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“महिला आयोग के सदस्यों की अर्हता पर सवाल उठने लाज़मी! दिक्कत मोबाइल से है या गलत मानसिकता से?”

कुमारी ने जो सवाल लड़कियों के मोबाइल को लेकर उठाए हैं, उसमें उन्हें थोड़ा और अध्ययन करते हुए सोचना चाहिए था। बलात्कार के साथ साथ वर्तमान समय में उन्हीं लड़कियों की शिक्षा पर कितना प्रभाव पड़ रहा है? देश में ऑनलाइन शिक्षा का प्रसार हो रहा है। छात्रों का पूरा करियर अब इसी में सिमट गया है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः unsplash)

डॉ.मनीष जैसल

उत्तर प्रदेश के महिला आयोग की सदस्या मीना कुमारी का बलात्कार के मुद्दे पर दिया गया एक बयान चर्चा के केंद्र में है। किसी भी स्वस्थ समाज में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उस समाज के सकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर होने जैसा माना जाता है। लेकिन सफल और प्रतिनिधित्व के बल पर डिसीजन मेकिंग के पदों तक पहुंचने वाली इन महिलाओं का ख़ुद महिलाओं के विरोध में खड़े हो जाना उस प्रतिनिधित्व का ही दोहन करने जैसा है। उन सभी को पर्दे से पिकेडली तक पहुंचने वाली मुस्लिम महिला जरीना भट्टी की आत्मकथा पढ़ लेनी चाहिए।

देश के अलग-अलग राज्यों में महिला आयोग हैं, जिनका काम महिलाओं के मुद्दों पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना और सरकार का उन मुद्दों पर ध्यान दिलाना है। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि देश में महिलाओं के साथ शोषण और बलात्कार की घटनाएं आए दिन बढ़ रही हैं, जिनसे निपटने में सरकारों के कई मॉडल फेल हुए हैं। कई राज्यों में बलात्कार की घटनाएं पुलिसिया रिकॉर्ड में दर्ज न होने के चलते सामने ही नहीं आ पाती।

मीडिया शोधार्थी और शिक्षक होने के नाते हाल ही में बलात्कार के मुद्दे पर मीना कुमारी के दिए गए बयान को लेकर चिंताएं होने लगीं। महिला आयोग की सदस्या मीना कुमारी ने किन पूर्वाग्रहों से अभिभूत होकर ये बयान दिया कि लड़कियों को मोबाइल न दें, इससे वे लड़कों से घंटों बात करती हैं, फिर भाग जाती हैं। उनका दूसरा बयान और भी चिंताजनक हैं कि मज़दूरी करने वाले परिवारों की लड़कियों के पास 20 हजार का मोबाइल कहां से आता है? सीधे तौर पर उन्होंने परिवार से मॉरल पुलिसिंग करते रहने की गुज़ारिश की। लेकिन ऐसा करते हुए वह महिलाओं के मुख्य मुद्दे से फिर भी भटक गयईं कि बलात्कार कैसे रुकेंगे?

क्या लड़कियों को मोबाइल न देने भर से मोबाइल रुक जायेंगे या मोबाइल होने से ही लड़कियां लड़कों के साथ भागती हैं? क्या महिला आयोग को लड़कियों का ख़ुद के फ़ैसले लेना ग़लत लगता है? क्या यह अधिकारिक खाप पंचायत की तरह का बयान नही लगता? पिछले महीनों में वॉट्सऐप पर राजस्थान में एक संदेश वायरल हो रहा था। इस मैसेज में कहा गया है कि कुंवारी लड़कियों के पास मोबाइल फोन पाए जाने पर खाप पंचायत 51,000 रुपये के दंड का ऐलान करते हैं। शादीशुदा महिलाओं को बटन वाले मोबाइल रखने की इजाजत दी गई है, लेकिन उनके पास टच फोन पाया गया तो 21,000 रुपये का जुर्माना लगेगा।

बिहार की एक पंचायत ने फरमान जारी किया है कि गांव की अकेली लड़की अब मोबाइल पर बात नहीं कर सकती। अगर बात करनी है तो वह बातचीत अभिभावकों की उपस्थिति में होगी। महिला आयोग की ससुराल के पास हुई एक ऐसी घटना का ज़िक्र उन्होंने किया जिसमें अंतरजातीय विवाह के चलते संघर्ष चल रहा है। पितृसत्ता और सामंती सोच के चंगुल में फंसी मीना कुमारी का बयान यह बताता हैं कि स्त्रियां चाहे जितनी भी तरक़्क़ी कर लें, पर उन्हें पुरुषों के अधीन ही रहना है। लड़कियां बिगड़ी तो मां ज़िम्मेदार, लड़के बिगड़े तो भी मां ज़िम्मेदार, पति छोड़े तो भी पत्नी ज़िम्मेदार, लड़की अपनी मर्ज़ी की कूच करें तो समाज की नज़र में भी वही ज़िम्मेदार।

तो क्या महिला आयोग अंतरजातीय विवाह के ख़िलाफ़ भी है? ‘लड़कियां बिगड़ी तो ज़िम्मेदारी मा की होगी’ यह कह कर क्या देश की उन सभी लड़कियों की शादी को महिला आयोग नाजायज़ या ग़लत कृत्य मानते हुए अस्वीकार्य कर रहा है? दरअसल, महिला आयोग में सदस्यों की नियुक्ति या चयन की अर्हता पर सवाल उठने लाज़मी हैं। इसकी ज़रूरत हमें दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल ने यूपी महिला आयोग की सदस्य के बयान को नकारने वाले बयान से मालूम पड़ती है। मालीवाल ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री से भी अपील की है कि देश के सभी महिला आयोग को सेंसेटाइज करवाइए।

दिल्ली महिला आयोग की कार्यशैली को देश के अन्य महिला आयोग को देखना चाहिए हम सिखाते हैं इन्हें। मालीवाल की इस टिप्पणी के बाद तो ज़ाहिर है कि महिला आयोग में सिर्फ़ महिला को ही चयन करना हैं भर से काम नहीं चलेगा। महिला मुद्दों पर संवेदनशील और सेलेक्टिव अप्रोच न रखने वाले किसी भी व्यक्ति को इस आयोग में शामिल करना चाहिए। ऐसा करने से मीना कुमारी जैसे लोगों के बयान नही आयेंगे।

देश में महिलाओं के साथ हो रही हिंसा का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है। कोविड के दौरान यह आंकड़ा और भी बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन हिंसा और बलात्कार जैसे कृत्य से निपट पाने के लिए सिर्फ़ किसी सरकार का मॉडल और नियम क़ानून भर नहीं देश के प्रत्येक नागरिक की मानसिकता का बदलना भी बहुत ज़रूरी हैं और जब ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोषा करने वाले लोगों के बीच ऐसे बयान जाते हैं तो उनका मनोबल और टूटता है।

कुमारी ने जो सवाल लड़कियों के मोबाइल को लेकर उठाए हैं, उसमें उन्हें थोड़ा और अध्ययन करते हुए सोचना चाहिए था। बलात्कार के साथ साथ वर्तमान समय में उन्हीं लड़कियों की शिक्षा पर कितना प्रभाव पड़ रहा है? देश में ऑनलाइन शिक्षा का प्रसार हो रहा है। छात्रों का पूरा करियर अब इसी में सिमट गया है। ऐसे में मज़दूरी, किसानी और अन्य लोग जिनका गुज़र-बसर सिर्फ़ रोज़ाना की कमाई से चल रहा था उन परिवारों की लड़कियों के साथ क्या घट रहा होगा? क्या सभी के पास मोबाइल फ़ोन हैं, जो देश के संविधान से मिले ‘हर व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार’ को पूरा कर रहा है।

वर्तमान समय में शिक्षा प्राप्त करने का सबसे ज़रूरी माध्यम मोबाइल और इंटरनेट हो चुके हैं। ऐसे में आपने अपनी ससुराल में हुई एक घटना का आधार लेकर पूरे देश की जनता के सामने एक ऐसा मॉडल रख दिया जिस पर वो जनता हो सकता है अमल भी करने लगे। लेकिन इससे बलात्कार जैसी बीमारी से तो हम लड़ ही रहे थे, लेकिन दूसरी तरफ़ शिक्षा से वंचित होने वाले परिवार की बढ़ती संख्या से भी हम जूझने लगेंगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिन मां से आपने मोबाइल न देने और अगर देती हैं तो जांच करते रहने की अपील की, वे सभी आपकी तरह भी नहीं सोचतीं। कई ऐसी मां हैं, जो आपके इस बयान से मोबाइल पर अपनी पढ़ाई कर रही लड़कियों से उनका शिक्षा का वर्तमान माध्यम भी छीन लेंगी।

महिला आयोग को इस पर एक बार फिर से विचार कर लेना चाहिए कि दिक़्क़त मोबाइल से हैं या ग़लत मानसिकता से। मेरी अपनी राय में महिला आयोग की सदस्यता के लिए सेंसिबल होना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, जिसमें मीना कुमारी जैसी सदस्य फेल हुईं। जांच हो तो ऐसे कई और असंवेदशील इसी महिला आयोग से निकल कर आयेंगे जो खाप जैसी सोच को रखकर नियमों और अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं।

लेखक म.प्र के मंदसौर विवि में पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग प्रमुख और सहायक प्रोफ़ेसर हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।

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