ताज़ा खबर
 

‘लोकतंत्र वोटों की गिनती से कहीं ज्यादा, चुनावों में सिर्फ जीत हासिल करना मकसद नहीं’

अगर भारत को अपनी पिछली प्रतिष्ठा को बनाए रखना है- और वास्तव में फिर से हासिल करना है तो अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक स्तरीय खेल के मैदान की पेशकश के साथ इन विषमताओं को दूर करना होगा।

चुनावों में सिर्फ जीत हासिल कर लेना मकसद नहीं होता। चुनाव के बाद विजेता को दुनिया में किस भाव से देखा जाता है, यह एक बड़ा सवाल है।

अमर्त्य सेन, अर्थसास्त्री

आम चुनावों के परिणाम जारी हो चुके हैं और इसके साथ ही चुनावी रोमांच का दौर भी लगभग खत्म हो चुका है। इन चुनावों से मिली सबक या सीख को पूरी स्पष्टता के साथ उभरने में निश्चित तौर पर वक्त लगेगा लेकिन हमारी चुनावी प्रणाली और संस्था को लेकर कुछ सरल विचार तत्काल उभरकर सामने आ रहे हैं।

भारत को अंग्रेजों से विरासत में एक ऐसी चुनाव प्रणाली मिली है, जिसमें अधिकांश मत पाने वाले उम्मीदवार को विजेता माना जाता रहा है। यद्यपि उसके पास बहुसंख्यक मतदाताओं का समर्थन प्राप्त नहीं होता है। भाजपा ने भी हालिया आम चुनावों में अधिकांश सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त किया है लेकिन उसे केवल 37 फीसदी ही वोट हासिल हुए हैं। क्या विपक्षी दलों ने बहुमत और बहुलता के बीच अंतर की पर्याप्त रूप से सराहना की है?

क्या भारतीय जनता पार्टी की सापेक्ष शक्ति को देखते हुए विपक्षी दलों के बीच अधिक गठबंधन होना चाहिए था? क्या कांग्रेस को अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों जैसे कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के साथ अधिक समन्वित तरीके से समझौते करने चाहिए थे? क्या दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच, या महाराष्ट्र में कांग्रेस और प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के बीच गठबंधन होना चाहिए था? क्या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को बेगूसराय में युवा राष्ट्रीय नेता कन्हैया कुमार के लिए एक सीट देकर एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए था, तेजस्वी यादव को 29 साल के युवा नेतृत्व के लिए संभावित प्रतिद्वंद्वी होने की चिंता किए बिना, (ऐसा कथित आरोप और एक विचार है कि गठबंधन के नेतृत्व में भाजपा विरोधी वोट विभाजित करने का फैसला किया गया)? ऐसे कई सवाल व्यक्तिगत तौर पर, सामूहिक तौर पर उभरकर आ रहे हैं।

इससे कम महत्वपूर्ण बात यह है कि वास्तव में उभरे गठबंधन को एक सहमति की दृष्टि से काम करना चाहिए था और केवल इस तथ्य से संतुष्ट नहीं होना चाहिए कि गठबंधन की सभी पार्टियां “भाजपा विरोधी” हैं? मैंने कहीं और तर्क दिया है (25 मई को न्यूयॉर्क टाइम्स के ओपिनियन ब्लॉग में) कि भाजपा के खिलाफ पार्टियां अपनी साझा नापसंदगी के लिए पर्याप्त मुखर थीं लेकिन भाजपा के परिप्रेक्ष्य में बुनियादी वैचारिक मतभेदों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। (विशेष रूप से एक धार्मिक पहचान के प्रभुत्व के पीछे का दर्शन- इस मामले में “हिंदू पहचान”), और देश भर में भारतीयों की आम पहचान की एकीकृत दृष्टि (धर्म के बावजूद) के रूप में। वास्तविकता में गांधी-टैगोर-नेहरू का अखंड और शक्तिशाली भारत का दृष्टिकोण जिसने भारत को दशकों तक एकसाथ रखने में योगदान दिया, उस पर कम ध्यान दिया गया। एक सकारात्मक दृष्टि एक रचनात्मक और प्रेरक भूमिका निभा सकती है जो संभवतः तदर्थ समझौते की वजह से बातचीत से परे रही है, जिसे हेगेलियन भाषा में कहा जा सकता है, “नकारात्मकता का निषेध।”

अब बात चुनावी विजेता भाजपा की, जिसके पास 23 मई के चुनाव परिणामों से खुश होने के लिए उत्कृष्ट आधार हैं। फिर भी, भाजपा नेतृत्व और विशेष रूप से इसके अत्यधिक प्रतिभाशाली और असाधारण रूप से महत्वाकांक्षी शीर्ष नेता, नरेंद्र मोदी के पास, बंपर जीत के लिए मिल रही वैश्विक प्रतिक्रियाओं से निराश होने का कारण भी हैं। दुनिया भर के न्यूज मीडिया (न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल, द गार्जियन, ऑब्जर्वर, ले मोंडे, डाई जिट और हैर्टज़ से लेकर बीबीसी और सीएनएन) में बीजेपी की जीत हासिल करने के तरीके और साधन पर व्यापक आलोचना हुई है। इसमें भारतीय नागरिकों, विशेषकर मुसलमानों के समूहों से घृणा और असहिष्णुता की भावना को शामिल किया गया है, जिनके पास सम्मान के साथ व्यवहार करने का हर अधिकार है (जैसा कि गांधी-टैगोर की विचारधारा में निहित है)।

चुनावों में सिर्फ जीत हासिल कर लेना मकसद नहीं होता। चुनाव के बाद विजेता को दुनिया में किस भाव से देखा जाता है, यह एक बड़ा सवाल है। भाजपा के एक शुभचिंतक के पास अपनी पसंदीदा पार्टी के लिए सिर्फ एक जीत से अधिक इच्छा करने के कारण होंगे लेकिन बड़े पैमाने पर लोगों के बारे में क्या? भारत कई मायनों में एक सफल लोकतंत्र है, हाल ही में विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों को जनता ने समरूपता के आधार पर चुनकर सांसदों को उत्कृष्ट प्रतिष्ठा दी है। हालांकि, 2019 के चुनावों में सत्तारूढ़ दल भाजपा के पक्ष में असमान व्यवहार के आरोप भी चुनाव आयोग पर विपक्ष ने लगाए हैं। विपक्ष की ये चिंताएँ आंशिक रूप से चुनाव आयोग द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों के मूल्यांकन से संबंधित हैं लेकिन वे सरकार के स्वामित्व वाली संस्थाओं द्वारा विभिन्न पक्षों को दिए गए असमान अवसरों से भी संबंधित हैं (उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार के स्वामित्व वाले दूरदर्शन ने भाजपा को महत्वपूर्ण पूर्व-चुनावी मौसम में प्रसारण समय को लगभग दोगुना कर दिया जबकि इसकी तुलना में कांग्रेस को कम समय दिया) ये आरोप कांग्रेस ने लगाए हैं।

अगर भारत को अपनी पिछली प्रतिष्ठा को बनाए रखना है- और वास्तव में फिर से हासिल करना है तो अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक स्तरीय खेल के मैदान की पेशकश के साथ इन विषमताओं को दूर करना होगा। सरकार के स्वामित्व वाले महत्वपूर्ण दफ्तरों के प्रशासनिक प्रमुखों की नियुक्ति या चुनाव आयोग में नियुक्ति करते समय सरकार को पक्षपाती रवैये से दूर रहना होगा और अपनी पसंद या नापसंद के अफसरों को प्रशासनिक प्रमुख नियुक्त करने से बचना होगा।

एक बात और अहम है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनावों में संपत्ति का संग्रह 2019 में स्पष्ट रूप से असाधारण रूप से असमान रहा है। भाजपा के पास कांग्रेस सहित अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में चुनावी उपयोग के लिए कई गुना अधिक धन और संसाधन थे। ऐसी बड़ी असमानताओं को कम करने के लिए प्रभावी नियमों और विनियमों की सख्त आवश्यकता है। यह न केवल भारत की लोकतांत्रिक साख के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि विश्व स्तर और स्थानीय स्तर पर भी चुनावी विजेताओं की जीत के लिए निर्णायक है।

भारत में नैतिक साहस वाले लोगों की कमी नहीं है। भले ही अन्याय का प्रतिरोध करना हो या आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों का विरोध- चुनाव प्रचार के दौरान यह स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। निष्पक्षता और न्याय की लड़ाई कई मायनों में हमारे देश में एक सतत घटना है। लेकिन सरकार द्वारा ऐसे प्रतिरोध को दबाने की कोशिश की जा रही है। भाषण की स्वतंत्रता पर नए प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिसमें सरकार के सुपर-राष्ट्रवादी विश्वासों पर असंतोष जताने पर देशद्रोह का आरोप लगाकर लोगों को कैद करना शामिल है। इसके अलावा अपराध की नई श्रेणियों का भी आविष्कार किया गया है, जैसे कि “शहरी नक्सली” (अर्बन नक्सली) के रूप में वर्णित किया जा रहा है, सरकार द्वारा निर्धारित बयानों के आधार पर इसे खतरनाक बता घरों में ही नजरबंद किया जा रहा है या इससे भी बदतर स्थिति में भेजा जा रहा है। ऐसे मामलों में भारतीय न्यायालयों ने अक्सर सरकार को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया है, लेकिन भारत में कानूनी प्रक्रियाओं की धीमी गति को देखते हुए, अदालती राहत मिलने में (जब भी मिला है) एक लंबा समय लगा है। और हिंदुत्व आंदोलन पर सवाल उठाने वाले या विचारों को व्यक्त करने वाले कई बुद्धिजीवियों की हत्या कर दी गई है।

अक्सर सत्तारूढ़ दल चुनाव जीतने के लिए इस तरह के दमन को गंभीरता से लेता है। विजयी पक्ष को यह विचार करना होगा कि वह किस प्रकार का शासन चलाना चाहता है- और इसे दुनिया भर में कैसे देखा जाता है। यह सराहना करना कठिन नहीं है कि लोकतंत्र वोटों की गिनती से ज्यादा मांग करता है।

(इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अमर्त्य सेन के लेख का अनुवाद।)

Next Stories
ये पढ़ा क्या?
X