ताज़ा खबर
 

भारत इस तरह कुपोषण के खिलाफ कर रहा है युद्ध स्तर की लड़ाई

आर्थिक कारकों के अनुकूल होने के बावजूद कुपोषण को कम करने में सांस्कृतिक परिवर्तन निभा रहे हैं नकारात्मक भूमिका...

प्रतीकात्मक तस्वीर.

पिछले कुछ सालों में जापान और सिंगापुर जैसे देशों की यात्रा के दौरान मुझे वहाँ के साफ-सुथरे सार्वजनिक क्षेत्रों को देखकर ही नहीं बल्कि वहाँ के लोगों की स्वच्छता से जुड़ी आदतें देखकर भी हैरानी होती थी। कोरोना वायरस के महामारी बनने से पहले ही मास्क, फेस कवरिंग और हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल वहाँ के लोगों के लिए आम बात थी, जो उन्हें भारत और विश्व के दूसरे देशों की तुलना में सबसे बेहतर बनाता है।

महामारी ने भारत की अर्थव्यवस्था और जीवन पर बड़ा असर डाला है लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इसने लोगों को सेहत और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले कई सालों से जारी स्वच्छ भारत सार्वजनिक स्वच्छता अभियान के बढ़ते प्रभाव का भी अहम योगदान है।

शुरुआती संदेह और उदासीनता के बाद अभियान में तेजी आई, तो इसे वैश्विक पहचान और सम्मान मिला। इसके साथ ही इसमें सार्वजनिक स्वच्छता की दिशा में ध्यान देने योग्य सुधार हुए। पीएम के एक और अभियान ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ की वजह से लिंग अनुपात के बीच की खाई भी भरने लगी है।

इन दोनों सार्वजनिक अभियानों में कॉमन थीम है जिसका उपयोग देश से कुपोषण उन्मूलन के लिए किया जाना है। कुपोषित बच्चों के प्रतिशत को कम करने के लिए भारत की गति स्थिर लेकिन धीमी है। एक दशक पहले जहाँ यह दो में से एक बच्चे की थी अब यह 38 प्रतिशत है। हमारे जैसे और अकेले विकसित देशों की बराबरी करने के लिए इसमें काफी सुधार लाने की ज़रूरत है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने इस प्रकार के संकटों को तेजी से कम करने के लिए, ये सारी पहल की हैं।

नवजात अवस्था और बचपन में कुपोषण न केवल मृत्यु दर को बढ़ाती है (एक आंकड़े के अनुसार भारत ने सुधार में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन दूसरे मध्यम आय वाले देशों के बराबर पहुँचने की ज़रूरत है) बल्कि बड़े होने पर भी यह जीवन को प्रभावित करता है। अध्ययन के अनुसार जो लोग बचपन में कुपोषण का शिकार होते हैं, उनमें मानसिक विकार, खराब स्वास्थ्य, कम आमदनी जैसी समस्याओं के साथ उनकी उम्र भी कम होती है।

जनता की धारणा में कुपोषण को लेकर सबसे बड़ा मिथक गरीबी और भोजन की कमी है। हाँ, ये प्राथमिक कारक हैं भी। लेकिन यह भी सच है कि गरीबी कम होने और कैलोरी की उपलब्धता बढ़ने के बावजूद कुपोषण के मामलों में कमी नहीं आती। भुखमरी में एक बड़ी गिरावट और लाखों भारतीयों के गरीबी के स्तर में कमी आने के साथ कुपोषण का स्तर घटा तो है लेकिन यह अभी भी आंकड़ों के हिसाब से कम नहीं हुआ है।

इस अंतर का मुख्य कारण सांस्कृतिक है जो आर्थिक कारणों के अनुकूल होने के बावजूद कुपोषण की दर को बढ़ाने का काम करता है। बचपन में कुपोषण को बढ़ाने वाले चार सांस्कृतिक कारक दिखाई देते हैं। पहला कारक, नवजात शिशु को छह माह का होने तक स्तनपान कराना, जो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें गिरावट देखी जा रही है। इसके पीछे बाजार में बिकने वाले शिशु आहार व खर्चीले और बड़े-बड़े मार्केटिंग कैंपेन हैं।

दूसरा कारक खुले में शौच करना है जो बीमारियों के संक्रमण के खतरे को बढ़ता है। साथ ही, बच्चों की पोषक तत्वों के पाचन की क्षमता को भी प्रभावित करता है। तीसरा कारक, कई परिवारों में लड़कियों को सबसे आखिरी में और सबसे कम खिलाया जाता है। जिसकी वजह से वे भविष्य में एनिमिया की शिकार हो जाती हैं। साथ ही, जल्दी विवाह होने पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी भी कुपोषण की चपेट में आ जाती है। चौथा और सबसे आखिरी कारक है जंक फूड का तेज़ी से बढ़ना। यहाँ तक की ग्रामीण भारत में भी पश्चिमी खान-पान और स्नैक्स के कारण गैर पौष्टिक भोजन की मात्रा बढ़ी है, जो कुपोषण को तो बढ़ाता ही है युवाओं के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।

पारंपरिक संतुलित भोजन की लगातार कमी कुपोषण की समस्या बढ़ा रही है। उदाहरण के लिए मेरे गृह राज्य ओडिशा को ही लेते हैं। निश्चित रूप से, कई पीढ़ियों से चली आ रही गरीबी ने कुपोषण को उच्च स्तर पर ले जाने में बहुत योगदान दिया, जो मौजूदा समय में दिखता है। हालांकि, इसमें धीरे-धीरे कमी आ रही है, लेकिन फिर भी ओडिशा में ऊपर लिखे कारक आधुनिक समय में भी अनुभव किए जा सकते हैं।

इस तरह से हजारों साल पहले से एक समृद्ध साम्राज्य के रूप में हमें सिखाए गए पोषक तत्वों और विविधता से भरपूर आहार के फायदे आज हम भूलते जा रहे हैं। जबकि सार्वजनिक स्वच्छता और पोषक आहार को बढ़ाने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान काफी मदद कर रहे हैं लेकिन विशेषज्ञ अब भी मानते हैं कि कुपोषण के खिलाफ इस लड़ाई को और तेजी से लड़ा जाना बेहद जरूरी है। इसके तहत रोज खाए जाने वाले भोजन को और पौष्टिक बनाने की जरूरत है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा लंबे समय से प्रस्तावित किए जा रहे फूड फोर्टीफिकेशन को 2018 में बढ़ावा मिला, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने माइक्रो न्यूट्रिएंट्स के लिए नियम जारी किए। इसके दिशा-निर्देश चावल, गेहूं का आटा, दूध, खाने का तेल और नमक पर भी लागू होते हैं।

15 राज्यों ने पहले से ही अपने चुने पोषक तत्वों के फोर्टीफिकेशन को अपनाया है, जिसके तहत जिला स्तर से ही कुपोषण के खिलाफ इस लड़ाई को तेज़ किया जा रहा है। फोर्टीफिकेशन की वजह से एनिमिया का स्तर बीस प्रतिशत से गिरकर छह प्रतिशत हो गया है।

इन सभी सामाजिक परिवर्तनों का नेतृत्व प्रधानमंत्री खुद कर रहे हैं। इनकें साथ ही लक्षित सरकारी अभियान, आय में वृद्धि और फूड फोर्टीफिकेशन जैसी तकनीकें भारत से कुपोषण के उन्मूलन में अहम योगदान देंगी।

– बैजयंत ’जय’ पांडा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 हमें कुपोषण मुक्त भारत के लिए किस तरह सतत प्रणाली बनानी चाहिए
2 भारतीयता, भारतीयकरण एवं समाज कार्य
3 127 साल बाद भी क्यों प्रासंगिक है शिकागो के विश्व धर्म संसद में दिया गया स्वामी विवेकानंद का भाषण?
ये पढ़ा क्या?
X