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महिला दिवस 2017: आजाद नहीं हूं मैं अगर मैंने अपना नाम बताया तो छिन जाएगी लिखने की आजादी

Women's Day 2017: अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस: 8 मार्च वो दिन जिसे हर कोई महिलाओं की आजादी वाला दिन कहते हैं। फिर क्यों नहीं है मिली ये आदाजी।
Author नई दिल्ली | March 8, 2017 16:58 pm
अभी महिलाओं को नहीं मिली है पूरी आजादी। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

8 मार्च वो यानी International Women’s Day, ये वो दिन जिसे हर कोई महिलाओं की आजादी वाला दिन कहते हैं। लोगों का मानना है कि आधुनिक युग में महिलाओं को प्राचीन काल से ज्यादा आजादी मिली है। आधुनिक युग की महिलाएं अपनी लाइफ को पूरे ग्लैमर के साथ जीना सीख चुकी हैं। अब महिलाएं शिक्षा से लेकर खेल, बिजनेस, मीडिया, फिल्म इंडस्ट्री, रेलवे, इंजीनियरिंग, हॉस्टेपिटेलिटी जैसे कई क्षेत्रों में अपने नाम का परचम लहरा रही हैं। लेकिन मेरी राय में महिला दिवस तब ही सही रूप में सार्थक होगा जब विश्व भर में उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप से संपूर्ण आजादी मिलेगी, जहां उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहां उन्हें दहेज के लालच में जिंदा नहीं जलाया जाएगा। आप आए दिन की खबरों में महिलाओं के साथ सैक्सुल हरैसमेंट, मोलेस्टेशन जैसी घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं। मैं भी एक आजाद लड़की की लाइफ जी रही थी, जिसे किसी चीज के लिए रोका-टोका नहीं गया। मैं अपनी स्कूटी पर फर्राटा भरके गुलाबी नगर की आवो-हवा में खुशहाल जिंदगी जिया करती थी। न ही कभी किसी ने मेरे पहनावे पर कुछ और न ही खान- पान को लेकर।

लेकिन जब मेरी शादी हुई तो मुझे पता चला कि मैं आदाज नहीं हूं। परिवार वाले समझते हैं कि उन्होंने मुझे अच्छे पैसे वालों के घर भेज दिया है, जहां पर हर चीज की सुविधा है। मैं भी ये मानती हूं कि यहां मुझे हर चीज की सुविधा मिली है लेकिन नहीं मिली तो आजादी। आजादी घूमने फिरने की तो दूर की बात, यहां मुझे खुद से सोचने- समझने तक की आजादी नहीं हैं। जहां मैं, मैं नहीं हूं। घर में शादी के 2 साल तक मैं खूब खुशी से जीती रही। ससुराल वालों को मुझसे घर के वारिश की उम्मीद होने लगी, लेकिन 3 साल बीत गए जब उन्हें उनके घर का चिराग मुझसे नहीं मिला तो सब मेरे साथ मारपीट करने लगे। यहां तक मेरा हसबैंड भी।

क्या मेरी जब शादी हुई थी तो मेरे मायके वालों से ये डील हुई थी कि मैं उन्हें उनके घर का चिराग दूंगी। शादी के बाद जिन घर वालों ने मेरी हर ख्वाहिश पूरी अब उन्होंने मुझसे मेरे मायके वालों से बात करने की आजादी भी छीन ली। सास ने मुझे अपसकुनी बहु कहना शुरू कर दिया तो पति ने मेरा मोबाइल छीन लिया। ताकि मैं मायके बात करके किसी से कुछ न कह सकूं। कहते हैं दहेज देने से ससुराल वाले हर कंडीशन में बहु को खुश रखते हैं लेकिन मेरे मायके वालों ने 70 लाख की ऑडी भी दी थी फिर भी मैं यहां खुश नहीं हूं। शादी से पहले बच्चे देने की डील होती तो ऐसा व्यवहार झेल भी लेती लेकिन ऐसा कुछ तय नहीं हुआ था। उस वक्त तो ससुराल वालों को सिर्फ मेरे संस्कार और मेरी गोरे चेहरे से प्यार था अब उन्हें मुझसे नहीं बल्कि उनके घर के चिराग से है, तो क्या मैं इस आजाद समाज का हिस्सा नहीं हूं। आखिर महिलाओं को कैसी आदाजी मिली है।

 

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  1. S
    saumya gupta
    Mar 9, 2017 at 4:09 am
    बहुत अच्छा लेख.. जिस दिन यह सब घटनाएँ सुनने को नहीं मिलेगी वो ही दिन होगा महिला दिवस मनाने का... रोज कोई ना कोई घटनाएँ सुनने को मिलती हैं.. मेरे हिसाब से हमारे कानून इतने कड़े होने चाहिये कि कभी इन सबके बारे में ना सोच पाए।
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    1. शुभ्रता मिश्रा
      Mar 7, 2017 at 12:59 pm
      ये लेख साबित क्या करना चाहता है कि देश में उन अपराधों के लिए जिनका जिक्र इसमें किया गया है, कोई कानूनी या सामाजिक प्रावधान नहीं हैं। ऐसे लेख सामाजिक व महिला जाग्रति के बजाय हीनता और भीरुता को ही बढ़ावा देते हैं जो एक स्वस्थ लेखन की श्रेणी में तो कदापि नहीं रखे जा सकते।
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      1. शुभ्रता मिश्रा
        Mar 7, 2017 at 12:58 pm
        स्वतंत्रता के ी मायने समझने की आवश्यकता है।अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की संकल्पना को जाने बिना लिखा गया बचकाना लेख उन सशक्त महिलाओं पर तमाचा मारने का हास्यास्पद प्रयास है।ानुि पाकर ढेरों वाहवाहियां लूटना स्तरीय अखबार में यह आधारहीन रुदन वो भी अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस जैसे महिला सशक्तीकरण के प्रतीक दिवस पर तनिक भी शोभा नहीं दे रहा है।
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