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अर्थव्यवस्था से लेकर जैव विविधता तक: दूध ही नहीं, गाय पालन के हैं ये भी फायदे

डॉ. वीर स‍िंंह (पर्यावरण व‍िशेषज्ञ और जीबी पंत यून‍िवर्स‍िटी ऑफ एग्रीकल्‍चर एंड टेक्‍नोलॉजी के पूर्व प्रोफेसर) बता रहे हैं क‍ि गोधन व पशुधन की भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था और आम जनजीवन में क्‍या अहम‍ियत है।)

cow dung chip Chip made of cow dungतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

गाय, निस्संदेह, वैदिक युग से भारतीय सभ्यता के केंद्रीय प्रतीकों में से एक रही है। “पवित्र गाय” एक कहावत है जो दुनिया भर में प्रचलित है, और जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि दुनियाभर में गाय को पवित्र और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक गाय कामधेनु की महिमा उसके अत्याधिक मात्रा में अमृत जैसा दूध देने के लिए गाई जाती है। लगभग दस हजार वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई कृषि ने गाय की महत्ता को और अधिक बढ़ा दिया, न केवल उसके पौष्टिक दूध के कारण, बल्कि उसके बैलों से मिलने वाली शक्ति और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को बनाए रखने के कारण भी। दूसरे शब्दों में, हजारों वर्षों से हमारी खाद्य सुरक्षा बैलों के कन्धों पर टिकी रही है। गाय का यह ऐसा उपादान है, जिसका शायद ही कोई सानी हो।

परन्तु विडम्बना यह है कि हमारे आज के राजनीतिक वातावरण में गाय दोराहे पर खड़ी है, जहाँ कुछ लोग उसे संरक्षण के योग्य मानते हैं, और कुछ भक्षण की वस्तु । देहरादून में नवधान्य संस्था के कार्यालय में लटके एक पोस्टर में गौपशुओं को चित्रित करते हुए लिखा गया कि अगर भारत के सभी गौपशुओं को एक कतार में खड़ा कर दिया जाए, तो कतार चाँद तक पहुँच जाएगी। गौपशुओं की २० करोड़ से भी अधिक संख्या के साथ भारत दुनिया में प्रथम स्थान पर है और विश्व की गौपशुओं की कुल आबादी का 33.39 प्रतिशत उसके पास है। 22.64% के साथ ब्राज़ील और 10.03% के साथ चीन दुनिया के गौपशुओं की आबादी की दृष्टि से क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। यह जानकर कि हम दुनिया में दूध के सबसे बड़े उत्पादक हैं, हर भारतीय को गर्व की अनुभूति होती है।

वर्ष 2016-17 में कुल दूध उत्पादन लगभग 155 मिलियन टन था, जो 2021-22 में बढ़कर 210 मिलियन टन होने की संभावना है। यह भारत की गायों की आबादी के कारण ही है कि हम पिछले 10 वर्षों से दुग्ध उत्पादन में 4% की वार्षिक वृद्धि कर रहे हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष को अगले कुछ वर्षों के दौरान 7.8% की वार्षिक वृद्धि की उम्मीद है। इस प्रकार, श्वेत क्रांति, हरित क्रांति से अधिक टिकाऊ रही है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध उत्पादन भी 1991-92 में मात्र 178 ग्राम से बढ़कर 2015-16 में 337 ग्राम हो गया था और कुछ वर्षों में यह बढ़कर ५०० ग्राम प्रतिदिन हो जाएगा। इस प्रकार, भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए पशुधन का, विशेष रूप से गौवंश का, बहुत बड़ा योगदान है, जो हमें गर्व से भर देता है। गौवंश का योगदान केवल उनके दूध उत्पादन के संदर्भ में गिना जाता है। लेकिन ऊर्जा पशुओं के रूप में वे और भी अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सोचो, हल खींचने, पाटा लगाने, बुआई करने, गन्ना पेरने, धान के लिए कीचड-भरा खेत तैयार करने, अनाज की गहाई करने, खेत से घर तक उत्पाद ढोने, बाज़ार तक उत्पाद ढोने, मील तक गन्ना ले जाने आदि खेती-किसानी से जुड़े कामों में गौ-वत्सों –यानी बैलों –का कितना योगदान है! देश की खाद्य सुरक्षा में उनका कितना योगदान है! मैंने भारत के पहले कृषि विश्वविद्यालय (पंतनगर विश्वविद्यालय) में अपनी डॉक्टरेट उपाधि के लिए पशु शक्ति पर अनुसंधान किया था, और बाद में काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट में मेरा शोधकार्य भी ऊर्जा पशुओं पर केंद्रित था। हमारे पशु वैज्ञानिक सामान्यतया कृषि में कार्यशील पशुओं (ऊर्जा पशुओं अथवा ड्राफ्ट एनिमल्स) पर शोध कार्य को कोई महत्त्व नहीं देते। कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि अनुसन्धान संस्थानों के वैज्ञानिकों की प्राथमिकता केवल दुधारू पशु हैं। कार्यकारी पशु उनके लिए पिछड़ेपन की निशानी हैं।

बंगलौर स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान के पूर्व निदेशक रामास्वामी, जिन्होंने ड्राफ्ट पशुओं पर उदाहरणीय शोध कार्य किया है और इस क्षेत्र में शोध कार्यों के अग्रदूतों में से एक हैं, कहते हैं: ‘प्रोफेसर ड्राफ्ट जानवरों पर काम नहीं करना चाहते, क्यों कि ऐसा करने से उन्हें पदोन्नति नहीं मिलेगी।” भारत में लगभग सभी कृषि कार्यों में मवेशियों का उपयोग किया जाता है, जो उन्हें भारत में सबसे बड़ा (लेकिन अनौपचारिक) शक्ति स्रोत बनाता है। जब मैं 1980 और उससे पहले 1990 के दशक में भारतीय कृषि में पशु शक्ति पर काम कर रहा था, तब कृषि में मवेशियों के योगदान के आंकड़े चकाचौंध करने वाले थे। भारतीय कृषि में कार्यकारी पशुओं का योगदान 66%, मानव शक्ति का 23% और ट्रेक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर आदि मशीनों का योगदान मात्र 11% था। ये आंकड़े आज भिन्न हो सकते हैं।

वास्तव में, देश का कोई भी संगठन पशु शक्ति से संबंधित आंकड़ों को रिकॉर्ड में नहीं रखता है। दिसंबर 2002 में पंतनगर विश्वविद्यालय में आयोजित पशुधन पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में, योजना आयोग के तत्कालीन सदस्य श्री सोम पाल ने कहा था, ‘योजना आयोग में पशु शक्ति के लिए एक अलग प्रकोष्ठ होगा।’ लेकिन योजना आयोग ने कभी इसका पालन नहीं किया। (अब, क्या हमारा नीति आयोग इसके बारे में सोचेगा? शायद नहीं)। देश की हरित क्रांति बेल्ट में आम तौर पर बैलों का स्थान ट्रैक्टरों और अन्य मशीनों ने ले लिया है। लेकिन, भारत के अधिकांश क्षेत्र अभी भी अधिकतर मवेशियों पर निर्भर करते हैं। बैल गाड़ियां अभी भी अधिकांश ग्रामीण भारत में परिवहन की जीवन-रेखा के रूप में काम करती हैं। न केवल गौपशुओं की आबादी और दूध उत्पादन में भारत सर्वोच्च है, बल्कि मवेशियों की नस्लों की विविधता में भी है।

भारत में गाय की कोई 30 नस्लें अच्छी तरह से वर्णित हैं। गैर-वर्णित नस्लों की संख्या अभी भी कहीं बहुत अधिक है। प्रत्येक नस्ल में विशिष्ट गुण होते हैं, जैसे कि दूध देने की क्षमता, खेती कार्यों की क्षमता, चारे की उत्पाद में रूपांतरण दक्षता, भौगोलिक क्षेत्र के अनुरूप कृषि क्रियाओं की नैसर्गिक दक्षता, आदि। कुछ भारतीय नस्लें, जैसे साहीवाल, गिर, लाल सिंधी, थारपारकर और राठी दुधारू नस्लों में से हैं। हरियाणा, अमृतमहल, कंकरेज, ओंगोल, लाल कंधारी, मालवी, निमाड़ी, नगोरी, कंगयम, हल्लीकर, डांगी, खलारी, बारगुरु, केनकाठा, सिरि, बाचौर, पोंवार, खेरीगढ़, मेवाती, आदि बैलों की जानी मानी नस्लें हैं। हरियाणा राज्य की “हरियाणा बैल” नस्ल दुनिया में सबसे मजबूत कद-काठी वाली नस्लों में से एक मानी जाती है। केरल में पाई जाने वाली वेंचुर नस्ल दुनिया की सबसे छोटी मवेशी नस्ल है। इसे एक मेज पर खड़ा करके दुहा जा सकता है, और वेंचुर गाय बहुत अच्छे और मूल्यवान बैल पैदा करती है।

भारत के कुछ क्षेत्रों में, विशेषकर हिमालय के पहाड़ों और अन्य पर्वत श्रृंखलाओं में, मवेशियों के बिना कृषि अकल्पनीय है। पूरी दुनिया में लगभग सभी पर्वतीय समुदाय पशुधन पर निर्भर हैं। पशु शक्ति से संचालित कृषि क्रियाओं (जुताई, समतलीकरण, बुआई आदि) और खाद्य उत्पादकता में सीधा संबंध है। इस प्रकार, हम खाद्य उत्पादन और फलस्वरूप राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा में पशु शक्ति का मोल समझ सकते हैं। गाय- बैल हमारी कृषि प्रणालियों की कृषि-पारिस्थितिक अखंडता, कृषि-जैव विविधता, कृषि विविधीकरण, पोषक चक्रण और मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पशु शक्ति पर आधारित खेती में पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों की भी आवश्यकता नहीं होती, जैसा कि ट्रेक्टर और अन्य मशीनों पर निर्भर खेती में होती है। इस प्रकार, पशुधन-आधारित खेती कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करती है। यह भी सच है कि मवेशी मीथेन के रूप में कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि करते हैं। लेकिन कृषि-जैव विविधता पैदा करने, प्रकश संश्लेषण में पौधों के योगदान को स्थापित करने और मिट्टी को जैविक कार्बन से समृद्ध करने में पशुओं की भूमिका इतनी प्रबल है कि उनके द्वारा कार्बन का अवशोषण उनके मीथेन उत्सर्जन से कहीं बहुत अधिक होता है।

सार रूप में कहें तो, कृषि के लिए गौवत्स बैलों की शक्ति पर निर्भरता पूरी तरह से कार्बन-नकारात्मक (कार्बन नेगेटिव) है, जो कि जलवायु परिवर्तन निराकरण के लिए उनका एक सकारात्मक योगदान है। दूसरी ओर, जीवाश्म ईंधन आधारित ट्रैक्टर और अन्य कृषि मशीनरी पर खेती की निर्भरता जलवायु संकट को गहराती है। भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा बड़े पैमाने पर छोटे और सीमांत किसानों (जो कुल भूमि जोत के ८३% हिस्से पर खेती करते हैं) के कन्धों पर टिकी है। लघु और सीमान्त किसान अधिकांशतः पशुधन के सहारे खेती करते हैं, जब कि बड़ी जोत वाले किसान ही प्रायः कृषि मशीनरी पर निर्भर हैं।

आंकड़े बोलते हैं कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करने में कृषि का योगदान ३२% है, यानी लगभग एक-तिहाई। दुनिया की कृषि, वास्तव में, एक जलवायु-अपराधी है। लेकिन यह उद्योगों पर निर्भर, रासानिक उर्वरकों, जीवनाशी रसायनो और जीवाश्म ईंधन-आधारित हरित क्रांति प्रकार की कृषि है जिसे जलवायु परिवर्तन का दोषी माना जाना चाहिए। छोटे और सीमांत किसान बड़े पैमाने पर वनों के साथ तालमेल बनाकर पशुधन मिश्रित खेती करते हैं। इस प्रकार, छोटे किसानों की कृषि में जलवायु परिवर्तन के तनाव को कम करने की संभावना छिपी है। अब कुछ गोमांस के बारे में। गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों ने बहुत विलाप किया है। उन्हें तथ्यों और आंकड़ों पर विश्वास नहीं, न सत्य से कोई सरोकार है, और न ही उन्हें राष्ट्रीय भावनाओं से कोई मोह। जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या की गंभीरता से भी उन्हें कोई मतलब नहीं।

उनके कुतर्क केवल राजनीतिक रंग में रंगे होते हैं। मांस उद्योग सबसे क्रूर जलवायु खलनायकों में से एक है जो वायुमंडल में बहुत बड़े कार्बन पदचिन्ह छोड़ रहा है। औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से जब दुनिया ने जीवाश्म ईंधन को जलाना शुरू किया, हमने दुनिया को 0.8 डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर दिया है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अतीत और पूर्वानुमानित कार्बन उत्सर्जन के कारण दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस गर्म हो जाएगी।

दिसंबर 2016 की पेरिस जलवायु वार्ता में विश्वव्यापी तापक्रम बढ़ोत्तरी का लक्ष्य 2 डिग्री सेल्सियस तय किया गया। 2 डिग्री सेल्सियस का आंकड़ा देखने में छोटा लगता है, लेकिन इसका जीवन और जीवित ग्रह पर अभूतपूर्व नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। खान-पान की आदतें यूँ तो एक व्यक्तिगत मामला है जिस पर प्रश्न उठाना अटपटा-सा लगता है, लेकिन हमारी जलवायु पर सबसे बड़ी और सबसे विस्फोटक मार मांसाहार की प्रवृत्ति से पड़ रही है। मांस आहार, विशेष रूप से गोमांस से बना आहार, पर्यावरण पर सबसे बुरा प्रभाव डालता है।

सीएनएन की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों के कारण सबसे बड़ा कार्बन पदचिह्न गोमांस के कारण होता है, जो बीन्स, मटर और सोयाबीन (शाकाहारी आहार) से बने आहार की तुलना में लगभग 60 गुना बड़ा है। मानव प्रजाति द्वारा मांस भक्षण धरती और धरती के जीवन के लिए एक अभिशाप है, ऐसा दुनिया के अधिकांश़ पारिस्थितिकी वैज्ञानिक मानते हैं, और हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका की नव-नियुक्त उपराष्ट्रपति सुश्री कमला हैरिस ने भी कहा है कि मांस धरती को नष्ट-भृष्ट कर रहा है। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि देश में गाय को लेकर यदा-कदा होने वाली बहस निरर्थक है।

गाय का मोल किसी भी तरह की बहस से परे है। गौ संरक्षण पूर्णरूपेण राष्ट्रहित में है, और यह पर्यावरणीय, पारिस्थितिक एवं सामाजिक-आर्थिंक न्याय के अनुरूप है। गाय को भारत के सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक विकास का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाना चाहिए। गौ-शक्ति से संपन्न भारत वास्तव में एक खुशहाल और सम्पोषित भारत होगा।

(लेख में व्‍यक्‍त व‍िचार लेखक के न‍िजी हैं, जनसत्‍ता.कॉम के नहीं।)

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