ताज़ा खबर
 

वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2020 और भारत की दयनीय स्थिति

एक लोकतांत्रिक देश के नागरिकों को इस चिंताजनक मुद्दे पर समय रहते सोचने-समझने और बोलने की ज़रूरत है, नहीं तो राजनीति की आड़ में हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ़ सरकारी कामकाज और नीतियों के धरातल पर ना उतरने के कारण ही खो देंगे। कोरोना काल ने हमें आत्मनिर्भर बनना ज़रूर सिखाया लेकिन मूलभूत ज़रूरतों के लिए सरकार का उत्तरदायित्व ख़त्म नहीं हो सकता है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ शिक्षा रोज़गार और समानता के लिए सरकार पर आपको दबाव बनाना ही होगा।

Global hunger index-2020कोरोना काल में वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट ने एक और भयावह स्थिति पर सोचने को मजबूर कर दिया। (फोटो सोर्स- रतन लाल-इंडियन एक्सप्रेस)

डॉ. मनीष जैसल

अक्टूबर 2020 के महीने में वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट ने कोरोना काल में एक और भयावह स्थिति पर सोचने को मजबूर कर दिया है। 107 देशों की इस सूची में भारत 94वें पायदान पर है। इसे सीधे तौर पर समझें तो भारत की स्थिति रवांडा, नाइजीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, लीबिया, मोज़ाम्बिक और चाड जैसे कुल 13 देशों से तो बेहतर है, लेकिन नेपाल, पाकिस्तान, श्री लंका, म्यांमार, बांग्लादेश, इंडोनेशिया जैसे पड़ोसी मुल्कों की स्थिति हमसे ज्यादा अच्छी है। यानी ये देश विश्व भूख सूचकांक में भारत से कहीं ज़्यादा बेहतर स्थिति में हैं। 27.2 के स्कोर के साथ भारत की इस दयनीय स्थिति पर कितना चिंतन हो रहा है यह हम अपने आसपास के वातावरण से समझ सकते हैं।

दुनिया भर में कोविड 19 के संक्रमण ने एक ओर जहां देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति को सुधारने और उस पर नियंत्रण रखने की तरफ इशारा किया, वहीं वैश्विक भूख सूचकांक 2020 की रिपोर्ट ने भी चिंताएं और बढ़ा दी हैं। इसके लिए सीधे तौर पर देश की खराब कार्यान्वय प्रक्रिया, प्रभावी निगरानी की कमी, कुपोषण से निपटने का उदासीन दृष्टिकोण जिम्मेदार माने जा सकते हैं। विशेषज्ञों की भी यही राय है। मुख्य रूप से कुपोषण, बाल मृत्यु दर, पांच साल तक के कमजोर बच्चे और अवरुद्ध शारीरिक विकास आदि चार पैमाने पर बनने वाली इस रिपोर्ट में भुखमरी सूचकांक जारी किया जाता है।

रिपोर्ट बताती है कि भारत की 14 फ़ीसदी आबादी कुपोषण का शिकार होने के साथ स्टंटिंग रेट 37.4 के क़रीब हैं। उम्र की तुलना में कम लम्बाई वाले बच्चों का कुपोषित होना इसी आंकड़े से समझा जाता है। वहीं कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 3.7 प्रतिशत और चाइल्ड वेस्टिंग में 17.3 प्रतिशत का होना चिंता का एक अलग मुद्दा है।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2020 की रिपोर्ट में बांग्लादेश 75वें, म्यांमार 78वें, पाकिस्तान 88वें, नेपाल 73वें और श्रीलंका 64वें स्थान पर है। वहीं, चीन, बेलारूस, यूक्रेन, तुर्की, क्यूबा और कुवैत सहित 17 देश शीर्ष पायदान यानी बेहतर स्थिति में हैं। ऐसे में भारत सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचने और समझने की ज़रूरत है।

देश में स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर पौष्टिक खान-पान का हमेशा से अभाव रहा है। कोराना काल में जब देश भर में लॉकडाउन की स्थिति है, सभी प्राथमिक विद्यालय बंद है। बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सुधार के लिए दिया जाने वाला मिड डे मील भी महीनों से ठप है (6 से 14 वर्ष के करोड़ों बच्चों का पेट इसी योजना के तहत भरा जाता रहा हैं)। केंद्र सरकार की रिपोर्ट्स में भी अमूमन ऐसा देखने सुनने को मिलता रहा है। तब इससे भारत की स्थिति क्या और भी बिगड़ सकती है? इस पर भी समय रहते विचार करने की आवश्यकता है। चूंकि लगातार देश में पोषण से जुड़ी नीतियों और उनकी ज़मीनी हक़ीक़त को लेकर विरोधाभास दिखता रहा है, तब सैकड़ों टन अनाज को दीमक और बाढ़ में बह जाने वाले देश की इतनी दयनीय स्थिति का ज़िम्मेदार आख़िर कौन है, इसकी जवाबदेही भी हमें तय करनी ही होगी।

भारत इस सूचकांक में 27.2 के स्कोर के साथ गम्भीर श्रेणी में है, जबकि नेपाल और श्री लंका जैसे देश मध्यम स्थिति में हैं। जीएचआई के ताज़ा आँकड़ों पर ग़ौर करें तो यह ज़रूर समझा जा सकता हैं कि जिन देशों ने वर्ष 2030 तक भुखमरी को नियंत्रित करने का लक्ष्य बनाया था, उसमें भी इसका असर पड़ेगा। वहीं दुनियां भर के 690 मिलियन लोगों के कुपोषित होने के आंकड़े ने भी इ पर सोचने को विवश किया है कि कोविड-19 के इस संक्रमण काल में भुखमरी और ग़रीबी को कम या फिर नियंत्रित करना आसान नही होगा।

देश के तीन बड़े राज्यों (यूपी और एमपी) में से दो जगह उपचुनाव और बिहार में आम चुनाव हैं, ऐसे में तमाम उम्मीदवारों के घोषणापत्रों से लेकर उनकी चुनावी रैलियों में कितनी चिंताएं इस रिपोर्ट को लेकर सुनाई दे रही हैं यह भी हमें देखने की ज़रूरत है। ग़ौरतलब है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग पर सीधा असर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार डालते हैं। चार प्रमुख पैमानों के आधार पर इन्हीं तीनों राज्यों की बड़ी आबादी सबसे ज़्यादा असर डालती है। जानकार बताते हैं कि भारत में पैदा होने वाला हर पांचवा बच्चा उत्तर प्रदेश में हैं, ऐसे में राज्य में कुपोषण का स्तर अगर चिंताजनक है तो वह देश के सूचकांक में बड़ी वृद्धि करता है। इन प्रदेश सरकारों के सामंजस्य और साझा प्रयास के बिना भारत वैश्विक भुखमरी सूचकांक में अपनी स्थिति कैसे सुधारेगा यह प्रश्न प्रासंगिक है।

पिछले कई महीनों से चल रही बिहार और यूपी की चुनावी रैलियों में भिन्न नेताओं और उम्मीदवारों द्वारा दिए जा रहे भाषणों का पायलट सर्वे करते हुए मुझे किसी भी नेता के मुंह से इस रिपोर्ट पर कोई बातचीत नही सुनाई दी। हर साल यूपी और बिहार में बच्चों की हो रही असमय मौतों का आंकड़ा भी चौंकाने वाला है। बिहार में चमकी बुखार और गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से हुई बच्चों की मौतों को संवदेना की दृष्टि से समय रहते सोचा गया होता, तो संभवत: ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 की रिपोर्ट में सुधार हो सकता था।

सांस्कृतिक परम्पराओं और समृद्ध पौराणिक विरासत को सहेज कर रखने वाला देश एक ओर 2020 के अक्टूबर के महीने में नवरात्रि और दशहरा जैसे प्रमुख धार्मिक अनुस्थानों में व्यस्त है, वहीं दूसरी तरह भुखमरी को लेकर देश की दयनीय स्थिति चिंता जगाती है। एक तबक़ा धर्म के नाम पर स्वेच्छा से उपवास रखता है तो दूसरी तरफ देश के नागरिक भुखमरी के हालत में मरने को विवश हैं। भूख के सवाल पर सरकारी अलाप भले ही नागरिकों को कर्ण प्रिय लगते हों, लेकिन आज़ाद भारत में आज तक भूख से निपटने के कारगर प्रयास नहीं हो सके हैं।

देश के सबसे बड़े आबादी वाले तीन राज्यों की प्रदेश सरकारों और केंद्र सरकारों ने स्वास्थ्य, खाद्य, शिक्षा पर कितने प्रयास आज तक किए हैं, इस पर चिंतन करते हुए आने वाले चुनाव में अपनी उम्मीदवारी ज़ाहिर करनी चाहिए। बिहार चुनाव से ही समझें तो सूबे के 15 साल के एनडीए शासन को लगातार कोस रही महागठबंधन वाली पार्टी का इस पर कितना स्पष्ट मत है, देश के सभी नागरिकों को समझना चाहिए।

भूख के सवाल पर चिंता ज़रूरी है, लेकिन इस चिंता को अगर मीडिया घरानों ने अपने चैनलों में जगह ही नहीं दी तो लोकतंत्र के चौथे खंभे होने का धर्म वो कैसे निभा रहे हैं? दिलीप मंडल के मीडिया को चौथे खंभे प्राइवेट लिमिटेड की संज्ञा की पुष्टि भी मौजूदा समय में देखी समझी जा सकती है। सारे मीडिया घराने सरकार की पीआर एजेंसी की तरह काम करते दिख रहे हैं। अक्टूबर महीने के मध्य में आई ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट पर हुई मीडिया रिपोर्टिंग का एक आंकड़ा अगर आपके सामने रखा जाए तो यह समझा जा सकता हैं कि भूख के सवाल से ज़्यादा ज़रूरी सुशांत सिंह राजपूत, कंगना रनौत और इन दिनों मीडिया में चल रहे चुनावी संग्राम की रिपोर्टिंग बना हुआ है।

एक लोकतांत्रिक देश के नागरिकों को इस चिंताजनक मुद्दे पर समय रहते सोचने-समझने और बोलने की ज़रूरत है, नहीं तो राजनीति की आड़ में हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ़ सरकारी कामकाज और नीतियों के धरातल पर ना उतरने के कारण ही खो देंगे। कोरोना काल ने हमें आत्मनिर्भर बनना ज़रूर सिखाया लेकिन मूलभूत ज़रूरतों के लिए सरकार का उत्तरदायित्व ख़त्म नहीं हो सकता है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ शिक्षा रोज़गार और समानता के लिए सरकार पर आपको दबाव बनाना ही होगा। चुनाव आते जाते रहेंगे, देश के नागरिकों को मुद्दों की संवेदनशीलता को समझना आना अब ज़रूरी है, जिससे एक नए राष्ट्र का निर्माण हो सके। जिसमें हम पड़ोसी मुल्कों से बेहतर हालत में हो, ना कि अभी जैसे बदतर स्थिति में….।

(लेखक मंदसौर विश्वविद्यालय, मंदसौर,मध्य प्रदेश के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष और सहायक प्रोफ़ेसर हैं।)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 टुकड़ों में बंटी भारतीय मीडिया से कैसे छिनी सवाल पूछने की आजादी?
2 बिहार चुनाव से जुड़े ये आंकड़े क्या इशारा करते हैं?
3 मुसलमानों के लिए ये आत्मनिरीक्षण का वक्त
यह पढ़ा क्या?
X