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सितम्बरी आयोजनों के सच के नीचे दबी, पीड़ा से कराहती हिन्दी

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया था।

Author वास्को-द-गामा, गोवा | September 13, 2016 13:52 pm

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

जैसे ही सितम्बर का महीना करीब आने लगता है हमारी हिन्दी की बैचेनी किसी अप्रत्याशित हृदयाघात की आशंका से बढ़ने लगती है। हिन्दी को वर्षभर की उपेक्षाओं के बाद अचानक से किसी त्योहार की तरह कृत्रिमता के साथ मनाया जाने लगता है, हिन्दी दिवस, सप्ताहों और पखवाड़ों में आयोजनों की झड़ी लग जाती है। अकस्मात् सभी छोटे बड़े सरकारी कभी कभी गैरसरकारी कार्यालयों में सभी लोग हिन्दी हिन्दी करने लगते हैं। बड़े बड़े पोस्टर बनते और दीवारों पर लटक जाते हैं, व्याख्यानों में हिन्दी सेवी होने की होड़ लग जाती है, पुरस्कारों को पाने की दौड़ में हर कोई साबित करना चाहता है कि मैंने सालभर ज्यादा हिन्दी-हिन्दी खेला है, मेडल मुझे ही मिलना चाहिए।

ये सारी शूल की तरह अतिसंवेदनशील हिन्दी के हृदय में चुभने वाली कार्यालयीन प्रतियोगिताएं, उनके पुरस्कार मानो हिन्दी को अहसान जताना चाह रहे हों कि देखो संविधान में बहुत सी भाषाएं हैं शुक्र मनाओ हम सिर्फ 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा के हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित करने के निर्णय को पर्व की तरह आयोजित करते आ रहे हैं, वर्ष 1953 से आज तक। और आयोजनों में लिपटे ये दंश हिन्दी को एक सितम्बरी पीड़ा देने के अलावा और कुछ नहीं देते हैं।

हिन्दी कोई त्योहार नहीं है, जिसे नियत समय पर मनाकर स्वांतःसुखाय का आनंद लेकर अगले चक्र के लिए छोड़ दिया जाए। हिन्दी हमारी भाषा है और भाषा में संवेदनाएं होती हैं, तभी तो हम आप अपनी संवेदनाओं को सम्प्रेषित कर पाते हैं। हिन्दी स्वतंत्रता के बाद से ही उस पीड़ा को झेलती आई है, जिसे उसके अपनों ने ही दिया है। हिन्दी जब जापान, चीन, फ्रांस, रुस, जर्मनी को विश्व में विकसित होते देखती है, तब कहीं न कहीं उसे पीड़ा-मिश्रित ईर्ष्या होती है कि काश! वो भी जापानी, चीनी, फ्रेंच, रुसी और जर्मनी भाषाओं की तरह अपने भारतीयों के द्वारा बिना किसी पूर्वाग्रह के बोली जाती।

भारत के न्याय से लेकर हर वैज्ञानिक खोज तक हिन्दी उपयोग की जाती तो सामान्य आदमी खुद से समझ पाता कि न्यायालय ने क्या फैसला सुनाया है या कि भारत भी इन देशों की तरह अपनी सभी वैज्ञानिक उपलब्धियों को आम हिन्दुस्तानी तक पहुंचाकर उनको खोज पाने की सार्थकता सिद्ध कर पाता। हिन्दी सिर्फ सरकारी कार्यालयों में घुटन के साथ काम करने वाले एक बाबू के पद से अधिक कभी पद्दोनत ही नहीं हो पाती है। हिन्दी भी अपने देश के बच्चों के मुख से तोतले रुप में निकलने की चाह रखती है, लेकिन अचानक से उसे तब पीड़ा हो जाती है जब बच्चों की जिव्हा और माता-पिता का आग्रह उनसे अंग्रेजी की घिसीपिटी राइम सुनाने को कहकर हिन्दी को उपेक्षाओं के एक और चादर से ढंक देते हैं।

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ये अलग बात है कि हिन्दी फिर उन चादरों से स्वयं को निकालती है और स्वयं को सिद्ध करने की पुरजोर कोशिश में पुनः उतनी ही शक्ति से खुद को फिर क्षीण कर लेती है। हमने हिन्दी को बहुत दुख दिए हैं और देते आ रहे हैं। यह हम भारतीयों की आनुवांशिक प्रवृत्ति है कि घर की मुर्गी दाल बराबर, हम हमेशा दूसरों के प्रति आकर्षित होते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं, अपनी ओर कभी भी सकारात्मक सोच के साथ देखते ही नहीं हैं। हांलाकि हम परम्पराओं का निर्वाह किसी नियम के तहत हमेशा करते आए हैं।

हिन्दी का सितम्बरीकरण इसी निर्वाहित कर्तव्य से अधिक कुछ नहीं है। हिन्दी के प्रति ऐसी किसी पर्व-आयोजन की कर्तव्यनिष्ठा दिखाने की जरुरत नहीं है, हिन्दी को जो चाहिए कम से कम अब तो सचेत होकर हम उसे दे दें। लगभग 63 हिन्दी दिवसों से कुछ सीखते हुए वास्तव में हिन्दी के लिए हृदय से राजभाषा मानते हुए वो करें, जिसकी हिन्दी अधिकारिणी है। मुंह में राम बगल में छुरी की नोंक पर हिन्दी को पीड़ा देते हमें लज्जा आनी चाहिए। स्वयं को आनुवांशिक गुलामी से मुक्त करने का सफल प्रयास ही हिन्दी को उसकी सितम्बरी पीड़ा से मुक्ति दिला पाएगा।

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