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चिंतन और मंथन पर अमल ही कांग्रेस की ‘प्राणवायु’

कुछ जहाजी चूहे कांग्रेस रूपी जहाज के डूबने की आशंका और डुबाने की कोशिश में पहले ही जहाज से कूद चुके हैं। लेकिन, यह तो कांग्रेस का प्रारब्ध रहा है कि ऐसी चुनौतियों के समय उनके कई अपने भी साथ छोड़कर चले जाते रहे हैं।

Congress Party| Rahul Gandhi| waynad mp |
कांग्रेस नेता राहुल गांधी (फोटो-पीटीआई)

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से पिछले दिनों एक निजी खबरिया चैनल के एंकर ने पूछा कि राहुल गांधी की छवि को भारतीय जनता पार्टी ने बुरी तरह डेंट कर दिया है, तो क्या उनकी छवि सुधारी जा सकती है? इस पर प्रशांत किशोर ने कहा कि जब नरेंद्र मोदी जी की छवि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के बाद सुधारी जा सकती हैं तो फिर राहुल गांधी की क्यों नहीं?

एक दूसरी बात, जब कुछ बुद्धिजीवियों से बात हुई तो उनका कहना था कि वे भारतीय जनता पार्टी के विचारों और कृत्यों से सहमत नहीं हैं, लेकिन वोट देकर अपने अधिकार का उपयोग करना चाहते हैं, लेकिन वोट दें तो किसे? बराबर में सामने कोई दावेदार नजर ही नहीं आता है।

कांग्रेस जैसी पार्टी को देश की जनता इस नजरिए से इस प्रकार देखेगी, उसके प्रति इस तरह के विचार रखेगी शायद इस दल के संगठनकर्ता ने सपने में भी सोचा नहीं होगा। निश्चित रूप से इस दल के नेताओं ने अपने कृत्यों से इसका भारी अहित किया है और अब शायद देश की जनता के समक्ष गुनाहगार की अपनी छवि को बचाने का प्रयास करने लगी है। तभी तो उस दल के नेताओं के लिए कहा जा रहा है कि उसकी डेंट छवि को क्या सुधारा जा सकता है तथा मतदाता यह सोचने लगे हैं कि भारतीय जनता पार्टी को नहीं, तो किस और दल को अपना मतदान करें।

पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह फ्लॉप होने के बाद अब उसके बड़े नेताओं की समझ में यह बात आ गई है कि यदि अपनी कमजोरी को समय रहते अच्छी तरह जान-समझकर उसे दूर नहीं किया, तो संभव है कुछ वर्षों बाद इसका कोई नामलेवा भी नहीं बचेगा और भारतीय जनता पार्टी का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा और सपना, दोनों साकार हो जाएगा।

इन्हीं विकट परिस्थितियों के कारण पिछले दिनों राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस ने ‘चिंतन शिविर’ का आयोजन कर यह जानने और समझने का प्रयास किया कि आखिर अपनी गिरती और दिनोंदिन हास्यास्पद होती जा रही स्थिति को कैसे दुरुस्त किया जाए। सच में मंथन से ही जहर और अमृत, दोनों निकलता है। देखना यह है कि इस ‘नव संकल्प शिविर’ में हुए मंथन के बाद इस दल को क्या और कितना लाभ मिल पाता है और नेताओं की डेंट छवि कितनी सुधर पाती है।

अब समझने का प्रयास करते हैं कि राजस्थान के उदयपुर में आयोजित कांग्रेस के इस तीन दिवसीय संकल्प शिविर में देशभर से आए कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने क्या चिंतन-मंथन किया। पार्टी में विखंडित एकता पर चिंता जताते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस बात को स्वीकारा कि पार्टी में एकजुटता अनिवार्य है और संगठन को जीवित रहने के लिए परिवर्तन की भी जरूरत है, इसलिए पार्टी में सुधार भी जरूरी है।

उदयपुर के नवसंकल्प शिविर में मौजूद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी के वरिष्ठ नेता। (फोटो- पीटीआई)

पार्टी के कायाकल्प के लिए युवाओं को रिझाने की दिशा में कांग्रेस कार्य समिति से लेकर बूथ स्तर तक संगठन के हर स्तर पर पचास साल से कम उम्र के लोगों के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण देने की बात की गई। संगठनात्मक ढांचे में आमूल परिवर्तन के प्रस्तावों को सामने लाया गया।

अपवादों को छोड़कर एक परिवार को एक टिकट देने का फार्मूला, पूरे साल जनता के मूड भांपने के लिए पार्टी का अपना सर्वे और आकलन विंग, पांच साल तक संगठन में काबिज रहे पदाधिकारी अनिवार्य रूप से पद त्यागें, 15-20 बूथों का एक मंडल और हर ब्लॉक में तीन से पांच मंडल समितियां बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया है।

संगठन को नकारा नेताओं से छुटकारा दिलाने और अच्छा काम करने वालों को प्रोत्साहन देने का भी कांग्रेस तंत्र बनाने जा रही है। इसके लिए पार्टी में अलग तंत्र बनाने और अनुशासन को भी सख्ती से लागू करने की भी जरूरत पर बल दिया गया।

सम्मेलन का आयोजन तो ‘चिंतन शिविर’ के रूप में किया गया था, लेकिन कांग्रेस ने शिविर से ‘चिंतन’ शब्द हटा दिया है। पार्टी ने ‘नव संकल्प शिविर’ के बैनर तले इसमें चर्चा की। इस पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि हार के कारणों पर कोई चर्चा न हो और सभी पार्टी के भविष्य की नई रणनीतियों पर चर्चा करें।

पार्टी के लगभग सभी नेताओं का फोकस इस बात को लेकर रहा है कि आने वाले राज्यों के चुनाव और विशेष रूप से वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को किस प्रकार लड़ा जाए और जिन कारणों से उनकी पार्टी पीछे चली गई है, उसे फिर से न दोहराते हुए चुनाव जीतने का संकल्प लिया जाए। विभिन्न मुद्दों पर अपनी चर्चा के दौरान ईवीएम का भी मुद्दा उठा, जिसके लिए कहा गया कि इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। पार्टी के कई असंतुष्ट नेता संसदीय बोर्ड के गठन की मांग कर रहे थे जिसे एक सुझाव के रूप में पार्टी ने स्वीकार भी कर लिया है।

सम्मेलन में यह भी योजना बनी कि विधानसभा चुनावों और वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव तक आंदोलन के लिए पार्टी की देशव्यापी योजना कैसे तैयार हो, ताकि आम आदमी के बीच मुद्दों को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा किया जा सके। इसके लिए दल के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने जन जागरण अभियान के लिए भविष्य के कार्यक्रमों का खाका भी पेश किया।

इसमें कहा गया है कि हम लोगों के बीच मुद्दे को उठाएंगे, तभी पार्टी के उद्देश्यों का मतलब आमजन की समझ में आएगा। रुपये में गिरावट पर केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा गया कि सरकार कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि पर महंगाई का ठीकरा नहीं फोड़ सकती, क्योंकि महंगाई रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले से बढ़ रही है और डॉलर के मुकाबले रुपयों की कीमत में घोर गिरावट के लिए सरकार की नीतियां ही जिम्मेदार हैं।

धर्मस्थलों पर यथास्थिति रखने के लिए भी कहा गया, क्योंकि ऐसा न करने से टकराव की स्थिति बढ़ेगी। नव संकल्प शिविर में अध्यक्ष बनाए जाने का भी मामला उठा, जिसमें कहा गया कि राहुल गांधी को दो वर्ष से अध्यक्ष बनाए जाने के लिए उन्हें मनाने का प्रयास किया जा रहा है, इसलिए प्रियंका गांधी वाड्रा को अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। कई नेता राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाए जाने के पक्ष में थे। दीपेंद्र हुड्डा और रंजीत रंजन का विचार था कि प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश की राजनीति तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए।

युवाओं में जोश फूंकते हुए पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस और जनता के बीच दूरी बढ़ गई है जिसके संवाद के तारों को जोड़ना ही पार्टी की राजनीति वापसी का एकमात्र रास्ता है। राहुल गांधी का यह कहना था कि कोई क्षेत्रीय दल भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला नहीं कर सकती, क्योंकि उसकी अपनी सीमाएं हैं। केवल कांग्रेस ही राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त दे सकती है।

उन्होंने अपने वरिष्ठ नेताओं को बल देने के उद्देश्य से कहा कि कभी—कभी वे निराश हो जाते हैं, हताश हो जाते हैं, डिप्रेशन में चले जाते हैं, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि लड़ाई आसान नहीं है। राहुल गांधी ने भाजपा के लिए कहा कि उनकी पार्टी (कांग्रेस) के कार्यकर्ताओं और नेताओं को जनता के बीच जाकर उन्हें बताना होगा भाजपा देश को बांट और तोड़ रही है और कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो सबकी है और इस देश में कोई ऐसी जाति धर्म नहीं है, जो यह कह सके कि कांग्रेस ने उसके लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं। जातिवाद के मामले में उन्होंने क्षेत्रीय दलों पर करारा प्रहार किया। उन्होंने भाजपा को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कांग्रेसी सड़कों पर उतरे और भाजपा-संघ की विचारधारा का पूरे जोश से दम लगाकर विरोध करें और लड़ें।

शिविर में जो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, उनमें अहम बात यह रही कि सबने मिलकर युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए प्रत्येक चुनाव में कुल टिकटों में से 50 से कम उम्र के लोगों आधे टिकट देगी। जनता से जुड़ाव के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पदयात्रा निकालेंगी। महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि नव संकल्प शिविर में जो निर्णय लिए गए हैं, उन सुधारों को लागू करने के लिए टास्क फोर्स का भी गठन किया गया है।

तीन दिन चले मंथन के बाद संगठन में अहम सुधार, जनता से जुड़ाव तथा सड़क पर संघर्ष के मूल मंत्र का संकल्प लेते हुए वर्ष 2024 में अपनी राजनीतिक वापसी के लिए लड़ाई का रोडमैप तैयार कर लिया है। यदि चुनाव के समय इस प्रकार की बात पार्टी के शीर्ष नेताओं तथा घोषणा-पत्र में इन बातों की घोषणा की जाती तो उसे जानता चुनावी जुमला ही मानती, लेकिन देश के सबसे बड़े और आजादी के लिए मर मिटने वाली पार्टी ने यह निर्णय लिया है तो यह माना जा सकता है कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इस प्रकार का निर्णय अपने मंथन शिविर में कांग्रेस ने जो लिया है, जिसे झुठलाया भी नहीं जा सकता और चुनावी जुमला भी नहीं कहा जा सकता।

अब थोड़ा इंतजार जनता को भी करना होगा और देखना होगा कि इस नव संकल्प शिविर में हुए घनघोर मंथन का क्या असर कांग्रेस पार्टी पर पड़ता है, क्योंकि सब कुछ करना तो उन्हीं जमीन से जुड़े नेताओं को है। इसलिए उन्हें सामने आना ही होगा और अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जो निर्णय उदयपुर के नव संकल्प मंथन में लिया गया है, उन्हें जमीन पर उतारने के लिए कटिबद्ध होना ही पड़ेगा।

यदि ऐसा नहीं करेंगे तो अपने नेता राहुल गांधी की डेंट छवि को वह कितना सुधार पाते हैं, अब प्रतीक्षा इसकी हमें करनी चाहिए। वैसे कुछ जहाजी चूहे कांग्रेस रूपी जहाज के डूबने की आशंका और डुबाने की कोशिश में पहले ही जहाज से कूद चुके हैं । लेकिन, यह तो कांग्रेस का प्रारब्ध रहा है कि ऐसी चुनौतियों के समय उनके कई अपने भी साथ छोड़कर चले जाते रहे हैं। लेकिन, अब जनता के बीच यह संदेश भी किसी-न-किसी माध्यम से जाना ही चाहिए कि इतनी साजिशों के बावजूद भाजपा के विरुद्ध भी देश की सबसे प्रतिबद्ध पार्टी कांग्रेस चुनौती देने के लिए आपके सामने खड़ी हो गई है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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