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हमें कुपोषण मुक्त भारत के लिए किस तरह सतत प्रणाली बनानी चाहिए

जिला स्तर पर स्थानीय ज़रूरतों और खाने की आदतों के हिसाब से नीति लागू करना बेहद ज़रूरी है, जो कि जमीनी स्तर पर परिवर्तन लाने के लिए महत्वपूर्ण है।

school, studentsप्रतीकात्मक तस्वीर

सीके मिश्रा

कोविड-19 महामारी ने न केवल कमजोर स्वास्थ्य और खान-पान की व्यवस्थाओं की खामियों को उजागर किया है बल्कि विकसित देशों की कमियों को भी उजागर करके रख दिया है। इसने हमें ये भी याद दिला दिया है कि इंसान का अस्तित्व हमारे ग्रह पृथ्वी पर निर्भर है और भविष्य में होने वाली महामारियों और पर्यावरण व जलवायु संबंधी आपदाओं को सिर्फ़ उन प्रणालियों को आपनाकर रोका जा सकता है जो पृथ्वी की सेहत का ख्याल रखती हों।

पर्यावरण (कृषि), पोषण और स्वास्थ्य के बीच संबंध को संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SGD) का एक हिस्सा माना गया है। SDG2 (भूखमरी मिटाना, खाद्य सुरक्षा हासिल करना, पोषण में सुधार करना और सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना) के तहत तीन लक्ष्य कृषि नीति को फायदा पहुँचाने और बेहतर पोषण के नतीजों की रणनीति बनाने से जुड़े हैं, जो हर तरीके से भूखमरी मिटाने और कुपोषण को खत्म करने के एकमात्र उद्देश्य को सुनिश्चित करते हैं।

अच्छा पोषण, कोविड-19 जैसे संक्रमणों से किसी व्यक्ति की रक्षा करने के लिए ज़रूरी है
भारत जैसे कम और मध्यम आय वाले देशों में खान-पाने के पैटर्न में तेजी से बदल हो रहे हैं। हाल ही में हुए व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (CNNS, 2019) के अनुसार कुछ दशकों से भारत में काफी आर्थिक विकास होने के बावजूद, भारत के तेरह से उन्नीस साल के बच्चे छोटे, पतले, ज़्यादा वजन वाले या मोटे हैं और 80% से ज़्यादा ‘हिंडन हंगर’ से पीड़ित हैं, जो कि आयरन, फोलेट, जिंक, विटामिन A, विटामिन B12 और विटामिन D जैसे एक या एक से ज़्यादा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से होती है।

इसके अल्पकालिक/दीर्घकालिक या यहाँ तक कि कई पीढ़ियों पर दिखाई देने वाले दोनों तरह के प्रभाव हो सकते हैं, जो कि उस भारत के लिए खतरा साबित हो सकती है जिसकी कल्पना हमने की हैं। कोविड-19 ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। कुपोषण हमारे इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देता है, जिससे बीमार होने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। यही नहीं, बुरी मैटाबॉलिक हेल्थ (जैसे कि मोटापा और मधुमेह) का खराब कोविड-19 नतीजों से काफी गहरा संबंध है। मौजूदा महामारी ने स्वास्थ्य, पोषण सेवाओं और स्थानीय खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करके रख दिया है, जिस वजह से खाद्य असुरक्षा से जुड़ी समस्याएँ बढ़ रही हैं। इससे भारत को अपने पोषण परिणामों में किए गए सुधार से मिलने वाले फायदे पर भी मुसीबत के बादल घिर आए हैं।

अपने खान-पान और कृषि प्रणालियों को फिर से नया रूप देना
पर्यावरणविद लगातार हमारी कृषि-जैव विविधता में हो रही कमी, प्राकृतिक संसाधनों बढ़ता दोहन, जलवायु परिवर्तन और उनका इंसान की सेहत पर पड़ने वाले असर की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे हैं (सेमिनार: जून 2020 का जस्टिस ऑन आवर प्लेट)। कोविड-19 के मौजूदा माहौल में इन सब के एक दूसरे से जुड़े होने के औचित्य के साथ-साथ देश भर के लोगों की ज़िंदगी और आजीविका पर पड़ने वाला इसका प्रभाव भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

हालांकि सरकार इनके बीच के संबंध को स्वीकार करती है, लेकिन इस पर पूर्ण रूप से कोई कार्यवाही नहीं की गई।

सबसे पहले, हमारी विकास योजना के एक हिस्से के रूप में इन तीन तत्वों को एक साथ लाना ज़रूरी है। कृषि, पोषण और स्वास्थ्य। विशेषज्ञों ने लंबे समय तक नीति निर्माण में ‘खाद्य प्रणाली’ के प्रस्ताव की ओर बढ़ने के फायदों पर ज़ोर दिया है। ये बहु-क्षेत्रीय प्रस्ताव, खाद्य मूल्य श्रृंखला और व्यापक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरण के संदर्भ में विभिन्न तत्वों के बीच संवाद, संबंधों और अंतर-निर्भरता पर आधारित है। ये सोच असल में हमारी संस्कृति में बहुत पहले से समाई हुई है; देसी आदिवासी समुदाय, उनके भोजन की आदतें और स्थानीय वातावरण के साथ ताल-मेल बैठाकर जीवन
जीने जैसे कई सबक सिखाता है।

दूसरा, लोगों के आस-पास किफायती दामों पर खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं या नहीं यह पक्का करने के लिए स्वास्थ्य और पोषण के साथ कृषि का एकीकरण बेहद ज़रूरी है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MoWCD) द्वारा भारतीय पोषण कृषि कोष का विकास, हमारे द्वारा लिए जाने वाले खाद्य पदार्थों में मौजूद पोषक तत्वों और उनके स्रोत को समझने की सही दिशा में उठाया गया एक कदम है। ऐसी कई किस्मों की स्वदेशी फसल हैं जो पोषक तत्वों से भरपूर हैं। साथ ही, कई कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुकूल है। उपभोग के लिए उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें उत्पादन प्रणाली में वापस लाना और स्थानीय श्रृंखलाओं का निर्माण करना बेहद ज़रूरी है।

स्वच्छ भारत, मिशन इंद्रधनुष और पोषण अभियान जैसे कार्यक्रमों के साथ सरकार पोषण पर असर डालने वाले बुनियादी मुद्दों को दूर करने के साथ-साथ व्यवहार में बदलाव पर ध्यान केंद्रित करने को लेकर काम कर रही है। हालांकि, जिला स्तर पर स्थानीय ज़रूरतों और खाने की आदतों के हिसाब से नीति लागू करना बेहद ज़रूरी है; जो कि जमीनी स्तर पर परिवर्तन लाने के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन मौजूदा हालात में, ऐसा करने की बहुत कम गुंजाइश है कि कार्यक्रम और विभाग, संरचना में काम करना जारी रखें। पोषण मिशन को इस पर ध्यान देने और इस पर काम करने की ज़रूरत है।

प्रकृति के फायदों के परे देखना और सेहत और पर्यावरण के बीच गहरे संबंध और पोषण पर इसके प्रभाव को समझना बेहद महत्वपूर्ण है। पर्यावरण और परिस्थिति की बहुत हद तक सेहत के परिणामों को तय कर रहे हैं और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए। मौजूदा महामारी हमारे लिए इन मुद्दों पर काम करने, गियर शिफ्ट करने, विकासित करने, सही कृषि और खाद्य प्रणालियों और संवेदनशील पोषण कृषि-खाद्य श्रृंखलाओं को लेकर कदम उठाने का एक बेहतरीन मौका है। साथ ही, ये हमारे लिए यह सुनिश्चित करने का मौका है कि हम जो भोजन खाते हैं वह केवल सुरक्षित नहीं ही है बल्कि पौष्टिक होने के साथ-साथ सभी को उपलब्ध भी है। इस मुश्किल समय में प्रकृति हमारी सबसे बड़ी रक्षक हो सकती है।

– लेखक पूर्व सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और पूर्व स्वास्थ्य सचिव हैं।

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