नींव हिली तो भवन का गिरना तय

होता यह रहा है कि राजनीतिज्ञों के नाम से या राजनीति से त्रस्त होकर उसमें कोई जाना नहीं चाहता। यदि जाता भी है तो उसमें प्रवेश करते ही उसकी मानसिकता भी बदल जाती है और वह भी भ्रष्टाचार के रंग में रंग कर आपराधिक मानसिकता का बन जाता है। समाज के विकास के नाम पर जनता का रक्त चूसने लगता है।

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तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटोः पीटीआई)

एक पत्थर या ईंट गिरता है, फिर दूसरा और तीसरा-चौथा…, तब उसके ऊपर भवन खड़ा होता है। नींव के पत्थर भवन को नहीं देख पाते हैं, लेकिन भवन खड़ा होता है उन्हीं के सहारे, जो नींव में गड़े हुए हैं। वह गड्ढा या नींव एक पत्थर या ईंट से नहीं भरी जाती है और न एकाध दिन में भवन तैयार होता है। भवन के निर्माण के लिए अनवरत प्रयत्न, निरंतर प्रयास और बलिदान आवश्यक है।

देश को अंग्रेजों से छुटकारा दिलाने के लिए भी तो एक-एक करके हजारों लोगों ने बलिदान दिया था। उसके बाद ही भारत आजाद हुआ। उन्हीं बलिदानों की नींव पर खड़े आजाद भारत के लोग उन्हें देख नहीं पाते और न ही वह इस विशाल भारत को आजाद देख रहे हैं, लेकिन उनकी आत्मा आज जरूर इस देश की प्रगति को देखकर खुश हो रही होगी। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में जो ह्रास इस देश के राजनीतिज्ञों ने राजनीति का किया है उसकी परतें अब धीरे-धीरे खुलने लगी हैं।

अवाम को कौन पूछे, अब जब सुप्रीम कोर्ट ने आज के राजनीतिक परिवेश में हस्तक्षेप करना शुरू किया है तो आम आदमी भी हतप्रभ है। वे सोचने लगे हैं कि जो राजनीतिज्ञ चुनाव के समय आकर उनकी चरण वंदना किया करते थे, वे धूर्त और धोखेबाज ही नहीं, कितने बड़े दबंग और अपराधी किस्म के होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और बीआर गवई की पीठ ने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर कानून निर्माताओं से अपील करते हुए कहा है कि इसे रोकने के लिए कदम उठाएं। कोर्ट 13 फरवरी, 2020 के आदेश की आवमाना पर आरोप लगाने वाली याचिकाओं और रिट याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए यह अपील की। साथ ही कोर्ट ने बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों का आपराधिक ब्योरा सार्वजनिक ना करने तथा आपराधिक छवि के व्यक्ति को उम्मीदवार बनाए जाने के कारण बताने के आदेश पर अमल नहीं करने पर आठ सियासी दलों को अवमानना का दोषी ठहराते हुए जदयू, राजद, लोजपा, कांग्रेस, भाजपा और माकपा पर एक-एक लाख रुपये और माकपा और राकांपा को पांच पांच लाख रुपये जमा करने का आदेश दिया।

राजनीतिक दलों को यह जुर्माना आठ सप्ताह के भीतर चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए विशेष खातों में जमा करानी है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के चयन के 48 घंटे के अंदर उसका आपराधिक ब्योरा वेबसाइट के होम पेज पर सार्वजनिक करना होगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को चेतावनी दी कि उसके आदेश के बाद बिहार विधानसभा का यह चुनाव पहला था, इसलिए वह नरम रुख अपना रहा है। लेकिन, यदि भविष्य में इस आदेश का पालन नहीं करने की बात सामने आई तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनीति को स्वच्छ करना सरकार की तात्कालिक चिंता नहीं है, जबकि राष्ट्र इस बारे में प्रतीक्षा कर रहा है और उसका धैर्य भी अब खत्म हो रहा है। आपराधिक छवि के राजनीतिज्ञों को कानून निर्माता नहीं बनने देना चाहिए, लेकिन न्यायालय के अपीलों पर किसी के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। कोर्ट ने चिंता जताते हुए यह भी कहा कि भारतीय राजनीतिक प्रणाली में दिनोंदिन अपराधीकरण बढ़ रहा है, इसलिए इस मामले में तत्काल कुछ न कुछ करने जरूरत है।

प्रायः यह देखा जाता रहा है कि किसी राज्य में जब चुनाव के बाद सरकार बदलती है तो सत्तारूढ़ दलों पर चल रहे विभिन्न धाराओं के मुकदमे को वापस लेकर अपना दामन सफेद कर लेते थे। ज्ञात हो कि सीआरपीसी की धारा—321 में लोक अभियोजन को अर्जी दाखिल कर मुकदमा वापस लेने का अधिकार है। अपने एक दूसरे आदेश में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ यह निर्देश पूर्व और वर्तमान सांसदों, विधायकों के लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे वाली अश्वनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए कि हाईकोर्ट की इजाजत के बिना वर्तमान और पूर्व सांसदों और विधायकों के मुकदमे वापस नहीं लिए जाएंगे। साथ ही हाईकोर्ट से आग्रह किया है कि वह मुकदमा वापसी के बारे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में जारी दिशा निर्देशों को देखते हुए मुकदमा वापसी के आवेदनों को जांचे परखे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सांसदों, विधायकों के मुकदमे की सुनवाई कर रही विशेष अदालतों के जज अगले आदेशों तक नहीं हटाए जाएंगे।

चीफ जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने सितंबर 2020 के बाद सांसदों-विधायकों के वापस लिए गए केस दोबारा खोलने को भी कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) विजय हंसारिया की रिपोर्ट पर यह बड़ा कदम उठाया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य सरकारें आपराधिक रिकार्ड वाले विधायकों पर चले मामलों को वापस लेना चाहती हैं। विजय हंसारिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी सरकार मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी भाजपा विधायकों के खिलाफ दायर 76 मामले वापस लेना चाहती है। कर्नाटक सरकार विधायकों के खिलाफ 61 मामलों को वापस लेना चाहती है। उत्तराखंड और महाराष्ट्र सरकार भी इसी तरह केस वापस लेना चाहती है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा निर्देश के बाद इस सिलसिले में राज्य सरकारों और विधायकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश और चिंता से देश की राजनीति में एक स्वच्छता की शुरुआत जरूर होगी और नींव के नीचे जिन पूर्वजों की आत्मा आज के राजनीतिक हालात पर सिसक रही थी, उन्हें निश्चित रूप से कुछ न कुछ संतोष जरूर मिलेगा। होता यही है कि जब राजनीतिज्ञ धींगामुश्ती पर उतर आते हैं तो न्यायपालिका को सख्त रुख अपनाना ही पड़ता है। इस बीच सरकार की जिन कमजोरियों पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है उससे राजनीति में कुछ न कुछ तो सुधार होगा ही।

अभी तक होता यह रहा है कि राजनीतिज्ञों के नाम से या राजनीति से त्रस्त होकर उसमें कोई जाना नहीं चाहता। यदि जाता भी है तो उसमें प्रवेश करते ही उसकी मानसिकता भी बदल जाती है और वह भी भ्रष्टाचार के रंग में रंग कर आपराधिक मानसिकता का बन जाता है। समाज के विकास के नाम पर जनता का रक्त चूसने लगता है। पूर्व के राजनीतिज्ञ निःस्वार्थ भाव से जनता की सेवा करते थे। वे वही लोग हैं, जो आज नींव के पत्थर हैं, जो इस भारतरूपी विशाल भवन के नीचे दबे हैं, आंसू बहा रहे हैं, लेकिन देश को बिखरने नहीं दे रहे हैं। उनके समर्पण और देशभक्ति को देश कभी भुला नहीं सकता, क्योंकि जो सामान्य नागरिक हैं, वह यह जानते हैं कि वही हमारे पूर्वज आज हमारे देश के नींव के पत्थर हैं।

Nishikant Thakur, Journalist, Jansatta Blog
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।

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