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ब्लॉग: फारूक डार को जीप से बांधकर सेना ने कश्मीर में भारत का कराया बड़ा नुकसान

भारतीय सेना के मेजर नितिन गोगोई ने कश्मीरी युवक फारूक डार को जीप के आगे मानव-ढाल के रूप में बांधकर घुमाया था।

Author July 12, 2017 12:44 pm
भारतीय सेना के मेजर नितिन गोगोई (बाएं) द्वारा जीप के आगे कश्मीरी युवक फारूक डार को मानव-ढाल बनाकर बांधने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। (फोटो सोर्स इंडियन एक्सप्रेस)

राजा मुज़फ्फर भट्ट

एक दशक से भी ज्यादा समय तक सेंट्रल कश्मीर के बडगाम जिले के अरीजाल और उसके आसपास के गांवों में शायद ही उग्रवाद से जुड़ी कोई घटना हुई हो। मैंने कभी इस इलाके में पत्थरबाजी की बात नहीं सुनी। इस साल नौ अप्रैल से पहले तक अरीजाल एक शांत इलाका था। नौ अप्रैल को श्रीनगर विधान सभा के लिए हुए उप-चुनाव के विरोध प्रदर्शन के दौरान कई लोग मारे गए थे।

इस इलाके में सेना और स्थानीय जनता के बीच संबंध मधुर रहे हैं। अरीजान के आसपास सेना के तीन कैम्प हैं। 1990 के दशक में जब घाटी में उग्रवाद शुरू हुआ तो रैयार, हरदापंजू और मुजपथरी और तोसामैदान में सुरक्षा कैम्प थे। अरीजाल के लोग तोसामैदान में सेना के लिए पिट्टूवालों के तौर पर काम करते थे। यहां स्थानीय जनता और सेना के बीच कोई तनाव नहीं था।

लेकिन अरीजाल के छोटे से गांव चिल में रहने वाले फारूक अहमद डार को 53 राष्ट्रीय राइफल (आरआर) के कंपनी कमांडर द्वारा जीप के आगे मानव-ढाल के तौर पर बांधकर कई गांवों में घुमाए जाने के बाद इलाके में तनाव पसर गया। इस घटना ने कश्मीर और बाकी देश के बीच दरार पैदा कर दी। मैं बडगाम में कई सालों से रहकर एक आरटीआई कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहा हूं। पिछले दशक में मुझे और दूसरे आरटीआई कार्यकर्ताओं को सूचना के अधिकार कानून को हूबहू तौर पर जम्मू-कश्मीर में लागू करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान मैं भारत भर के आरटीआई एक्टविस्टों को अपना प्रेरणास्रोत समझता रहा।

दिल्ली के एक आरटीआई एक्टिविस्ट दंपती का मैं खास तौर पर जिक्र करना चाहूंगा जो मानवाधिकार इत्यादि के व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दों को आरटीआई के माध्यम से लगातार उठाता रहा है। उनके पत्र जम्मू-कश्मीर समेत राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया में छपते रहते थे। इस दंपती का मैं विशेष सम्मान करता हूं।

ऐसे में आप समझ सकते हैं कि तब मुझे कितना धक्का लगा होगा जब मैंने जाना कि उनमें से एक ने सेना प्रमुख बिपिन रावत की राष्ट्रीय राइफल के मेजर नितिन गोगोई को सम्मानित करने के फैसले की तारीफ की है। ये वही मेजर गोगोई थे जिन्होंने फारूक़ डार को जीप के आगे बांधकर घुमाया था। एक्टिविस्ट द्वारा सेना प्रमुख की तारीफ वाला पत्र गोवा के एक अखबार में छपा। ये पत्र मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक ईमेल ग्रुप में साझा किया गया।

farooq dar बडगाम में अपने गांव में फारूक डार (दाएं) और उनकी मां। (Photo: Shuaib Masoodi)

मैंने 1990 के दशक में कर्नाटक के एक कॉलेज में पढ़ाई की थी। वहां मिले सकारात्मक ऊर्जा की वजह से ही मैं कश्मीर के बाहर समर्थकों का एक नेटवर्क बना सका। कई दूसरे कश्मीरियों की तरह मुझे देश के दूसरे हिस्से के लोगों के साथ पेश आने में झिझक नहीं होती। लेकिन एक आरटीआई एक्टिविस्ट के इस पत्र से मेरे पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। एक सम्मानित आरटीआई एक्टिविस्ट ने तथ्यों या उचित कानूनी प्रक्रिया की जरा भी परवाह नहीं की। ऐसे में हम मानवाधिकार-विरोधी और कश्मीर-विरोधी लोगों से क्या उम्मीद करें?

इसी साल 21 अन्य लोगों के साथ मेरा चयन एक्यूमेन इंडिया फेलोशिप के लिए हुआ। दूसरे एक्यूमेन फेलो के साथ हुए एक संवाद सत्र में मैंने मानव-ढाल का मुद्दा उठाया। सत्र में कुछ ही देर बाद सन्नाटा पसर गया। तब मुझे अहसास हुआ कि आजकल किसी गैर-कश्मीरी को भी पाकिस्तान-परस्त या आईएसआई-परस्त घोषित किया जाना काफी आसान हो गया है। मैं ये सोचने से खुद को रोक नहीं पाता कि अगर अरीजाल जैसी घटना नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ या ओडिशा या झारखंड या पूर्वोत्तर भारत या देश के किसी और हिस्से में हुई होती तो इस पर लोगों की प्रतिक्रिया अलग होती। तब लोगों ने इसे बहादुरी के ज्वलंत उदाहरण के तौर पर न देखा होता।

मैं एक बार फिर आपके सामने कुछ तथ्य रखना चाहूंगा। चुनाव बहिष्कार की तमाम अपील के बावजूद फारूक अहमद डार ने वोट दिया। वोट देने के तत्काल बाद वो एक रिश्तेदार के घर मातमपुर्सी के लिए जा रहा था। वो गामपुरा स्थिति अपने रिश्तेदार के गांव पहुंच पाता उससे पहले सुरक्षा बलों ने मोटरसाइकिल सवार डार को रोक लिया। जामातलाशी के बाद उसे जीप के बोनट के आगे बांध दिया गया। अगले पांच घंटे तक वो जीप के आगे बंधा हुआ गांव-गांव घुमाया जाता रहा।

ये दृश्य बॉलीवुड की फिल्मों की याद दिलाता है जिनमें खलनायक हीरो को इलाके के लोगों में खौफ पैदा करने के लिए गाड़ी में बांधकर घुमाता है। डार को आखिरकार सीआरपीएफ कैम्प ले जाया गया। उसके गांव के बुजुर्गों ने वहां पहुंचकर सुरक्षा बलों से कहा कि डार ने वोट दिया है। सुरक्षा बलों ने डार के अंगुली पर मतदान का प्रतीक स्याही का निशान देखा। उसके बाद उसे रिहा किया गया। ये वो तथ्य हैं जिनसे कश्मीर में भारत का पक्ष इस हद तक कमजोर हो चुका है कि बाकी देश में किसी के लिए उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

(राजा मुज़फ्फर भट्ट कश्मीर स्थित आरटीआई कार्यकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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