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International Women’s Day: क्या महिलाओं के सम्मान के लिए सिर्फ एक दिन काफी है?

International Women's Day: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर अतिका अहमद फारूकी बता रही हैं कि महिलाओं के सम्मान के लिए सिर्फ एक दिन काफी क्यों नहीं है।

International Women: आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है

अतिका अहमद फारूकी
हम किस महिला की बात कर रहे हैं? मां की, बीवी की, बेटी की, बहन की, ऑफिस में साथ काम करने वाली लड़की की या सड़कों पर चलती हुई अंजान औरतों की? हक़ीकत ये है कि बहुत काम हो चुका है लेकिन और बहुत किया जाना बाक़ी है।

मिसाल के तौर पर- लड़कियों को ये सिखाना कि ‘ना’ कैसे कहा जाता है, बिना मां-बाप या ख़ानदान की बात काटते हुए अपनी ज़िंदगी का एक मकसद तय करना जरूरी है, अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार है, भले ही उसे मिलने में देर क्यों ना हो जाए। शादी के बाद अपने ससुराल में ही नहीं अपने नये घर में अपने पति के साथ एक नई ज़िंदगी बिताने और नये सिरे से ज़िदगी शुरू करने का हक हो।

इसके आगे भी बहुत कुछ है। जैसे- बच्चों को कैसी तरबियत दी जाएगी, उसमें मां का बराबर का अधिकार हो, रसोई में सिर्फ़ घर की लक्ष्मी ही नहीं घर के प्रभु का भी तो बराबर का हक और फ़र्ज़ है। और, ये भी कि अगर शादी सम्मान और सुकून ना दे पा रही हो तो उससे तमीज़ से निकल जाने की भी इजाज़त और माहौल हो।

ये छोटी-छोटी बातें एक लड़की की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को आसान बनाती हैं। एक घर में एक बेटी के पैदा होने की ख़बर को एक ख़ुशी का मौक़ा बनाती हैं। एक बेटे के मन में बाप ही नहीं, दफ्तर जाने वाली मां के लिए भी प्यार और एहतराम जगाती हैं।

नारी शक्ति की बड़ी-बड़ी बातों से पहले समंदर के छोटे-छोटे क़तरों की बातें की जानी जरूरी हैं। वैसे आपकी मर्ज़ी है, आख़िर संसार भी तो आपका ही है।

मेरी कामयाबी के पीछे मेरे मां-बाप का हाथ है, क्योंकि उन्होंने समंदर के छोटे-छोटे कतरों की बात पहले की और आज मुंबई में मेरे साथ रहकर मेरे सफ़र को फ़क्र और गर्व के साथ देखते हैं।

मेरे पापा ने हर मौक़े पर मेरा साथ दिया। स्कूल से लेकर कॉलेज तक अंग्रेज़ी मीडियम में पढ़ाया, हॉस्टल भेजा, कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की तैयारी करवाई, अलग-अलग शहरों में अकेले रही लेकिन पापा ने हाथ पकड़े रखा।

दिल्ली से मुबई के लिए मेरा कैम्पस प्लेसमेंट हुआ था, तब सब असमंजस में थे, मगर पापा खड़े रहे हर परेशानी के सामने, मेरा पहला घर मेरे पापा ने मुझे खरीदवाया, अपने ऊपर भरोसा रखना, लीक से हटकर चलना, अपना रास्ता ख़ुद तैयार करना, वक्त के साथ-साथ पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलना, सब पापा ने सिखाया।

पापा ने 90 के दशक में मुझे 2020 के मुताबिक तरबियत दी, यानि आने वाले वक्त के लिए तैयार किया और आज भी हर छोटे बड़े फ़ैसलों में मेरा साथ देते हैं…बिना रुके, बिना झुके। हर बेटी के लिए जरूरी है कि उसके परिवार में से कोई एक तो उसके साथ खड़ा रहे हाथ थामे। क्योंकि, एक लड़की की तरक्की में उसकी पूरी पीढ़ी की तरक्की है और एक पीढ़ी की तरक्की में आने वाली हर पीढ़ी की उड़ान।

(अतिका अहमद फारूकी, लेखिका और कलर्स चैनल के सेलिब्रिटी चैट शो की होस्ट हैं। उन्होंने हाल ही में UNHRC में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था।)

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