बर्तनों में खटपट ‘समावेशी’ होती है, विद्रोही नहीं

कितनी सही और सहज बात है कि हिंदू-मुसलमान दोनों एक—दूसरे के धर्म का कितना सम्मान करते थे, कितना आदर देते थे। भारत में एक पुरानी कथा परंपरागत है और जो ठीक भी है, वह यह कि जब कुछ बर्तन एक साथ रखे हों तो कुछ—न—कुछ आवाज आती ही है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं हो जाता है कि हम एक—दूसरे के रक्त के प्यासे हो जाएं।

तस्वीर लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान की है, जब चुनाव कर्मचारियों ने वोटर्स की आरती उतारी। एक्सप्रेस आर्काइव

प्रसिद्ध पुर्तगाली इतिहासकार फरी सौजा ने ‘दक्षिण के हालात’ में लिखा है कि ‘हिंदू और मुसलमान एक—दूसरे की सेवा करते थे और मुसलमान राजा हिंदुओं को उच्च और सम्मानित पदों पर नियुक्त किया करते थे। यानी, इस समय हिंदुओं के विरुद्ध कोई भेदभाव नहीं था। वह बिना किसी बाधा के अपने धार्मिक कृत्य और उत्सव मनाते थे। मुसलमान हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के प्रति परम आदर प्रदर्शित किया करते थे।’ हुमायूं ने राज्य की शक्ति वृद्धि निमित्त वसीयत, जो अपने पुत्र को लिखी थी, उसके कुछ अंश को उद्धृत करना उपयुक्त होगा- ‘प्रिय पुत्र, भारत के साम्राज्य में अनेक धर्मों का पालन करने वाले निवास करते हैं। ईश्वर को धन्यवाद है कि उन्होंने ऐसा साम्राज्य तुम्हें प्रदान किया। तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम अपने हृदय से सभी ऐसी भ्रामक धारणाओं को निकाल बाहर करो, जो तुमने विभिन्न धर्मों के प्रति बना रखी हो। प्रत्येक व्यक्ति के प्रति उनके धर्मानुकूल न्याय करो। गाय की कुर्बानी विशेषरूप से बंद कर दो, कारण तुम इसके रहते भारतीय जनता के हृदय को जीत नहीं सकते। तुम्हे ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे तुम्हारी प्रजा हृदय से राज्यभक्तं बन सके।’

सन 1857 के विद्रोह के पहले अंग्रेजों की भारतीय सेना सभी प्रकार के लोगों से बनी हुई थी। उसमें हिंदू और मुसलमान, सिख और पुरबिया सभी शामिल थे। सन 1857 वाले इसके सर्वमान्य प्रयत्न से, जो विदेशी शासकों की बढ़ती राष्ट्रीय एकता का परिणाम था, उनकी आंख खुल गई, और बाद में जो नीति अपनाई गई, उसका लक्ष्य उसी एकता को भंग करना था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पुस्तक ‘खंडित भारत’ से साभार।

अब आज भारत में मुसलमानों की क्या स्थिति है इस पर भी नजर डालें। ‘गेटी इमेजेस’ एजेंसी की एक सर्वेक्षण के अनुसार आज देश में 17.20 करोड़ मुस्लिम रहते हैं। यह ब्रिटेन, स्पेन और इटली की कुल जमा आबादी के बराबर है। यह दुनिया के किसी भी देश में मुसलमानों की तीसरी सबसे ज़्यादा बड़ी आबादी है और हिंदुस्तान के मुसलमानों में जितनी विविधता देखने को मिलती है, वह किसी और देश के मुसलमानों में नहीं।

एक वाक़या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से जुड़ा है । फ़रवरी 2020 में तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन पाकिस्तान के दौरे पर गए तो साझा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इमरान ने बड़े गर्व से कहा कि ‘तुर्कों ने हिंदुस्तान पर 600 सालों तक शासन किया।’ पाकिस्तान के इतिहासकार मुबारक अली ने एक साक्षात्कार में कहा कि मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के प्रति पाकिस्तानियों और मुसलमानों के एक तबके में दिखने वाली गर्व की भावना, परेशान करने वाली बात है।

मुबारक अली कहते हैं,’जब कोई मुसलमान कहेगा कि हमने हिंदुस्तान पर एक हज़ार सालों तक राज किया तो हिंदू यही सोचेगा कि मुसलमान ख़ुद को यहां का नहीं मानते हैं। इसी ओढ़े हुए गर्व के कारण हिंदुओं के लिए मुसलमानों को बाहरी कहना और आसान हो जाता है। मुसलमानों को सोचना चाहिए कि मध्यकालीन भारत में जो मुस्लिम शासन था वह आम मुसलमानों का शासन नहीं था। वह एक सत्ता वर्ग था। आप जब कहते हैं कि मुसलमानों ने सैकड़ों सालों तक तुम पर राज किया तो इसका यही भाव होता है कि हिंदुओं को दबाकर रखा गया।’

मुसलमान विजेताओं का रुख साधारणतः हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता का ही रहा है। उसके लिए उस काल की एक घटना का उल्लेख यहां किया जा सकता है। हिंदुओं ने जब उस पर कब्जा करने वाले मुहम्मद-बिन कासिम से पूजा आदि के विषय में स्वतंत्रता की प्रार्थना की तो उसने इराक के गवर्नर हजाज़ को इस संबंध में पत्र लिखा।

उसने उत्तर दिया -‘चूंकि उन्होंने (हिंदुओं ने) अधीनता स्वीकार कर खलीफा को कर देना स्वीकार कर लिया है, इसलिए उनसे और किसी बात के लिए कुछ कहना ठीक नहीं है। वे अब हमारे संरक्षण में आ गए हैं और हम उनके जानमाल पर किसी तरह अपना हाथ नहीं बढ़ा सकते। उनको अपने देवताओं को पूजने की अनुमति दी जाती है। किसी व्यक्ति को उसके धर्माचरण से रोका या विरत नहीं जा सकता। वे अपने घरों में जैसे चाहें, रह सकते हैं।’ यह पैगंबरों के उपदेशों और उस सिद्धांतों के अनुकूल था जिसके अनुसार खलीफा लोग, जो अधीन होकर जजिया कर देना स्वीकार करने वाले गैर-मुसलमानों के साथ इस प्रकार बर्ताव करते थे, अनुशासित हुआ करते थे।

कितनी सही और सहज बात है कि हिंदू-मुसलमान दोनों एक—दूसरे के धर्म का कितना सम्मान करते थे, कितना आदर देते थे। भारत में एक पुरानी कथा परंपरागत है और जो ठीक भी है, वह यह कि जब कुछ बर्तन एक साथ रखे हों तो कुछ—न—कुछ आवाज आती ही है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं हो जाता है कि हम एक—दूसरे के रक्त के प्यासे हो जाएं। राजनीतिज्ञ तो यह चाहते ही हैं कि आपसी फूट हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बनी रहे और वह उसका लाभ उठाते रहें, सत्ता—सुख भोगते रहें।

इस बात की पूरी तैयारी अंग्रेजों ने अपने समय में ही की थी कि हिंदू-मुसलमान अलग—अलग कौम हैं जो कभी आपस में उसी प्रकार नहीं मिल सकते जिस प्रकार रेल की पटरियां कभी मिल नहीं सकतीं। हां, बिना दोनों पटरियों के कोई गाड़ी चल भी नहीं सकती। इसलिए दोनों से सामान्य दूरी बनाकर रखो और उस पर अपनी शासन रूपी ट्रेन चलाते रहो। परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज वर्षों तक अपनी फूट डालो राज करो की नीति पर भारतीयों को गुलाम बनाकर रखा और अपनी इसी नीति से हिंदुओं और मुसलमानों के मन को इतना विषाक्त कर दिया कि आज जगह—जगह हिंदू-मुसलमान के दंगे एक आम कहिए या सामान्य बात हो गई ही।

अंग्रेजों की इसी घृणित नीति के कारण भारत दो हिस्सों में बांटकर हिंदुस्तान-पाकिस्तान बन गया जिसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदू—मुसलमान काट दिए गए, सरहद पर खून की नदियां बह गईं। ऐसा नहीं है कि एक—दूसरे का रक्त बहाना अब बंद हो गया है। अब तो राजनीतिज्ञों दोनों के मध्य विवाद कराने को ही अपना धर्म समझते हैं। ‘ इसके बाद भी ऐसे राजनीतिज्ञों पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होती, उल्टे उनकी पदोन्नति हो जाती है।

यदि सरकार अपने मन में ठान ले कि देश में अब कोई दंगे नहीं होने देंगे तो कोई शक नहीं कि सरकार आज इतनी सक्षम है कि वह कानून बनाए और वैसे कानून हैं भी कि जो समाज में रह रहे दोनों समुदायों के बीच किसी प्रकार नफरत के बीज बोने का प्रयास करेंगे, उस पर सख्त से सख्त कार्रवाई होगी। फिर इस समस्या का निदान धीरे—धीरे होने लगेगा। पर, इस कार्य के निमित्त किसी को बीड़ा तो उठाना ही पड़ेगा, लेकिन उसके लिए कौन होगा जो आगे आकर कहेगा कि हम देश में सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। पर, ऐसा कौन होगा जो इसका बीड़ा उठाए और बढ़ती आपसी नफरत को दूर करने के लिए अपने को न्योछावर कर दे।

हिंदू यदि गर्व से कहता है कि हिंदुस्तान उसका है, तो मुसलमान भी तो यही कहते हैं कि हिंदुस्तान उनका है, क्योंकि उनके पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में साथ—साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रजी हुकूमत के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंका था। फिर दोनों के मन में यह घृणित भाव क्यों और कैसे आया? निश्चित रूप से यह कोई—न—कोई साजिश के ही कारण हुआ है और इसमें राजनीतिज्ञों की संलिप्तता जगजाहिर है। उनकी सोच, उनकी दूरदर्शिता एक सामान्य लोगों से अधिक होती है, क्योंकि वह जानते हैं कि जब तक समाज को खंड—खंड में बांटा नहीं जाएगा, वह अपना कल्याण नहीं कर सकते। अपनी स्वार्थ सिद्धि के मोह में सदैव वह कभी हिंदू-मुस्लिम, कभी अगड़ी-पिछड़ी, कभी ब्राह्मण—राजपूत—यादव के नाम पर समाज को बांट कर सत्ता पर काबिज होना अपनी नियति बना चुके हैं। इन सब कामों के लिए जो जितना समाज को विघटित कर सकता है, सत्ता की बुलंदियों पर उतनी जल्दी पहुंच जाता है।

अभी अगले वर्ष देश के पांच राज्यों में विधानसभा का चुनाव होने वाला है। उसमे आप देखते रहिए जो समाज के सीधी—सादी जनता को बरगलाएगा, वह उतनी आसानी से सत्ता पर काबिज हो जाएगा। बस थोड़ा इंतजार कीजिए। हमें नेतृत्व और समाज को दिशा—निर्देश देने वाले पहले भी और आजादी के बाद भी मन ही मन यह चाहते रहे हैं कि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई यह नीति अच्छी है, इसलिए उसे आगे बढ़ते रहो। आजादी दिलाने वाले हमारे राजनीतिज्ञ यह जानते थे, तभी इसलिए संविधान सभा में हर किसी को प्रतिनिधित्व देने का निर्णय लिया गया। वह इसलिए कि सबको सामान्य रूप से विकसित होने का अवसर मिले। लेकिन, आजादी के बाद हुआ इसका उल्टा। उस फार्मूले का अर्थ ही गलत लगा लिया गया जिससे जातिवाद को बढ़ावा मिला।

आज हम उसी का दंश भोग रहे हैं कभी हिंदू-मुसलमान के रूप में तो कभी अगड़ी और पिछड़ी जाति के रूप में। हमारा देश इस जातिगत समीकरण से आगे नहीं बढ़ेगा, बल्कि एक प्रकार से आपसी कट्टरपंथ में आकंठ डूबकर अपने विनाश का रास्ता चुन लेगा। अगर हम हिंदू-मुसलमान की कट्टरता से बाहर नहीं निकलेंगे तो एक की करनी का फल सब को अर्थात सारे देश को भुगतना पड़ेगा। इसलिए अपना फर्ज देश को आगे बढ़ाने में लगाइए, न कि हिंदू मुस्लिम कटुता को बढ़ाने में अपना समय नष्ट कीजिए।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।

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