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कोरोना के ये योद्धा हैं गुमनाम, इनका भी हो सम्मान

बच्चों के पास इन्टरनेट नहीं था तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने इंटरनेट के लिए डाटा पैक रिचार्ज करवाए ताकि वे स्कूलों से जुड़ सकें। ऐसे अनेक शिक्षक मिले, जिन्होंने दर्जनों बच्चों के मोबाइल रिचार्ज करवाए़।

COVID-19, Coronavirus, Online Education, Corona Warriorऑनलाइन पढ़ाई करते बच्चे (फाइल फोटो)

अभिषेक रंजन

बनारस से एक तस्वीर आई। पता चला वहां के बीएसए सहित शिक्षा विभाग के अधिकारी रेलवे स्टेशन पर प्रवासी मजदूरों के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। लॉकडाउन के समय जब लोग अपने घरों में आराम कर रहे थे, तब ये मुस्तैद थे ताकि किसी को कोई परेशानी न हो जाए। देर रात अपने परिवार को छोड़ समाज की चिंता करते इन योद्धाओं को देख किसे गर्व नही होगा। रोजाना की सरकारी ड्यूटी की परिभाषा तक ये घटना सीमित नहीं थी। तस्वीर उस बात की गवाही दे रही थी कि सरकारी स्कूल, शिक्षा विभाग संकट के समय समाज के साथ था, उनकी सेवा में जुटा हुआ था।

बात केवल बनारस तक सीमित नहीं थी। गाँव हो या शहर, देश के अधिकांश सरकारी स्कूल कोरोना संकट के समय जरूरतमंद लोगों की मदद करने, उनके आश्रय के ठिकाने बने। कहीं आइसोलेशन में रहने की व्यवस्था, कहीं राशन बांटने की व्यवस्था, शिक्षा के मंदिर आज सेवा केंद्र में तब्दील हो चुके हैं। वायरस का ख़तरा होते हुए भी सरकारी शिक्षक क्वारंटीन सेंटर पर 24 घंटे मौजूद थे। अपनी जान जोखिम में डालकर वे कोशिश कर रहे थे कि लोगों को कोई दिक्कत न हो। करोड़ों लोगों के बीच राशन पहुंचाने के काम में भी शिक्षक लगे थे ताकि कोई गरीब भूखा न रह जाए। बच्चों के साथ साथ परिजनों को जागरूक करने, आरोग्य सेतु डाउनलोड करने जैसे महत्वपूर्ण काम भी किये, जिनसे कोरोना से बचाव में लोगों को मदद मिली।

देश के कई इलाकों से सरकारी शिक्षकों के कोरोना से प्रभावित होने की भी ख़बरें आई। संकट के समय समाजहित का काम करते हुए कई शिक्षकों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। उचित सुरक्षा किट न मिलने के बावजूद कोरोना के विरुद्ध चल रही जंग में सरकारी शिक्षकों की निभाई भूमिका देश कभी भूल नही सकता!

चुनौतियों के बीच चली ऑनलाइन क्लास: सेवा के साथ साथ शिक्षण के काम में भी सरकारी स्कूलों से जुड़े लोग जुटे रहे। बड़े प्राइवेट स्कूलों की तरह ऑनलाइन शिक्षा देना संभव नही था, फिर भी हार नहीं मानी। यूनेस्को के आंकड़ों की मानें तो दुनिया के 91 प्रतिशत विद्यार्थी कोरोना संकट से प्रभावित हुए। भारत भी इससे अछूता नहीं था। देश के 33 करोड़ विद्यार्थी, एक करोड़ से अधिक अध्यापक कोरोना से प्रभावित हुए। सबसे अधिक परेशानी सरकारी स्कूल के बच्चों को हुई। स्कूल वैसे समय में बंद हुए, जब उनकी परीक्षाएं चल रही थीं। हालांकि ये एक मायने में सही भी रहा कि कक्षायें जब बाधित हुई तबतक अकादमिक सत्र समाप्त हो चुके थे। बीच में होता तो बच्चों की पढ़ाई अधिक प्रभावित होती।

लेकिन स्कूल से दूर हुए बच्चों के लिए क्या करें, ये चुनौती शिक्षकों के सामने थी। कुछ शिक्षकों ने पहल की, बाद में पूरा विभाग ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षा देने की कोशिशों में जुट गया। तमाम शिक्षाविद् जब टीवी और अख़बारों के जरिये ऑनलाइन शिक्षा देने के तरीके बता रहे थे, सरकारी स्कूल से जुड़े शिक्षक उस सच्चाई से सामना कर रहे थे, जहाँ आधे बच्चों के घरों में ऑनलाइन पढ़ने के लिए स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट जैसे साधन ही नहीं थे। जिनके घरों में स्मार्टफोन थे, वे कभी बच्चों के लिए लर्निंग टूल की तरह इस्तेमाल नही हुए थे। वे परिवार के लिए लोगों से संपर्क करने अथवा मनोरंजन के साधन थे।

घर में मोबाइल बच्चों के पास पढ़ने के लिए हो, ऐसी स्थिति भी नहीं थी क्योंकि परिजन अपने दैनिक काम के लिए भी उसका इस्तेमाल करते थे। लॉकडाउन खुलने के बाद तो बच्चें या तो देर रात अथवा सुबह में ही शिक्षकों के भेजे काम को देख सकते थे। बात केवल डिजिटल साधन तक ही नहीं सीमित रही। देश के ग्रामीण और दुरस्त इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या भी बहुत ज्यादा है। डिजिटल साधन होने के बावजूद इन इलाकों में विडियो कॉन्फ्रेंसिंग एप के जरिये पढ़ाना एक दुष्कर कार्य था। लेकिन शिक्षक हार नही माने! मोबाइल के जरिये ही बच्चों को शिक्षण गतिविधियाँ साझा करने लगे।

बच्चों के पास इन्टरनेट नहीं था तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने इंटरनेट के लिए डाटा पैक रिचार्ज करवाए ताकि वे स्कूलों से जुड़ सकें। ऐसे अनेक शिक्षक मिले, जिन्होंने दर्जनों बच्चों के मोबाइल रिचार्ज करवाए ताकि उनके मोबाइल में इंटरनेट हो और वे शिक्षण सामग्री भेज सकें। सरकार की ओर से टीवी, रेडियो पर कई कार्यक्रम भी शुरू करवाए गए। भारत सरकार के दीक्षा जैसे ऑनलाइन मंच शिक्षकों के लिए बेहद उपयोगी बने। लेकिन बात जब बच्चों तक पहुँच की आई तो शिक्षकों के लिए फोन और व्हाट्सअप ही काम आए। सुनने में भले अटपटा लगता हो लेकिन देश के लाखों शिक्षक कीपैड वाले मोबाइल के जरिये ही बच्चों से जुड़े और उन्हें लॉकडाउन की अवधि में सीखने में मदद करते नज़र आए।

समय की मांग है कि आने वाले समय में सरकारी स्कूलों को संसाधनों से लैस किया जाए। भारत नेट परियोजना के जरिये गाँव-गाँव तक इन्टरनेट का जाल बिछने का काम तेजी से पूरा हो। बच्चों को डिजिटल संसाधन मुहैया कराई जाए। शिक्षकों को तकनीकी शिक्षा देने के लिए तैयार किए जाए।

सरकारी स्कूलों में हुए अनोखे प्रयोग: कोरोना संकट के समय सरकारी स्कूलों के बच्चों और शिक्षकों ने कई अनोखे प्रयोग भी किये। शासकीय कुलदीप निगम उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नर्रा, महासमुंद, छत्तीसगढ़ के अटल टिंकरिंग लैब के जरिये दो छात्रों- धीरज यादव और वैभव देवांगन ने बिना बिजली और बिना बैट्री के उपयोग होने वाला सैनिटाइजर डिस्पेंसर बनाया है जो छात्रों, अधिकारीयों, कर्मचारियों के लिए फायदेमंद साबित होगा। इसी तरह सुपौल (बिहार) के ललित नारायण लक्ष्मी नारायण बालिका उच्च विद्यालय के शिक्षक सौरभ सुमन ने दिव्यांग लोगों के लिए एक ऐसा यंत्र बनाया है, जो फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाए रखने में मदद करेगा।

गाजीपुर (यूपी) की प्रियंका यादव जैसे शिक्षक भी थे, जिन्होंने बच्चों के लिए 45 दिनों की शिक्षण सामग्री अपने हाथों से तैयार की और उन्हें उनके घर तक विभागीय काम करने के दौरान पहुंचाया। वाराणसी में सरिता राय, रविन्द्र सिंह सहित कई शिक्षकों ने बच्चों के ऑनलाइन नामांकन के लिए प्रयास किए। दुमका के श्याम किशोर गांधी हो या फिर छत्तीसगढ़ के विजय शर्मा, सरकारी स्कूलों से जुड़े ये शिक्षक बच्चों से जब मोबाइल से भी जुड़ नही पा रहे थे तो इन्होने लाउडस्पीकर के जरिये पढ़ाना शुरु कर दिया। ऐसे न जाने अनेक प्रयोग हुए। यूपी के सोनभद्र में शिक्षा विभाग ने उन शिक्षकों को प्रमाण-पत्र देकर उत्साहित किया, जिन्होंने विपरीत स्थितियों में भी बच्चों को रिमोट लर्निंग से जोड़ने की कोशिश की।

सरकारी स्कूल के साथी बने समाज: संकट के समय सेवा में जुटे सरकारी स्कूल के साथ समाज को अब जोड़ने की कोशिश होनी चाहिए। सरकारी स्कूल के बिल्डिंग न होते तो देश में इतने लोगों को आश्रय देना मुश्किल हो जाता। जरूरत है, स्कूलों के विकास में समाज को आगे आने की। गाँव हो या शहर, सरकारी स्कूल का परिसर सबसे भव्य, सुंदर और साधनसंपन्न बने, ऐसी कोशिश होनी चाहिए। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को सहयोग के लिए गाँव-गाँव में यूथ क्लब बने, जो बच्चों का मार्गदर्शन करे, उन्हें जीवन में बेहतर करने की प्रेरणा दे, आवश्यक सहयोग दे। एक कोशिश जौनपुर के सिकरारा ब्लॉक में चल रही है, जहाँ लॉकडाउन में गाँव आए पढ़े-लिखे युवा सरकारी स्कूल के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे है। ऐसी कोशिशें और होनी चाहिए।

समाज का बढ़ेगा लगाव : लॉकडाउन लागू हुए 100 से अधिक दिन बीत गए हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों ने सीमित साधन में ही बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखने की अपनी ओर से भरसक कोशिश की है। बहुत कुछ करना अभी बाकी है। अच्छी बात है कि शिक्षकों ने इस समस्या के बीच खुद को अपडेट करने में समय लगाया है। कई तरह के वेबिनार में सहभागिता हो या फिर तकनीकी ज्ञान अर्जित करने की कोशिश, ये आगे बहुत काम आने वाले है। कोरोना संकट के बाद सरकारी स्कूली शिक्षा के प्रति लोगों का लगाव और बढ़ेगा। ऑनलाइन शिक्षा के दायरे में भले कम बच्चें हो, सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले अभिभावक अब शिक्षक की मेहनत देख रहे है। उनके पढ़ाने के तरीके से अवगत हो रहे है।

शिक्षक-अभिभावक संबंध अब शिकायत और जानकारी साझा करने वाला नहीं, उनकी मेहनत और बच्चों के साथ उनके लगाव को समझने वाला बन रहा है। यूपी का उन्नाव हो या राजस्थान का जलालसर, देश के कई हिस्सों में लोगों ने इस संकट के समय सरकारी स्कूलों को सँवारने का जिम्मा लिया। यह सरकारी स्कूलों के लिए अच्छी ख़बर है। समाज-स्कूल की बढ़ती नजदीकी सुखद है। सरकारी स्कूलों ने इस संकट के समय जिनकी सेवा में जुटे है, उन्ही में से ज्यादातर के बच्चें स्कूलों में आते है। वे शिक्षकों की मेहनत और शिक्षा विभाग की सेवा को आसानी से इग्नोर नही कर पायेंगे।

कोरोना योद्धा के रुप में सम्मान मिले : कोरोना संकट के समय जब मानवता संकट में थी तो समाज ने स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस, सफाई कर्मचारी की भूमिका को खूब सराहा। भारत सहित दुनियाभर में ये कोरोना वारियर्स के रूप में पहचाने गए। इनके लिए लोगों ने तालियाँ भी बजाई। प्रशंसा में शब्द कहे। इस दौर में जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने वाले स्वयंसेवी लोग भी किसी फ़रिश्ते से कम नही थे। इनके योगदान को समाज कभी नही भूल सकता। लेकिन इन सबके बीच देश के लाखों सरकारी स्कूल और वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की भूमिका एक ऐसे अनाम योद्धा की तरह रहा, जिसे कोरोना के खिलाफ चल रहे जंग में अधिक सम्मानजनक स्थान नही मिला।

वे आज भी उपेक्षा और अवहेलना के शिकार हैं। लोग सरकारी स्कूलों के शिक्षकों पर यह तोहमत भी लगाते नज़र आए कि वे कुछ कर नहीं रहे, केवल घर बैठे वेतन ले रहे हैं। जबकि वास्तविकता ये थी कि या तो वे बच्चों को स्कूल और लर्निंग से जोड़े रखने की कोशिशों में जुटे थे या फिर समाज की सेवा में। शिक्षण के साथ सेवा में जुटे शिक्षक व शिक्षा विभाग कोरोना योद्धा के रूप में सम्मान पाने का हक़दार हैं। समाज व सरकार से जुड़े लोगों को वैसे शिक्षकों, अधिकारियों को जरूर विशेष रूप से सम्मानित करना चाहिए, जिन्होंने कोरोना महामारी के समय उल्लेखनीय कार्य किया है।

(लेखक कई राज्यों में सरकारी स्कूली शिक्षा से जुड़े रहे हैं और Sarkarischool.in के संस्थापक हैं)

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