगों को फायदा मिल रहा है।

’आप की बात बिलकुल सही है। हम कुछ बेहतर स्थिति में आ चुके हैं। अब मौसम को देखने का अंदाज बदलना होगा। मौसम विज्ञान को मजबूत करना अभी हमारी पहली प्राथमिकता है। यह आम लोगों के जीवन से जुड़ा है, उन्हें प्रभावित करता है इसलिए अब इसके लिए पर्याप्त बजट की भी व्यवस्था की गई है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मौसम विभाग का देश के विकास में बड़ा योगदान हो सकता है। लिहाजा सबसे पहले यह तय किया गया कि मौसम विभाग की तकनीक का लाभ देश के किसानों को पहुंचाया जाए। विभाग ने चार सौ करोड़ के बजट के साथ मानसून मिशन की स्थापना की है। मकसद साफ है कि देश में मानसून को लेकर जहां तक संभव हो, विश्वसनीय भविष्यवाणी की जाए ताकि फसल और उससे जुड़े तमाम काम व्यवस्थित हो सकें। यही वजह है कि अब भविष्यवाणी को भी समयबद्ध तरीके से सीमित कर दिया गया। जैसे 20 दिन, 10 दिन या फिर पूरे मौसम तक।

सवाल : किसान और खेत बनाम देश की अर्थव्यवथा में मौसम विभाग अपनी भूमिका किस तरह बढ़ा रहा है? मौसम विज्ञान से किसानों को जोड़ने की क्या कवायद है?
’विभाग इस समय सूखा प्रतिरोधक तकनीक विकसित करने की प्रक्रिया में है ताकि किसान को समुचित या बारिश न होने की सूरत में भी कम से कम नुकसान झेलना पड़े। यही वजह है कि मानसून में कमी का पहले से अनुमान हो जाने के कारण संबद्ध कदम उठाना संभव हो पाता है ताकि कम से कम नुकसान हो। वह समय दूर नहीं जब किसान को मौसम से जुड़ी सूचना एसएमएस द्वारा ही पहुंचा दी जाए। यह सेवा हालांकि शुरू है, लेकिन इसे और मजबूत किया जा रहा है। इस समय ‘एग्रो मेट एडवाइजरी’ सेवा के तहत देश के करीब 608 जिलों के किसानों को उनकी अपनी स्थानीय भाषा में यह सेवा दी जा रही है। ‘नेशनल एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च’ के एक सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि एग्रो मेट सेवाओं के कारण देश की चार प्रमुख फसलों गेहूं, चावल, गन्ना और कपास को करीब 42 हजार करोड़ का वित्तीय लाभ हुआ। यह आंकड़ा बहुत राहत पहुंचाने वाला है। इससे जाहिर है कि इन सेवाओं के और मजबूत हो जाने से कितना लाभ होगा।

सवाल : मौसम विभाग अब शीतलहर को लेकर भी भविष्यवाणी जारी करने की तैयारी में है। सर्दियों में मौसम की मार से निपटने में इससे मदद मिलने की उम्मीद है?
’जी बिलकुल। हमारा दूसरा अहम क्षेत्र आम लोगों को मौसम सेवाओं का लाभ देना था। देश में सर्दी के मौसम में धुंध से होने वाली दुर्घटनाओं को देखते हुए विभाग ने शीतकालीन कोहरे पर नजर रखने की खास योजना बनाई जिसे पहली बार इंदिरा गांधी अंतरराष्टÑीय हवाई अड्डे पर प्रयोग किया गया। इसका उद्देश्य था कि शीतकालीन कोहरे की पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास हो ताकि हादसों से बचा जा सके। हमें इसके शुरुआती व सकारात्मक लाभ मिले हैं। जल्द ही इसमें ज्यादा से ज्यादा अचूक भविष्यवाणी देने का प्रयास होगा। शीतलहर और मानसून ही नहीं वरन जबर्दस्त लू की वजह से लोगों को हर साल जानी नुकसान झेलना पड़ता है। अब विभाग ने गर्म दिनों, अप्रैल से जून तक सीजन के हिसाब से भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी है। इस भविष्यवाणी को 20 दिनों तक सीमित किया गया है।

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सवाल : हमारे आम जीवन से लेकर अदालत के हथौड़े तक वायु प्रदूषण अभी सबसे बड़ी बहस है। वायु की गुणवत्ता को लेकर मौसम विभाग की क्या कवायद है?
’आम आदमी से जुड़ा दूसरा अहम पहलू वायु की गुणवत्ता का अनुमान लगाना है। देश में बढ़ रहे प्रदूषण के खतरे से निपटने के लिए विज्ञान व तकनीकी विभाग ने ‘एअर क्वालिटी फोरकास्टिंग एंड रिसर्च’ की स्थापना की है। इसके तहत क्षेत्र विशेष में समयबद्ध तरीके से वायु की गुणवत्ता का अनुमान लगाया जाता है। इसमें सभी गैसयुक्त प्रदूषणों जैसे नाइट्रोजन के आॅक्साइड, ओजोन, कार्बन मोनोआॅक्साइड व दूसरे हाइड्रो कार्बन का पता लगाया जाता है। इसी के तहत घातक 2.5 पीएम (सूक्ष्म कणों) का भी अनुमान लगाया जाता है। दिल्ली में हाल ही में इसका सफल आकलन भी किया गया। इस कार्यक्रम में अभी तक मुंबई, दिल्ली व पुणे हैं और जल्द ही अमदाबाद भी इसमें शामिल हो रहा है। इसे बाकी बड़े शहरों में ले जाने की योजना भी है।

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सवाल : मौसम विभाग पिछले कुछ समय में सटीक भविष्यवाणियां कर रहा है। लेकिन यह बताएं कि आपका विभाग पूरी तरह अखबारों के पन्ने से ‘कार्टून मुक्त’ कब तक हो पाएगा।
’(हंसते हुए…) कुदरत की थाह पाना उतना भी आसान नहीं। यों भी हरेक भविष्यवाणी तो बड़े-बड़े नजूमियों की भी ठीक नहीं होती। जल से भरे हुए बादल की गति कब और कहां अवरुद्ध हो जाए और वह कहां बरस जाए यह कहना थोड़ा कठिन है। लेकिन पिछले एक दशक का इतिहास अगर देखा जाए तो मौसम से जुड़ी सभी बड़ी भविष्यवाणियां काफी सटीक रही हैं। हर बार जब भविष्यवाणी में कोई हेरफेर होती है तो हमें यह जानने का मौका रहता है कि इसके क्या कारण रहे। और उनकी पड़ताल इसे अगली बार और सटीक बनाने में मदद करती है।
सवाल : आरोप है कि भारत में मौसम को परखने का इंतजाम अभी भी पुरातनपंथी है। हमारी मशीनें व उन पर काम करने वाले उतने आधुनिक नहीं हैं जिस कारण अक्सर मौसम के अनुमान लड़खड़ा जाते हैं। अभी हम 20 दिन और 10 दिन के अनुमान पर अटके हैं जबकि मौसम का मिजाज कई बार 24 घंटे के अंतराल पर बदल जाता है। विभाग इस क्षेत्र में अपनी तकनीक कब तक मजबूत करेगा?
’मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूं। देश का मौसम विभाग बहुत ही व्यवस्थित हो चुका है। यह विज्ञान एवं तकनीकी विभाग का अहम हिस्सा है जिसका बजट निर्धारण भी पर्याप्त है। यह सच है कि भविष्यवाणी को सटीक करना जरूरी है लेकिन यह महज वक्त की बात है और इस दिशा में अहम प्रयास पहले ही किए जा चुके हैं।

 

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