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फादर्स डे: पुरानी छवि और दायरे से बाहर निकलते आधुनिक भारतीय पिता

बदलते परिवेश में संतानों के प्रति पिताओं की परंपरावादी सोच के मायने बदल रहे हैं। समाज में प्रगतिशील सोच रखने वाले पिताओं की संख्या बढ़ रही है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

भारतीय समाज में मध्यमवर्गीय परिवारों से लेकर अभिजात्य वर्गों तक परम्परागत रूप से पितृसत्तात्मक व्यवस्था रही है, जहां पिता अपना प्रभुत्व रखते हुए परिवार के सदस्यों का संरक्षण करते आए हैं। इस प्रचलित सामाजिक-सांस्कृतिक पितृसत्तात्मकता में अन्य रिश्तों से इतर पिता और उनकी संतानों का एक अनोखा रिश्ता रहा है। हमारे समाज में संतानें शुरू से अपने पिता में आर्थिक स्वावलम्बन, आत्मसम्मान एवं आत्मनिर्णय जैसे व्यक्तित्व की अपरिहार्यता देखती आई हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से जहां भारत में प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में नवाचार की प्रवृति बढ़ी है, वहीं सामाजिक स्तर पर भी बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

इस बदलते परिवेश में संतानों के प्रति पिताओं की परंपरावादी सोच के मायने बदल रहे हैं। समाज में प्रगतिशील सोच रखने वाले पिताओं की संख्या बढ़ रही है। अब बड़े पैमाने पर पिता की सोच में क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। एक ओर जहां मध्यवर्गीय परिवारों में पिताओं की बेटियों के प्रति सोच में सकारात्मक रवैया दिखने लगा है, वहीं पुत्रों के भविष्य को लेकर भी बेहद उत्साहवर्धक प्रवृत्ति देखने को मिलने लगी है। कहीं न कहीं आधुनिक बनते भारतीय परिवारों के युवा पिता अपनी पीढ़ियों से चली आ रही पितावादी परम्पराओं को तोड़ रहे हैं।

आज के भारतीय पिता अपने बेटे और बेटियों दोनों को समान रूप से स्वावलंबी, जुझारू और साहसी बनाने की दिशा में प्रयासरत रहते देखे जा सकते हैं। शिक्षा, मीडिया, एकल परिवारों के बढ़ते चलन और भारतीय पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्थाओं में माता-पिता की निरंतर बदल रही भूमिकाओं के चलते भारत में भी फादर्स डे मनाने की विदेशी परम्परा चल पड़ी है। वैसे भी अपने पिता के प्रति सम्मान और श्रृद्धा का भाव भारत में कोई नई प्रवृत्ति या सोच नहीं है, बस फादर्स डे के माध्यम से उसे प्रदर्शित करने का ढंग जरूर बदल रहा है। इसमें कुछ बुराई नहीं है।

आजकल बच्चे अपने पिताओं के साथ अधिक मित्रवत हो गए हैं और अपनी हर समस्या या करियर को लेकर होने वाली बातों को अपने पिता के साथ सहजता से साझा करते हैं। ये बातें यह बतलाती हैं कि भारतीय पिता की संवेदनाओं और परवरिश के तरीकों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। लगभग सदैव मौन और कम बोलने वाले सिर्फ ड्राइंग रुम में अखबारों तक सीमित बैठे रौबदार कड़क चेहरे वाले पिता अब घरों में नहीं पाए जाते, बल्कि अब पत्नी के साथ किचन में हाथ बंटाने से लेकर घर और बाहर के सभी कामों में अपने उत्तरदायित्व को बखूबी निभाते और अपने बच्चों के साथ मौज मस्ती करते पिता प्रायः हर घर में मिलने लगे हैं।

पिताओं के इस बदलते स्वरुप और शायद समाज में बेटियों के प्रति उदारवादी और सकारात्मक रवैया लाने के लिए चलाई जा रही सरकारी नीतियों व गैरसरकारी नारीवादी प्रयासों के कारण भारतीय समाज में बरसों से चली आ रही लैंगिक असमानता समाप्त हो रही है। परन्तु कहीं ऐसा लगता है कि यह बदलाव एक सही दिशा में नहीं जा पा रहा है। बरसों पुरानी बेटे-बेटियों की खाई को मिटाने के चलते कहीं हम बेटों के प्रति वही दोयम व्यवहार न अपनाने लगें जो कभी बेटियों के साथ किया जा रहा था। उद्देश्य असमानता को हटाना होना चाहिए, दोनों का अपना अपना अस्तित्व है और दोनों ही समान रूप से परिवार व समाज के लिए उत्तरदायित्व का अधिकार रखते हैं। आज जिस तरह से स्त्रियों और बेटियों को समाज में स्थान मिल रहा है, वो उनका अधिकार है, जो कहीं दबा दिया गया था। इसके पीछे कहीं न कहीं भारत की पितृसत्तात्मक व्यवस्था उत्तरदायी थी। अब समाज में यह पृथा प्रतिस्थापित भले ही न हो रही हो, परन्तु सोच के दृष्टिकोण से परिवर्तित अवश्य हो रही है। फादर्स डे मनाने जैसी मानसिकता का समाज में प्रवेश इसकी पुष्टि करता है। भारत में फादर्स डे का मनाया जाना यह दर्शाता है कि भारतीय समाज में पिता की भूमिका अब बदल रही है।

(लेखिका ब्लॉगर और कवयित्री हैं।)

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