Women's Day 2018 Quotes, Antarrashtriya Mahila Diwas: International womens day the satisfaction of single day internationality - Women's Day 2018: आज भी खत्म नहीं हुई है आवाज उठाने की जरूरत, महिलाओं की कोमलता को मजबूरी समझना बंद करे पुरुष - Jansatta
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Women’s Day 2018: आज भी खत्म नहीं हुई है आवाज उठाने की जरूरत, महिलाओं की कोमलता को मजबूरी समझना बंद करे पुरुष

International Women's Day 2018: विश्व समाज को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस सदियों तक मनाते रहने पड़ेंगे ताकि स्त्रियों की यशोगाथा पुरुष समाज को पुनः प्रधानता दर्शाने की त्रुटि न करने दे सके।

महिला दिवस के आयोजन में पुरुषों ने विशेष भूमिका निभाई है, आशा की जा सकती है कि घर से लेकर बाहर महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुरुष अपनी तत्परता दिखाएंगे।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा: यूं तो घर से लेकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक विश्व की महिलाएं विकसित और विकासशील और विकासहीन सभी तरह के देशों में मानवीय और सामाजिक दृष्टिकोण से सिर्फ और सिर्फ स्त्री ही समझी जाती हैं। सबला और अपराजिता होने के प्रमाण देना और इसके लिए सतत् संघर्ष उनकी नियति बनती गई है और इसलिए आवाज को बुलंद करना अनिवार्यता बन जाती है। यही वह अनिवार्यता थी जिसने विश्व की महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों सहित अनेक मुद्दों पर स्वअधिकारों हेतु आवाज़ उठाने के लिए बाध्य किया था और आज इस बात को 109 वर्ष हो रहे हैं, संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत किए भी 43 वर्ष गुजर गए हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि जो मुद्दे महिलाओं के लिए उठाए गए थे और जिनके लिए महिलाओं ने इतना कुछ सहन किया, पीड़ाएं झेलीं और कहीं कहीं तथाकथित मर्यादाएं भी तोड़ीं, उनके सुफल स्वरुप विश्व की महिलाओं ने स्वयं को हर क्षेत्र में साबित भी किया है, स्थापित भी किया है।

आस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी, अमेरिका, रुस और स्विट्ज़रलैंड सभी की महिलाओं ने अपने अपने स्तर पर विजय प्राप्त की है। निश्चितरुप से यह अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की विजयगाथा है। यह अवश्य है कि संघर्ष की यात्रा थम नहीं पाती, क्योंकि सदियों के साथ महिला मुद्दे बदलते जा रहे हैं। पुराने मसले हल होते हैं और फिर कोई नया मोड़ आ जाता है, मानो स्त्रियां अपनी विजय का जश्न मनाने के लिए प्राकृतिक तौर पर अभिशप्त बना दी गई हैं। इसका एक कारण शायद यह कहा जा सकता है कि भले ही उन्होंने वोट देने के अधिकार को पा लिया हो या फिर शिक्षित और कामकाजी हो गई हों, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी मातृत्व की प्राकृतिक व नैतिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा। और उनकी इस कोमल भावना को पुरुषप्रधान मानसिकता विवशता और अशक्तता मान लेती है।

इस बात से बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता कि जहां हर देश के संवैधानिक प्रावधानों, व्यवस्थाओं और पुरुषों ने महिलाओं के प्रत्येक मसले को हल करने में अपना साथ दिया है, पर यह भी उतना बड़ा सच है कि वे कहीं न कहीं अपनी सोच को खुला विस्तार नहीं दे पाते। यही कारण है कि विश्व समाज को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस सदियों तक मनाते रहने पड़ेंगे ताकि स्त्रियों की यशोगाथा पुरुष समाज को पुनः प्रधानता दर्शाने की त्रुटि न करने दे सके।

भारत के संदर्भ में सोचा जाए तो वैदिक काल में समाज में पुरुष और स्त्रियों को बराबरी का स्थान मिला हुआ था। कालांतर में आए सोच के बदलाव ने समाज को पुरुषप्रधान स्वरुप दे डाला। वर्तमान पीढ़ी के लिए यह गम्भीरता से सोचने का विषय है कि पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को स्वयं की योग्यता और सर्वक्षमता सिद्ध करवा लेना इतना सरल सहज नहीं रहा होगा, जितना आज भारतीय युवतियों को लगता है। आज के समय में घरों से लेकर सड़कों तक स्वाधीन देर रातों तक घूम पाने की स्वतंत्रता हो या फिर घरेलू कामों को न करने की स्वेच्छा हो या फिर मनपसंद विषय की शिक्षा ग्रहण करना हो या फिर परिधान धारण करने से लेकर स्वसज्जा की स्वतंत्रता हो, घर में पिता और भाइयों के साथ समानता हो बहुत कुछ बदल गया है भारतीय समाज में। भारत की बुजुर्ग और प्रौढ़ महिलाओं की मौन आंखें ध्यान से देखिए, तो बहुत कुछ बोलती सी प्रतीत होती हैं। आंख बंद करके इशारों से अपनी बेटियों और वधुओं को हर काम करने की दी जाने वाली इज़ाजत उनकी अन्तरराष्ट्रीय जीत का सबसे बड़ा हस्ताक्षर है, जो उस स्याही से किया गया है, जिसे उन्होंने सिल लोढ़ों पर अपनी संवेदनाओं को पीसकर आज के पन्नों पर महिलाओं के भावी उज्जवल इतिहास को लिखने के लिए तैयार किया है।

हांलाकि समाज में कभी कभी पुरुष मानसिक विकृति की शिकार होती बच्चियों और युवतियों, यहां तक कि प्रौढ़ व बुजुर्ग महिलाओं की स्थितियां भविष्य के सुनहरे पन्नों में दाग लगाने पर विवश कर रही हैं। परन्तु इनसे निपटना तो होगा ही। इस सबमें से एक बात अवश्य सोचने पर बाध्य कर देती है कि क्या युगों पहले जो प्रधानता पाने की त्रुटियां पुरुष समाज ने की और स्त्रियों को समानता पर आने में युगों लग गए, वैसी ही कुछ गलतियां क्या समाज ने शुरु करनी आरम्भ कर दी हैं। यहां प्रधानता कहीं महिला समाज की न होने लगे, क्योंकि इस समय हमारे युवाओं में बढ़ रहे आक्रोश का कारण लड़कियों पर ज्यादा ध्यान देना भी है। पीढ़ी के अंतराल को समझना इस समय बहुत जरुरी है, क्योंकि बच्चे अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास को पढ़ भले ही लेंगे, परन्तु उसकी वेदना को महसूस कर पाना मुश्किल होता है, क्योंकि वे अपनी मांओं और बहनों में वैसी किसी विवशता को नहीं ढूँढ़ पाते, क्योंकि वर्तमान में वह समाप्त हो चुकी है। इसलिए वे समझ नहीं पाते कि व्यवस्था में उनके बारे में कम सोचते हुए अधिक ध्यान लड़कियों के उत्थान पर क्यों दिया जा रहा है। महिलाओं की स्थिति का सुधरना निःसंदेह बहुत जरुरी है, लेकिन आज के मासूम युवाओं की उपेक्षा के बल पर कदापि नहीं। जो तत्कालीन पुरुषप्रधानता ने किया, उससे समाज असंतुलित ही हुआ, उसका दोहराव न हो, इस बात का ध्यान रखा जाना बेहद जरुरी है।

इसी सामाजिक स्त्री-पुरुष दुराव ने आज भी कहीं कहीं पुरुषप्रधानता को व्यंग्य करने की अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता दे रखी है कि वे उलाहना मिश्रित व्यंग्य करते नहीं थकते कि भारत सुदूर अंचलों में आज भी नहीं बदला है। उनके लिए एक ही महत्वाकांक्षी उत्तर हो सकता है कि वो भी बदलेगा, क्योंकि सदियों की सुगबुगाहटें वहां थोड़ी देर से पहुंच पाती हैं। भारतीय महानगरों और ग्रामीण अंचलों में विकसित और विकासशील देशों का सा अंतर है। अतः जो फर्क विश्वस्तर पर देशों में दिखाई देता है, वही इनके मध्य दिखना लाज़मी है। लेकिन यदि इस सूत्र पर भारत की क्षेत्रीयता चलेगी, तो सुदूर ग्रामीण स्त्रियों की योग्यताओं के अस्तित्व भी साकार रुप लेंगे, इसमें ज़रा भी शक नहीं है। हाशियों की सीमाएं शिथिल हो रही हैं, भारत की संवैधानिक समानताएं विश्वास की जड़ें पकड़ने लगी हैं, भारतीय महिलाएं घरों से निकलकर विभिन्न क्षेत्रों से होते हुए अंतरिक्ष में स्थान बना चुकी हैं। निःसंदेह संख्याओं के अनुपात कुछ कम हैं, लेकिन इरादों की मजबूती में बहुत दम है।

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