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Election 2022: …ये चुनावी वादे हैं, आगे जुमले बन जाएंगे!

पांच राज्‍यों के विधानसभा चुनावों में जिस तरह से पेंशन, स्‍मार्टफोन, स्‍कूटी देने के वादे किए जा रहे हैं, उसे अगर हमारे संविधान निर्माता देखते तो बड़ा दुखी होते हैं। ये घोषणाएं लोकतंत्र में अच्‍छी बात नहीं हैं।

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यूपी चुनाव के लिए सभी दल पूरा जोर लगा रहे हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

संविधान निर्माताओं ने चुनाव का नियम लोकतंत्र की पवित्रता को बनाए रखने के लिए तैयार किया था। उनका मानना था कि यदि पांच साल में जनता अपने ‘शासक’ से ऊब जाए तो नए और स्वच्छ छवि वालों और शिक्षित लोगों को चुनकर देश की श्रेष्ठ पंचायत में भेज सकती है, जो उनकी समस्या सर्वोच्च पटल पर रखकर उससे निजात दिलाने में मदद करेंगे। बहुत दिनों तक उनकी इच्छाओं के अनुरूप देश में चुनाव होते भी रहे, स्वच्छ छवि के लोग चुनकर जनसेवा के लिए सर्वोच्च पंचायत में पहुंचते भी रहे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा लगने लगा है कि उम्मीदवार चाहे मवाली या गुंडा हो, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। बस, उसके पास वैध या अवैध धन—संपदा होना चाहिए, जिसके दम पर वह मतदाताओं को अपने पाले में खींचने में सक्षम हो जाता है। वह मतदाताओं को वोट के बदले नाना तरह के उपहार देने का प्रयास करते हैं या इस तरह भी कह सकते हैं कि उनकी बातों से आकर्षित होकर न चाहते हुए भी भोले—भाले मतदाताओं को अयोग्य और दागी उम्मीदवारों को अपना मत ‘दान’ करना पड़ता है। अब व्यक्तिगत रूप से किसी दल के उम्मीदवार की ही बात क्यों करें। आज तो हर दल अपने मतदाताओं को कुछ इसी तरह का प्रलोभन देते हैं जिसे सुनकर संविधान निर्माता यदि जीवित होते तो उन्हें इन नेताओं के वादे से शर्मसार होना पड़ता।

अभी पांच राज्यों में जहां विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, वहां कुछ इस तरह से वादे किए जा रहे हैं कि अगर हमारी सरकार बनी तो 16 वर्ष से अधिक आयु की प्रत्येक महिला को हर माह 1,600 रुपये दिए जाएंगे। दूसरा दल कहता है कि प्रत्येक गृहिणी को प्रतिमाह 2,000 रुपये और साल में रसोई गैस के आठ सिलेंडर दिए जाएंगे। किसी दल का वादा होता है कि 12वीं में पढ़ने वाली हर लड़की को स्मार्टफोन, स्नातक करने वाली छात्रा को स्कूटी देंगे। एक दल वादा करता है कि हर परिवार को 300 यूनिट बिजली मुफ्त और हर महिला को 1,500 रुपये का पेंशन दिया जाएगा। किसी दल का आश्वासन होता है कि यदि उसकी सरकार बनी तो वह देश प्रत्येक नागरिक के खाते में पंद्रह लाख तथा प्रतिवर्ष देश के दो करोड़ बेरोजगारों को रोजगार देंगे। और न जाने कितना कुछ देने का वादा किया जाता है। चुनावी दौर में शराब बांटने की बात तो अब पुरानी हो गई। उसकी तो खुली छूट बिना वादे के ही बंटना ही बंटना है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या आज तक जो कुछ हो रहा था, उससे क्या आप अच्छे राष्ट्र के निर्माण की बात कर सकते हैं? यह तो रिश्वत देकर अपने पक्ष में मतदान कराने की बात हो गई। यही अब तक होता रहा है। इसलिए तो देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमण ने पिछले वर्ष एक संबोधन में वकीलों से कहा था कि उन्हें राजनीति में आना चाहिए। उन्होंने आजादी काल का उदाहरण देते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, स्व. महात्मा गांधी जैसी कुछ महान हस्तियों के नाम गिनाए, जिन्होंने आजादी के लिए सब कुछ त्यागकर जनहित में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करते रहना उचित समझा। लेकिन, आज की राजनीति में इस प्रकार के गुणियों की कमी महसूस की जा रही है। आजादी की लड़ाई में यदि ऐसे सपूत हमारे बीच नहीं होते तो हम आज भी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए होते। यह ठीक है कि हमारे गरम दल के योद्धाओं की कुर्बानियों को हम भुला नहीं सकते, जिन्होंने हंसते—हंसते फांसी के फंदों पर झूलना आजादी के उपलब्धि को सर्वश्रेष्ठ समझा।

आज की राजनीति तो एक व्यवसाय है, रोजगार का साधन है। अब वह बात कहां रही जब राजनीति में स्वच्छ छवि के ही लोगों के लिए गुंजाइश थी और ऐसे लोग ही इसमें शामिल हुआ करते थे। वह उस परिवेश से आते थे जहां से देश के 70 से 80 प्रतिशत लोग आते थे। जो हर व्यक्ति को जानते थे। और उनके सुख—दुख को अपना मानते थे। उनकी समस्याओं को दूर करना प्राथमिकता हुआ करती थी। वह चूंकि सामान्य वर्ग से आते थे, इसलिए उनमें अहंकार—भाव भी नहीं होता था। उनके पास सरकारी हथियार बंद सुरक्षाकर्मी नहीं होते थे जिनसे डरकर आम जनता अपने नेता के पास पहुंच न सके। उस काल के राजनीतिज्ञों से यदि आज की तुलना करें तो आप भ्रमित हो जाएंगे कि आज आप लोकतंत्र में जी रहे हैं या राजतंत्र में राजा की इच्छा पर आप जीवन गुजार रहे हैं। और, फिर इन्हीं राजाओं द्वारा आपको कहा जाता है कि यदि हमारी सरकार बनी तो हम आपको ‘स्वर्ग से भी बेहतर’ सुखकर जीवन प्रदान करेंगे। उनके रंग—ढंग को देखकर आप झांसे में आ जाते हैं। फिर वह जैसा चाहते हैं, मदारी बनकर आपसे वैसा ही नाच नचाते हैं। अब तक आप इन्ही झांसे में फंसते आ रहे हैं और इसीलिए देश का विकास उस गति से नहीं हो सका, जिस गति से होना चाहिए था।

चीन और विश्व के कई देश भारत की आजादी के वर्ष के आसपास ही आजाद हुए थे, लेकिन विकास के मामले में वह हमसे सालों आगे इसलिए हैं, क्योंकि हमारे राजनीतिज्ञ हमें तरह—तरह के वादे और प्रलोभन देकर पिछले 73 वर्षों से ठगते रहे और अपने किए गए वादे से मुकरते भी रहे। आज चीन विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। इसका कारण यही है कि वहां के राजनीतिज्ञों में एक ललक थी कि उनका देश आगे कैसे बढ़े, आत्मनिर्भर कैसे बने। फिर उसका परिणाम सबके सामने है कि अमेरिका भी आज उसकी समृद्धि की चकाचौंध से हैरान है। चीन दुनिया के बड़े निर्यातक देशों में से एक है। हिंदुस्तान ऐसा क्यों नहीं हो सका, यह एक गहन बहस का मुद्दा है। इस प्रकार जनता को ठगकर हम किसका हित करना चाहते हैं? आप तो पांच वर्षीय सुख भोगकर चले जाएंगे, लेकिन आपके पीछे केवल आपका ही परिवार नहीं है, आपसे पूरा देश जुड़ा है और पूरा देश आपकी तरफ उम्मीदों से देख रहा है। आप समाज का हित कीजिए, देश का हित स्वयं हो जाएगा।

जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहा है उनमें केवल पंजाब ही ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की सरकार है, लेकिन इस बार कैप्टन अमरिंदर सिंह के अलग होने के बाद जो स्थिति बन रही है, उसमें उनके दुबारा सत्ता में आना कठिन लगता है। भाजपा और अकाली दल भी दौड़ में शामिल नहीं है। वहां एक नई पार्टी आम आदमी ने अपनी छवि इस प्रकार बना ली है कि जनता का रुझान उसकी सरकार बनाने के प्रति आकर्षित कर रही है। अब देश के सबसे बड़े राज्य और भाजपा की नाक की लड़ाई उत्तर प्रदेश के लिए है। यह बात तो सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के माध्यम से ही दिल्ली का रास्ता जाता है, इसलिए सारी ताकत भाजपा ने इसी प्रदेश में झोंककर इसमें फिर से अपनी सरकार बनाने की कवायद कर रही है, जबकि यहां चार दलों में मुकाबला है। भाजपा को यदि कोई टक्कर दे रहा है तो वह समाजवादी पार्टी है।

कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों में महिलाओं को अपना उम्मीदवार घोषित करके प्रदेश की आधी आबादी को अपनी ओर आकर्षित करने में लगी है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी, जो अब तक बहुत ही शांत थी, धीरे—धीरे अपने पत्ते खोल रही है। उन पत्तों में ब्राह्मण चेहरे को अपना प्रत्याशी बनाकर अपने ऊपर लगे आरोपों को साफ करने में जुटी है। साथ ही सभी दलों ने मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी है। जीत—हार तो अलग बात है, मतदाता योग्य उम्मीदवारों को छोड़कर उन दलों का साथ देने में लगी है कि कौन कितने वादे कर रहा है और कौन उसे कितना तात्कालिक लाभ पहुंचा सकता है।

भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिन्होंने समय—समय पर ऐसे नेताओं को सही रास्ते पर लाने का प्रयास करती रहती है। सरकार के तरह—तरह की निरंकुश गतिविधियों पर लगाम लगाने का भी सदैव प्रयास किया है। अभी पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में जिस प्रकार विभिन्न दलों ने नेताओं द्वारा रेवड़ी की तरह उपहार जिस तरह बांटने का काम शुरू किया गया है, उस पर फिर सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख कठोर अपनाया है।

चीफ जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस एएस बोपन्ना और हिमा कोहली की पीठ ने भाजपा नेता और वकील अश्वनी उपाध्याय की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए सरकारी खजाने से नकद और मुफ्त उपहारों का वादा करने वाले दलों का चुनाव चिह्न जब्त करने और ऐसे दलों की मान्यता रद्द करने की मांग पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि यह गंभीर मुद्दा है। कई बार मुफ़्त उपहारों की घोषणा का बजट नियमित बजट से अधिक हो जाता है। अब इस नोटिस का उत्तर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को देना है। देखना यह है कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग का उत्तर क्या होता है और उससे सुप्रीम कोर्ट कहां तक संतुष्ट होता है। चार सप्ताह में तो कई राज्यों में चुनाव हो चुके होंगे, लेकिन यदि उत्तर संतोषजनक सुप्रीम कोर्ट को नहीं लगा तो फिर उसका जो आदेश होगा, वह तो कभी—न—कभी तो काम आएगा ही।

भले ही इस चुनाव में इसका लाभ मिले या न मिले, लेकिन भविष्य में यह देश की आम जनता के लिए हितकारी होगा और भविष्य में मतदाताओं से झूठे वादे करने वाले हर शब्द सोच—समझकर बोलेगा। यदि सार्थक आदेश राजनीतिज्ञों के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया जाता है तो निश्चित रूप से उसका लाभ देश को मिलेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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