ताज़ा खबर
 

प्रसिद्ध भारतीय पुराजलवायु वैज्ञानिक प्रोफेसर रंगास्वामी रमेश नहीं रहे

महान जलवायु एवं महासागर वैज्ञानिक प्रोफेसर रंगास्वामी रमेश ने 2 अप्रैल 2018 को दुनिया को अलविदा कह दिया। अभी बमुश्किल चार माह पहले ही उनको कैंसर होने का पता चला था। उनका इलाज मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में चल रहा था। वहीं उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।

महान जलवायु एवं महासागर वैज्ञानिक प्रोफेसर रंगास्वामी रमेश। (फाइल फोटो)

महान जलवायु एवं महासागर वैज्ञानिक प्रोफेसर रंगास्वामी रमेश ने 2 अप्रैल 2018 को दुनिया को अलविदा कह दिया। अभी बमुश्किल चार माह पहले ही उनको कैंसर होने का पता चला था। उनका इलाज मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में चल रहा था। वहीं उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। 61 वर्षीय प्रोफेसर रमेश एक मूर्धन्य वैज्ञानिक होने के साथ-साथ लोकप्रिय प्रोफेसर, कर्मठ कार्यकर्ता और कुशल प्रशासक भी थे। भौतिकीय अनुसंधान प्रयोगशाला में प्रोफेसर के रूप में उनकी सेवाएं सदैव याद की जाती रहेंगी। अंतिम समय तक उन्होंने राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईएसईआर), भुवनेश्वर में एक वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। उनके द्वारा किए गए पुराजलवायु और पुरामहासागरीय शोध अद्वितीय हैं। वे 2006 में दक्षिणी महासागर और अंटार्कटिका के लिए भेजे गए विशेष अभियान दल में भी शामिल थे।

भारत की तीनों प्रमुख विज्ञान अकादमियों- भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (इनसा), भारतीय विज्ञान अकादमी (आईएएस) और राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (एनएएस) के साथ साथ वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेस के वे निर्वाचित अध्येता थे। वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद, सीएसआईआर ने उन्हें साल 1998 में पृथ्वी विज्ञान, वायुमंडल विज्ञान, महासागर विज्ञान और ग्रह विज्ञान में उनके अतिविशिष्ट योगदानों के लिए देश के सर्वोच्च भारतीय विज्ञान पुरस्कारों में से एक शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित किया था। प्रोफेसर रमेश को टीडब्ल्युएएस (वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेस) पुरस्कार और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो द्वारा प्रदत्त लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रोफेसर रमेश का जन्म 02 जून 1956 को तमिलनाडु के तिरुचिलापल्ली के एक गांव में हुआ था, लेकिन उनके मित्रगण उनका जन्मदिन 27 मार्च को मनाते थे। इसी 27 मार्च को उनके प्रिय शोधार्थियों ने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में उनका 61वां जन्मदिन मनाया था। मद्रास विश्वविद्यालय से उन्होंने भौतिकी में स्नातक एवं स्नातकोत्तर किया। गुजरात विश्वविद्यालय से पीएचडी और पोस्ट डॉक्टोरल अध्ययनों के दौरान ही वे भौतिकीय अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद से जुड़ गए थे। उन्होंने 1987 से 2016 तक विभिन्न पदों पर रहते हुए अनुसंधान अध्येता से लेकर वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में पीआरएल को अपनी सेवाएं प्रदान की। इस बीच, 1992-93 के दौरान उन्हें अमेरिका के स्क्रिप्प्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशिनोग्राफी में अनुसंधान करने का गौरव भी प्राप्त हुआ।

अपने परिवार में आठ भाई-बहनों में सबसे बड़े प्रोफेसर रमेश ने जीवनभर अविवाहित रहकर न केवल अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक निभाया, बल्कि उतनी ही निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपनी मेधा का पूरा उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान और अध्ययनों के लिए किया। यह उनकी कर्मठता ही थी जो देश में पहली स्थायी समस्थानिक प्रयोगशाला की स्थापना हुई। इस प्रयोगशाला के माध्यम से प्रोफेसर रमेश और उनके सहयोगी अनुसंधानकर्ताओं ने हजारों वर्ष पहले की मानसून परिस्थितियों का रहस्योद्घाटन किया। उन्होंने स्थायी समस्थानिक अनुपातों का उपयोग करते हुए पुरातापमानों और पुरावर्षा की गणना के लिए सूत्र विकसित किए और अभिनव युग के दौरान हुए मानसून परिवर्तनों के उच्च विभेदी अभिलेख भी तैयार किए। हिन्द महासागर की पुराजलवायवीय और पुरामहासागरीय परिस्थितियों के पुनर्संर्चानात्मक अध्ययनों में प्रोफेसर रमेश का योगदान अविस्मरणीय रहेगा।

उनके लगभग पांच सौ वैज्ञानिक शोधपत्र विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित हुए हैं। इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्टों के भी वे प्रमुख लेखकों में से एक थे। इनमें से 2007 की नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त आईपीसीसी रिपोर्ट और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से 2014 में प्रकाशित लगभग 1552 पृष्ठों वाली क्लाइमेट चेंज 2013: द फिजिकल साइंस बेसिस नामक संकलित रिपोर्ट में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। ऐसे मनीषी वैज्ञानिक का यूं कैंसर से जूझते हुए ब्रह्मलीन हो जाना देश ही नहीं, विश्व के समस्त वैज्ञानिक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App