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चाटुकार-चरित्रम्: जन-सरोकारों को छोड़ गलत नैरेटिव सेट करने वाली सरकारों ने हमेशा मुंह की खाई है

अगर कोरोना से इतनी मौतें हो रही हैं, तो भी देखना है कि किस नैरेटिव को सपोर्ट करना है कि हम जिसके समर्थन में हैं, उसका बचाव और जिसके विरोध में हैं, उस पर ठीकरा फोड़ा जाए।

politicsतस्वीर प्रतीकात्मक है।

कमलेश कमल।

*मैं जिसकी गाऊँ, तुम भी उसकी गाओ का दौर*!
जैसे-जैसे कोई लोकतंत्र परिपक्व होता है, वहाँ जनता अधिक-से-अधिक जागरुक होने लगती है और अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने लगती है। ऊँचा घराना, करिश्माई व्यक्तित्व जैसी अवधारणाओं पर भी जल्दी ही प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं। ऐसे में राजा से रंक बनने और अर्श से फर्श पर गिरने में देर नहीं लगती। ऐसे तो यह किसी भी विकसनशील लोकतंत्र की पहचान होती है, पर लोकतांत्रिक मूल्यों में जिनकी आस्था नहीं होती, वे इस परिवर्तन को पचा ही नहीं पाते।

वस्तुतः, लोकतंत्र में असहमति का बड़ा महत्त्व है, पर मध्ययुगीन मानसिकता लिए दरबारी भाट और चारण यह पचा नहीं पाते कि उनके स्वामी पर दूसरे ख़ेमे वाले सवाल खड़े करें। भीतर का उन्हें सब पता होता है, लेकिन यह कमजोरी जब कोई बाहरवाला उजागर करने लगता है, तब तुरंत अपना किला ध्वस्त होता दिखने लगता है। ऐसे में भविष्य की अपनी रोटी भी असुरक्षित लगने लगती है और आक्रामक विषैले वाणों का संधान होने लगता है।

गहराई में उतरकर पड़ताल करने पर प्रतीत होता है कि हम सदा से बिखरे और राष्ट्रीय अस्मिताबोध से किञ्चित् विमुख लोग रहे हैं। मुद्दों पर असहमति होती तो ठीक, लेकिन हम तो पहले ही तयशुदा रहते हैं कि किनसे सहमत होना है और किनसे असहमत। रोटी का कर्ज तक तो ठीक था, अब तो जाति का कर्ज, संप्रदाय का कर्ज, समर्थित विचारधारा का कर्ज आदि के नाम पर सही को ग़लत और ग़लत को सही सिद्ध करने के लिए हम एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं।

स्थिति इतनी विकराल है कि जब किसी की हत्या होती है, तो पहले हम यह देखते हैं कि जिसकी हत्या हुई, उसका धर्म क्या था, हत्यारों का धर्म क्या और जहाँ हत्या हुई, वहाँ अपने समर्थन की सरकार है या विरोधी दल की। हद दर्जे के पतित लोग हैं हम। सदियों गुलाम यूँ ही नहीं रहे!

अगर कोरोना से इतनी मौतें हो रही हैं, तो भी देखना है कि किस नैरेटिव को सपोर्ट करना है कि हम जिसके समर्थन में हैं, उसका बचाव और जिसके विरोध में हैं, उस पर ठीकरा फोड़ा जाए।

एक तरह के मुद्दे पर ख़ूब शोर करना और उसी तरह के दूसरे मुद्दे पर चुप्पी साध लेना सोशल मीडिया के सूरमाओं के लिए तो फिर भी बड़ी बात नहीं, पर कोई राजनीतिक पार्टी इसे अफोर्ड नहीं कर सकती। शायद यही कारण है कि आज एक जनधारणा-सी बन गई है कि कांग्रेस अल्पसंख्यक तो बीजेपी हिन्दुत्व कार्ड खेलती है। यह कितना सही है और कितना ग़लत – इस पर तो विरोध हो सकता है और होना भी चाहिए; लेकिन अगर आप कहते हैं कि ऐसी कोई धारणा कहीं है ही नहीं, तो शायद आपको जमीन पर उतरकर देखना-सुनना नहीं आता।

जिनका हम समर्थन करते हैं, उनका समर्थन अगर आपने नहीं किया, तो आप हमारे दुश्मन हुए। आपके पूज्य नायक के विरोध में मैंने लिख दिया, तो आपकी कृपा मुझ तक आनी बन्द हो जाएगी। आप मुझ पर हमलावर नहीं हों, तो यही बहुत बड़ा लिहाज़ कर देंगे आप।

कुछ भी हो, थोपी गई राजनीति के दिन लद गए और संवेदनशील होकर जन-सरोकारों की राजनीति करने के दिन आए हैं। यह परिवर्तन अव्युत्क्रमानुपाती होता है (जिसे बदला नहीं जा सकता) और इसे हम-आप और राजनीतिक पार्टियाँ जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा है। राजनीति भले ही अब भी धनबल, बाहुबल जाति-समीकरण आदि की चेरी है, परंतु इतना तो है कि मुद्दे ज़मीन पर दिखने चाहिए, हवा में नहीं। स्मरण रहे कि जन सरोकारों को छोड़कर फाल्स नैरेटिव सेट करने में पूर्व में भी सरकारों ने मुँह की खाई है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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