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कुपोषण के संकट को रोकने के लिए कम्युनिटी रिसोर्स प्रोफेशनल्स को इंपावर करें

कोविड-19 ने पहले से मौजूद बाल कुपोषण और स्वास्थ्य की असमानता को और बढ़ाया है। बच्चों के अब इसकी चपेट में आने की और अधिक आशंका है क्योंकि उनके माता-पिता नौकरी और आमदनी का जरिया खो चुके हैं।

Malnutrition, Hunger, Hunger Indexप्रतीकात्मक तस्वीर.

गौरव गोगोई 

हम में से बहुत से लोगों के लिए कोविड-19 के दौरान का ज़िंदगी का मतलब है, परिवार के साथ समय बिताना, फिट रहना, घर से काम करते हुए अपने खाना बनाने के शौक को फिर से पूरा करना या हालिया टेक-अवे विकल्प से खाना ऑर्डर करना। हमें इन छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए आभारी होना चाहिए, क्योंकि कोविड-19 के कारण अधिकांश भारतीय घरों में दुख और अनिश्चितता आ गई है। परिवार के लिए एक वक्त का भोजन जुटाना भी इनके लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गई है।

जो सबसे अधिक पीड़ित हैं वह हैं हमारे बच्चे। उनके पास मीडिल क्लास फैमिली के बच्चों की तरह मेनू में से अलग-अलग चीज़े चुनने का ऑप्शन नहीं है। कोविड-19 के पहले भी लाखों बच्चे पोषण की कमी या गंभीर कुपोषण से पीड़ित थे। जब बच्चे के शरीर को सही पोषण नहीं मिलता है, तो वह कमज़ोर हो जाता है या बच्चा बीमार पड़ जाता है और अंत में सबसे खराब परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हो जाती है।

कुपोषण हमारे बच्चों के लिए साइलेंट किलर है। यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक, 2018 में भारत में 5 साल से कम उम्र के 8.8 लाख बच्चों की मौत हुई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल 5 साल की उम्र से पहले मरने वाले 100 बच्चों में 68 की मौत कुपोषण की वजह से होती है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 102 वें स्थान पर है। भारत के कुछ जिलों में, 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर इतनी ज़्यादा है कि इसकी तुलना उप-सहारा अफ्रीका से की जा सकती है। इसलिए भारत में बच्चे जिस असमानता को झेल रहे हैं, वह सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि मानवाधिकारों से जुड़ी चिंता है।

कोविड-19 ने सिर्फ पहले से मौजूद बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी असमानता को और बढ़ाया है। बच्चे अब अधिक इसकी चपेट में आएंगे क्योंकि उनके माता-पिता की अपनी नौकरी या मज़दूरी खो चुकी हैं और गांव या शहर दोनों जगह बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं। मैं पार्लियामेंट्री ग्रुप ऑफ चिल्ड्रन का सह-संयोजक हूं, जो लोकसभा और राज्यसभा के भारतीय सांसदों का दो दलों का समूह है। मतदाता क्षेत्रों में हमारे अपने अनुभवों और विशेषज्ञों के साथ बातचीत से पता चला है कि गरीब परिवारों के बच्चे संघर्ष कर रहे हैं।

11.59 करोड़ बच्चों का पेट भरने वाला दुनिया का सबसे बड़ा फीडिंग प्रोग्राम मिड-डे मील बंद है। बिना राशन कार्ड वाले परिवारों को केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से मिलने वाला राशन नहीं मिल रहा है। सब्ज़ियों के दाम बढ़ रहे हैं।

कोविड-19 से पहले केंद्र सरकार ने पोषण अभियान और एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम शुरू किया था। विशेषज्ञों का दावा है कि ये शुरुआत में सफल थे। लेकिन कोविड-19 ने कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में में अपने जो प्रगति की उसे पीछे धकेल दिया है। इसलिए यह ज़रूरी है कि केंद्र सरकार कोविड-19 का बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर पड़े प्रभाव से जुड़े ज़्यादा से ज़्यादा आंकड़ें जुटाए और राज्य सरकारों, विधायकों और विशेषज्ञों की सलाह से एक रोडमैप तैयार करे।

आगे विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है
केंद्र सरकार को जो पहला सबक सीखना चाहिए, वह है डिसेंट्रलाइजेशन (विकेंद्रीकरण)। अभी तक कोविड- 19 के लिए फैसलों का अधिकार केंद्र के पास था जिसमें बहुत अधिक समय और ऊर्जा बर्बाद हो चुकी है। मुझे लगता है कि यही वजह है कि प्रवासी मज़दूरों, आर्थिक विकास और बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए कोई सही योजना नहीं बन पाई। अब एक हद तक फैसला करने की शक्ति जिला कलेक्टरों या मजिस्ट्रेटों को दे दी गई है। लेकिन अभी पंचायत प्रसिडेंट और लोकल पंचायत कमिटी के स्तर तक डिसेंट्रलाइजेशन करने की ज़रूरत है। ये कमिटियां स्थानीय स्तर पर लोगों को हने वाली असल समस्याओं की पहचान कर सकती हैं और उसके समाधान के लिए सही कदम उठा सकती हैं। पंचायत अध्यक्षों को 14वीं और 15वीं वित्त आयोगों के तहत लोकल डेवलपमेंट फंड दिया जाना चाहिए ताकि वह गांव के लिए सही कोविड-19 रिसपॉन्स प्लान तैयार कर सके। ये रिस्पॉन्स प्लान पोषण, आजीविका, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर फोकस करने वाली होनी चाहिए और राज्य सरकार की ओर से सही रिसोर्स और टूल के जरिए मदद किए जाने की ज़रूरत है।

आंगनवाड़ी और आशा वर्कर्स (कम्यूनिटी हेल्थ वर्कर्स) को भी मज़बूत बनाने की आवश्यकता है। उन्हें खास ट्रेनिंग और आर्थिक मदद दिया जान चाहिए ताकि वह अपने काम को पूरा कर सकें। आशा वर्कर्स एसेंशियल वर्कर्स की कैटेगरी में रखना चाहिए, क्योंकि प्रसव पूर्व देखभाल, स्तनपान, प्रसव के बाद देखभाल, कम पोषण और बच्चों के शुरुआती विकास जैसे क्रिटिकल पब्लिक हेल्थ अवेयरनेस प्रोग्राम में उनकी भूमिका अहम है। कई राज्यों ने मोबाइल प्लेटफॉर्म को अपनाया है जिसमें हमारे कम्यूनिटी वर्कर्स से जरूरी फीडबैक मिलता है। इससे ऐसे परिवारों की पहले से अच्छी तरह से पहचान की जा सकती हैं जो रिस्क पर हैं।

ग्रामीण स्तर पर कोविड-19 रिस्पॉन्स प्लान तैयार करने में लोकल कम्यूनिटी को शामिल करना ज़रूरी है। जब लोकल कम्यूनिटी योजना बनाने में शामिल होगी तभी मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे व्यवहारात्मक बदलाव को सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। बच्चों के पोषण को ध्यान में रखते हुए कम्यूनिटी लेवल की संपत्ति भी बनाई जा सकती है। पिछले कुछ सालों में इस तरह की संपत्ति जो लोकप्रिय हुई है वह है न्यूट्रिशन गार्डन्स का कॉन्सेप्ट। गांव की जमीन के एक हिस्से पर ही कई किस्म की देसी सब्ज़ियां उगाई जाती हैं, काटी जाती है और बाद में कुपोषित परिवारों में मुफ्त बांट दी जाती है। असम में फार्म2फार्म फाउंडेशन नामक संस्था ने स्कूलों और लोकल कम्यूनिटी में ऐसे 2000 गार्डन बनाए हैं। ऐसी जगहों पर जहां ज़्याद लोग कुपोषण के शिकार हैं, इस तरह की पहल खासतौर पर ज़रूरी है, जैसे चाय बागान के मज़दूर और असम की जनजातीय आबादी।

बतौर संसद सदस्य यह हमारी ज़िम्मेदारी है हम अपने निर्वाचन क्षेत्र में बच्चों की ज़रूरतों की निगरानी करें। हमारे पार्लियामेंट्री ग्रुप ऑफ चिल्ड्रेन से जुड़े कई सांसदो ने वर्चुअल DISHA मीटिंग की है, जिसमें उन्होंने लोकल डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन को निर्देश दिए कि वह इस बाद की निगरानी करें कि प्रोग्राम को सही तरीके अमल में लाया जा रहा है या नहीं। यह ज़रूरी है कि न्यूट्रिशनल रिहैब्लिटेशन सेंटर और चाइल्ड क्रेच जैसी मौजूदा योजनाएं सामान्य तरीके से काम करें। यह भी ज़रूरी है कि इससे जुड़ी स्थायी समितियां इस लेख में उठाए गए मुद्दों पर विचार-विमर्श करें। ऐसी आशंका है कि केंद्र सरकार अपनी राजस्व स्थिति को बचाने के लिए पहले से बनाई गई योजना के खर्च में कटौती कर सकती है। संसद के मानसून सत्र में केंद्र सरकार को यह घोषणा करनी चाहिए कि वह बच्चों के कल्याण और स्वास्थ्य के लिए दिए गए बजट में कोई कटौती नहीं करेगी और इसका पूरा इस्तेमाल किया जाएगा। इस बीच, राज्य सरकारों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगले छह महीने तक आयरन, कैल्शियम, विटामिन-ए जैसे सप्लीमेंट्स की आपूर्ति पर्याप्त स्तर पर होती रहेगी।

भारतीयों को बहुत लचीला और रचनात्मक माना जाता है। यह ज़रूरी है कि अर्जेंट हेल्थ और ह्यूमन राइट से जुड़ी चिंता, जैसे बच्चों के पोषण के प्रति हमारी प्रतिक्रिया प्रैक्टिकल और इनोवेटिव हो। यह तभी हो सकता है जब कम्यूनिटी बेस्ड अप्रोच को अपनाया जाए। मेडिकल स्टाफ के साथ, आंगनवाड़ी वर्कर्स, आशा वर्कर्स जैसे कम्यूनिटी रिसोर्स प्रोफेशनल्स को कुपोषण रोकने के लिए ज़रूरी रिसोर्स और टूल की मदद दी जानी चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल करके आंकड़े जुटाए जाने चाहिए और ऐसे समाधानों पर फीडबैक लेना चाहिए जो सस्ते और स्केलेबल (मापनीय) हो। हर आपदा एक अवसर देती है और कोविड- 19 ने हमें मौका दिया है अपनी हेल्थ सिस्टम को अपग्रेड करने और अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का ताकि हमारे बच्चों के बीच की असमानता को कम किया जा सके।

– गौरव गोगोई असम के कलियाबोर से दो बार के सांसद और पार्लियामेंट्री ग्रुप ऑफ चिल्ड्रेन के सह- संयोजक हैं

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