ताज़ा खबर
 

SC के पूर्व जज ने योग दिवस को बताया नौटंकी, कहा- जिनके पास रोटी नहीं, उनसे यह केक खाने को कहने जैसा

भारत में लोग योग नहीं बल्कि भोजन, नौकरी, आश्रय, उचित स्वास्थ्य देखभाल, अच्छी शिक्षा और अन्य आवश्यकताएं चाहते हैं। किसी भूखे या बेरोजगार पुरुष/महिला को योग करने के लिए कहना एक क्रूर चाल और भटकाव है।

नई दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर लाल किला परिसर में विभिन्न आसन करते लोग। (फोटोः पीटीआई)

आज 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। मैं इसे एक नौटंकी और नाटक मानता हूं। जब 50% भारतीय बच्चे कुपोषित हैं (ग्लोबल हंगर इंडेक्स देखें), हमारी 50% महिलाएं एनीमिक (Anaemic) हैं और रिकॉर्ड बेरोजगारी है।

खाद्य पदार्थों, ईंधन, गैस सिलेंडर आदि की आसमान छूती कीमतें, किसानों का संकट (लगभग 400,000 भारतीय किसानों ने पिछले 25 वर्षों में आत्महत्या की है) और जनता के लिए उचित स्वास्थ्य सेवा लगभग नगण्य है। इस परिस्थिति में लोगों को योग करने के लिए कहना उतना ही बेतुका और बेहूदा है, जितना कि क्वीन मैरी एंटोनेट (Queen Marie Antoinette) का उन लोगों, जिनके पास रोटी नहीं थी, से कहना कि वह केक खाएंI

भारत में लोग योग नहीं बल्कि भोजन, नौकरी, आश्रय, उचित स्वास्थ्य देखभाल, अच्छी शिक्षा और अन्य आवश्यकताएं चाहते हैं। किसी भूखे या बेरोजगार पुरुष/महिला को योग करने के लिए कहना एक क्रूर चाल और भटकाव है। ऐसा कहा जाता है कि योग अच्छा स्वास्थ्य और शांत मन देता है। लेकिन क्या यह किसी गरीब, भूखे और बेरोजगार पुरुष/महिला को यह देगा? क्या यह हमारे कुपोषित लोगों और एनीमिक महिलाओं को देगा?

बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, दिवाली, होली, फादर्स डे, मदर्स डे, बाल दिवस आदि के खिलाफ हूं? सिर्फ योग दिवस के खिलाफ ही क्यों? मैं योग या ऊपर वर्णित अन्य चीज़ों के खिलाफ नहीं हूं। मैं जिस चीज के खिलाफ हूं, वह राजनीतिक एजेंडे के लिए उनका अपहरण करना। रोमन सम्राट कहा करते थे, “अगर आप लोगों को रोटी नहीं दे सकते, तो उन्हें सर्कस दें।”

आज के भारतीय सम्राटों (जिनकी बेशर्मी से सहायता हमारी अधिकांश बिकी हुई और चाटुकार गोदी मीडिया करती है) कहते हैं, “अगर आप गरीबी, बेरोजगारी, भूख, मूल्य वृद्धि, स्वास्थ्य देखभाल, किसान संकट, आदि की भारी समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं, तो भारतीय लोगों का ध्यान भटकाने के लिए स्टंट और नौटंकी, जैसे ‘विकास’, योग दिवस, राम मंदिर, स्वच्छता अभियान, सीएए, अनुच्छेद 370 का निरसन आदि करें।”

markandey katju लेखक सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रह चुके हैं और यहां व्यक्ति विचार उनके निजी हैं।

Next Stories
1 ‘अपने’ देश में ‘बेगाना’ होने का दर्द
2 जीत-हार की खुशी और कसक, दोनों को पचा पाना मुश्किल
3 राजा-प्रजा में विकसित समझदारी से टल जाते हैं बड़े से बड़े संकट
ये पढ़ा क्या?
X