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होमी जहांगीर भाभा: “मौका मिले तो मैं 18 महीने में परमाणु बम बना सकता हूं”

होमी जहांगीर भाभा की ही दृढ़ इच्छाशक्ति का सुखद परिणाम है जो भारत आज परमाणु कार्यक्रम के अपने सशक्त अस्तित्व के साथ दुनिया में खड़ा हुआ है।

Author नई दिल्ली | October 31, 2017 3:46 PM
होमी जहांगीर भाभा। (Photo: Express)

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

अक्टूबर 1965 में ऑल इंडिया रेडियो से एक बुलंद आवाज गूंजी थी कि मुझे मौका मिले तो मैं 18 महीने में परमाणु बम बना सकता हूं। ये महत्वाकांक्षी बोल भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के थे, जिनकी आज 30 अक्टूबर को जयंती है। भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई में हुआ था। भाभा की ही दृढ़ इच्छाशक्ति का सुखद परिणाम है जो भारत आज परमाणु कार्यक्रम के अपने सशक्त अस्तित्व के साथ दुनिया में खड़ा हुआ है।

भाभा की दूरदृष्टि ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही सम्भवतः भारत के वर्तमान विज्ञान सम्पन्न स्वरुप की परिकल्पना को साकार होते देख लिया था। ये वो समय था, जब भारत के आम वैज्ञानिकों, राजनेताओं और व्यावसायियों से लेकर जनता तक सभी परमाणु ऊर्जा जैसे किसी शब्द से अपरिचित थे, ऐसे में युगदृष्टाओं विशिष्ट भारतीय वैज्ञानिकों नोबल विजेता वैज्ञानिक सी.वी. रमण और होमी जहांगीर भाभा तथा महान व्यावसायी जेआरडी टाटा के अथक प्रयासों से 1945 में मुंबई में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च स्थापित हुआ और 1948 में भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग अस्तित्व में आया।

सर सी. वी. रमण डॉ होमी जहाँगीर भाभा को भारत का लियोनार्डो डी विंची कहा करते थे। आज इसी भारतीय लियोनार्डो की प्रेरणा शक्ति के बल पर विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा भारत उनकी नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना से लेकर परमाणु क्षेत्र के असंख्य अनुसंधान कार्यों को बखूबी पूरा कर पा रहा है। एक समय था, जब पश्चिमी देश भारत की यह कहकर उपेक्षा करते थे कि पहले हम अपना औद्योगिक विकास तो कर लें फिर परमाणु शक्ति जैसी परम शक्ति के बारे में सोचें। लेकिन भाभा ने इस आलोचना का समीचीन उत्तर देते हुए दशकों पहले भारत की परमाणु उपादेयता की स्थिति को स्पष्ट कर दिया था कि कोई भी अल्प विकसित राष्ट्र परमाणु ऊर्जा का प्रयोग शान्ति पूर्वक तथा औद्योगिक विकास के लिए कर सकता है।

यह अलग बात है कि विश्वशांति और भारत के अभ्युदय के लिए परमाणु शक्ति को पूजने वाले भाभा शायद यह कभी नहीं सोच सके होंगे कि इसी परमाणु शक्ति के दुरुपयोग द्वारा कभी उत्तर कोरिया अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों के साथ विश्व में अनावश्यक चिंता और खतरे की स्थिति पैदा कर देगा। उत्तरी कोरिया की परमाणु सनक जिस तरह अमेरिका के जी का जंजाल बनती जा रही है, वहीं अकेला अमेरिका ही नहीं कहीं न कहीं दुनिया के सभी देश परेशान हैं। कल ही अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के आए बड़े बयान ने फिर सोच में डाल दिया कि तीसरा विश्वयुद्ध शुरु हो ही जाएगा क्या? मैटिस का कहना है कि उत्तरी कोरिया द्वारा अमेरिका या उसके सहयोगियों पर किसी भी संभावित परमाणु हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों की अमानवीयता से अनुभूत भारत के परमाणु स्वप्नदृष्टा डॉ. भाभा कभी भी विश्वशांति को भंग करने में परमाणु ऊर्जा की भूमिका को स्वीकार नहीं कर पाते। आज की विश्व परिस्थितियों में भाभा कितना सटीक बैठ पाते, यह सोचने का विषय है। क्या भाभा विश्व को उत्तरी कोरिया की परमाणु सनक और अमेरिका की परमाणु युद्ध की रक्षा धमकियों का कोई समीचीन हल दे पाते? क्या आज भारत के पास भाभा होते तो भारत विश्व में एक परमाणु सम्पन्न प्रशासक की हैसियत से कुछ ऐसा कर पाता, जो आज विश्वशांति के लिए बहुत आवश्यक है। एक सनकी और एक उत्तेजक पर एकसाथ परमाणु शांति नियंत्रण करने में सम्भवतः भारत सक्षम हो पाता। आज जयंती पर डॉ. भाभा को हर भारतीय का कोटिशः नमन।

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