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कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को कैसे दिखाया आईना? पढ़ें

कोरोना संकट के बीच दुनिया के देशों ने अपनी आर्थिक योजनाओं और कार्यक्रमों को पिछवाड़े छोड़ दिया है और जीवन रक्षक रणनीतियों को प्रमुखता दे रहे हैं।

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डॉ. वीर सिंह

जीवन का क्या मोल है, इसे उतना अधिक कभी नहीं समझा गया है जितना कि कोविड-19 विश्वव्यापी महामारी के काल में समझा जा रहा है। सकल घरेलू उत्पाद और जीएनपी जैसे भौतिकतावादी प्रगति के संकेतक जीवन के प्रति जीवन के प्रेम के सामने फीके पड़ गए हैं। दुनिया के देशों ने अपनी आर्थिक योजनाओं और कार्यक्रमों को पिछवाड़े छोड़ दिया है और जीवन रक्षक रणनीतियों को प्रमुखता दे रहे हैं। पूरी दुनिया कीआज एक ही रेखांकित नीति है: जीवन को “हाँ”, मौत को “ना”।

“जीवन जीवन से प्यार करता है”- पारिस्थितिकी दर्शनशास्त्र के जनक हेनरीक स्कोलिमोस्कि के दर्शन से यह ब्रह्म वाक्य उद्घोषित होता है। जीवन का सार्वभौमिक और सनातन सत्य यही है। चूंकि जीवन जीवन से प्यार करता है, इसलिए जीवन को हर जगह जीवन देखने की इच्छा रहती है। जीवन का अर्थ मात्र मानव जीवन नहीं है, बल्कि इसकी समग्रता में जीवन है—अर्थात जीवमंडल की ‘छतरी’ के नीचे पूरा जीवन। जीवन जीवित ग्रह पृथ्वी से परे भी जीवन को देखने की इच्छा रखता है। पृथ्वी से परे जीवन का जीवन दर्शन का सपना एक दिन सच होगा, जिसकी पूरी सम्भावना है।

जीवन केवल जीवित प्रणालियों में, या जीवित वस्तुओं, या जीवन सम्बन्धी उन घटनाओं और प्रक्रियाओं में चमत्कार और रहस्यों की खोज करता है जो जीवन का समर्थन, संरक्षण और वृद्धि करती हैं। जीवन के लिए सबसे बड़ा आकर्षण और सबसे बड़ा अनुराग जीवन ही है। अंतरिक्ष में पृथ्वी के इतर जहाँ जीवन की लेश मात्र भी संभावनाएं हैं, जीवन अपने बढ़ते वर्चस्व की कल्पनाएं करने लगता है।

सम्पूर्ण ग्रह जीवन की सबसे बड़ी इकाई है। एक विराट भूखंड (जैसे पर्वत, रेगिस्तान, महासमुद्र) जीवन की माध्यम इकाई है। जैव मंडल का प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र जीवन की एक लघु इकाई है। प्रत्येक जीव प्रजाति (पौधा, जंतु और सूक्ष्मजीवी) जीवन की सूक्ष्म इकाई है। जीवन विविधता में ही खिलता है, फलता है, अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचता है। एकल प्रजाति के रूप में, अर्थात अपनी सूक्ष्म इकाई के रूप में, जीवन नहीं पनप सकता।

एक भी प्रजाति अपने आप में स्वतंत्र नहीं है। हर प्रजाति और हर प्रजाति का हर सदस्य कई अन्य प्रजातियों पर निर्भर है। प्रजातीय विविधता जितनी अधिक होगी, जीवन उतनी ही सघनता से फूलता-फलता है। जब हम जीवन की बात करते हैं, तो हम पृथ्वी पर प्रचलित सभी जीवन रूपों पर अपनी निर्भरता को गहराई से देखते हैं। मानव समाजों की सबसे बड़ी भूल यह है कि उसने एकल प्रजाति व्यवस्थाओं से अपना मोह जोड़ लिया है। जैसे जैसे धरती पर एकल-प्रजातीय प्रणालियाँ विकसित हो रहीं हैं वैसे ही जीवन प्रक्रियाएं टूट रही हैं।

अन्वेषण के माध्यम से यदि हमारे संज्ञान में आता है कि किसी अन्य ग्रह की कुछ विशेषताएं पृथ्वी से मिलती-जुलती हैं तो हमारी उत्सुकताएं उमड़ने लगती हैं। क्यों? क्योंकि जिंदगी को जिंदगी से प्यार है। हमारी उत्तेजना और जिज्ञासुता की कोई सीमा नहीं रहती जब हमें पता चलता है कि धरती के इतर कहीं जीवन देने वाले तत्त्व मिले हैं। हम चकित हो जाते हैं और भीतर ही भीतर मीठी भावनाओं से भर जाते हैं जब हम किसी वीडियो में लाल ग्रह मंगल की सतह पर नदियों के निशान देखते हैं, जिससे पता चलता है कि मंगल ग्रह अतीत में एक जीवित ग्रह था। हमारी नसों में सुखद गुदगुदी-सी होती है जब कुछ प्रमाण मिलते हैं कि मंगल ग्रह की शीतलता में जीवाणु (क्रायोफिलिक बैक्टीरिया) हो सकते हैं।

वर्ष 2004 और 2012 में शुक्र पारगमन (वीनस ट्रांजिट) की अंतरिक्ष घटनाओं को दुनिया ने पर्व की तरह मनाया था। जब 1969 में अपोलो-11 चंद्रमा की सतह पर उतरा और मानव चरण ने पहली बार चाँद पर अपनी छाप छोड़ी तो धरती पर मानवता झूम उठी थी ! तब लगा था कितनी विराट है जीवन की उड़ान! जब भारत के चंद्रयान ने चन्द्रमा पर जल की खोज की तो मानव मन में उमंगों की लहर दौड़ गई थी- पानी है तो वहां जीवन की भी संभावनाएं हैं।

हम यह जानने पर खुशी के साथ कूदते हैं कि शनि के चंद्रमाओं में से एक पर पृथ्वी के समान वातावरण है। जब यह संदेश कि “हम अकेले नहीं हैं” का प्रसारण किया जाता है, या ऐसा सन्देश समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाता है, तो हमारा मन जीवन के बहुआयामी रंगों से भर जाता है। एलियंस पर केंद्रित कोई भी कथा हमें रोमांचित करती है।

जीवन के लिए जीवन का प्यार हमारी नसों में दौड़ता है। जीवन के लिए जीवन का प्यार एक लौकिक विशेषता है। जीवन की यह विशिष्ठ लौकिकता जीवन को अलौकिक सीमाओं तक बढ़ाना चाहती है। जीवन अभिवृद्धि प्रक्रियाओं का अनुभव कर हमारी प्रफुल्लताएं चरम उत्कर्ष पर होती हैं। यह जिज्ञासा, यह उत्साह, यह रोमांच, यह प्रफुल्लता सब हमें एक ही अनुभूति कराती हैं- कि जीवन जीवन-अनुरागी है।

जीवन का यह जीवन-अनुराग केवल मनुष्यों में नहीं, सभी जीव-रूपों के डीएनए में है। ब्रह्मांडीय विधि-विधान में जीवन अमरता का वरदान लिए हुए है। इसीलिए एक जीव अपने जैसे जीव-रूप पैदा करके ही मृत्यु को प्राप्त होता है। अपने क्षितिज, अपने क्षेत्र, अपने प्रकाश और अपनी महिमा का विस्तार जीवन का धर्म है। इसलिए जीवन अपने अस्तित्व को पृथ्वी तक सीमित रखने से संतुष्ट नहीं हो सकता। यह अपने पंखों से दूसरे ग्रहों और चंद्रमाओं तक अपना विस्तार करने के लिए प्रयासरत है। जीवन का जीवन-अनुराग ब्रह्माण्ड की इच्छा-शक्ति में निहित है।

(डॉ. वीर सिंह, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक हैं)

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