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नामवर सिंह: तब मैं रहियू अचेत…पर, साहित्य के चेतन जगत में सदैव शिखर पुरुष रहेंगे

नामवर सिंह अनंत में विलीन होकर अमर हो गए। उनसे जुड़ी अपनी यादों को साझा कर रहे हैं विराग गुप्‍ता।

हिंदी साहित्यकार और आलोचक नामवर सिंह का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। (Photo: Twitter@sheba_lsr)

श्रद्धेय नामवर सिंह ने हिन्दी में विचार और साहित्य के साथ संस्थाओं और समाज को बहुतायत में समृद्ध किया, इसलिए आलोचना का शिखर पुरुष कहना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का संकुचन ही माना जायेगा। मेरे पैदा होने के पहले उनकी छायावाद (1956) और कविता के नये प्रतिमान (1968) प्रकाशित हो चुकी थी। सिविल सेवा में हिन्दी विषय की तैयारी के लिए जब मैंने दूसरी परम्परा की खोज (1992) को पढ़ा तो एक नये नामवर का उदय हो चुका था।

नामवर जी चलता-फिरता विश्वकोष और साहित्य का विश्वविद्यालय थे। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति रहे नामवर जी की बीएचयू, सागर और जोधपुर विश्वविद्यालयों में उनकी गहरी छाप थी। अंग्रेजी के बाजार में हिन्दी की सीमाओं को समझते हुए नामवर जी ने जेएनयू में भारतीय भाषा केन्द्र को सशक्त बनाकर देशी भाषाओं को संगठित करने का भी कुशल प्रयास किया। नामवर जी की पहचान वाचिक परम्परा की ज्यादा है, इसलिए उनके साहित्य को अब और संजोने की जरुरत है।

लेखन की चुनौती और उससे उपजे साहित्यिक विरोधाभास ने उनको स्वस्थ, सफल और जीवन्त बनाये रखा। हजारी प्रसाद जी के योग्यतम शिष्य नामवर जी ने रामचन्द्र शुक्ल जी के विरुद्धों के सामंजस्य को बखूबी अपनाया। देश-विदेश घूमे नामवर जी ने अपनी विद्वता का बोझ कभी नहीं ढोया। तनी हुई पीठ और सीधी रीढ़ वाले नामवर जी अपनी पत्नी को देवता कहते थे। कम्युनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े नामवर जी की दक्षिणपंथ में भी समान स्वीकार्यता थी इसके बावजूद वे कभी दरबारी आलोचक नहीं बने। जेएनयू के प्रगतिशील समाज में धोती-कुर्ता की परम्परा का साहसिक निर्वहन नामवर जी के ही बूते की बात थी।

कई दशकों तक नामवर जी को पढ़ने और सुनने के बाद जुलाई 2012 में उनसे मिलने का सुअवसर जब मिला तो उनका व्यक्तित्व पितृवत आत्मीयता से ओत-प्रोत था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त सम्मान की चयन समिति की कई बैठकों में मैं उनके निवास गया और वे मेरे कार्यालय भी आये। नामवर जी के जन्मदिन के अवसर पर मेरी पत्नी का भी जन्मदिन का अद्भुत संयोग रहा। उन्होंने बनारसी अंदाज में मेरे दोनों बच्चों को खूब आर्शीवाद भी दिया।

किताबों के बीच रहने वाले नामवर जी बनारसी पान की मस्ती के साथ किताबों के बीच ही अपने सफर का अन्त चाहते थे। उनके भाई काशीनाथ जी ने भी लिखा है कि डॉक्टरों ने 1997 में उन्हें आराम करने की सलाह दी थी, पर वे माने नहीं। उनका कहना था कि जब पढ़ नहीं सकते, लिख नहीं सकते, तो जी कर क्या करेंगे। उनका आखिरी सार्वजनिक सम्बोधन 28 जुलाई 2018 को इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। इससे पहले मई 2018 में उन्‍होंने एनडीटीवी को एक इंटरव्‍यू दिया था। जीवन के गहराते अंधेरे में दिये गये उनके इस इंटरव्यू को देखें तो पता चलेगा कि घुमक्कड़ और यायावर नामवर जी अंंत तक पानी की तरह पारदर्शी बने रहे।

पांडित्य से भरपूर नामवर जी की लोकप्रियता का बढ़ा कारण उनकी सहज स्वीकरोक्ति थी। बीएचयू में महादेवी वर्मा के जन्म शताब्दी वर्ष में मई 2007 में महादेवी वर्मा की पंत जी से तुलना करने पर साहित्य में कूड़ा विवाद शुरू हुआ। इन सब विवादों से परे नामवर जी गीता के निष्काम कर्मयोगी बने रहे।

फिर कुछ दिनों के बाद उन्होंने अपनी गलती की स्वीकरोक्ति करते हुए गोस्वामी तुलसीदास की पंक्तियाँ दोहरा दीं- तब मैं रहियू अचेत।

हृदय की रिक्तता भरता
उठा शत कल्पान जलघर।
हृदय-सर रिक्त रह जाता
नयन-घट किन्तु भर आते
कभी जब याद आ जाते।

काशी के कबीर की ही तरह फक्कड़ और निर्भीक नामवर जी, साहित्य के चेतन जगत में सदैव शिखर पुरुष रहेंगे।
(विराग गुप्‍ता लेखक और वकील हैं।)

 

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