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दूसरी नजरः पूर्व घोषित अनर्थ

नफरत का परिणाम यह है कि दिल्ली की कई बस्तियां पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं या उनमें नफरत का जहर इतना फैल गया है कि हिंदुओं और मुसलमानों में दुबारा भाईचारा कायम करने में बहुत वक्त लग सकता है। दंगे रुक जाते हैं हमेशा, लेकिन नफरत जब किसी शहर के हवा-पानी में घुल जाती है, जहर बन कर रह जाती है उस शहर की रगों में।

एक लोकतांत्रिक और जिम्मेदार सरकार लोगों के पास जाती और उनसे बात करती। पिछले दो महीनों में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इन सबका असर कुल मिला कर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जिसे टाला नहीं जा सकता। पिछले कुछ महीनों में पूरी दुनिया में देश की छवि को भारी नुकसान पहुंचा है।

आमतौर पर किसी आने वाले संकट की भविष्यवाणी करने के लिए सामान्य समझ ही पर्याप्त होती है, उसके लिए किसी छठी इंद्रिय की जरूरत नहीं पड़ती। 24 फरवरी और उसके बाद के दिनों में उत्तर पूर्व दिल्ली में भड़की हिंसा से जिस कदर शांति भंग हुई और अड़तीस लोग मारे गए, उसके बारे में पूरी तरह से पहले से ही पता था। इसके लिए अगर कोई तैयार नहीं था तो वह सिर्फ दिल्ली पुलिस थी। 25 फरवरी 2020 के ‘द हिंदू’ अखबार के मुताबिक ‘हिंसा करीब सौ पुलिसवालों की मौजूदगी में भड़की, जिन्होंने हालात के मुताबिक कोई कार्रवाई नहीं की’।

महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि पहले किसने उकसाया, या किसने पत्थर फेंका या किसने पिस्तौल लहराई। महत्त्वपूर्ण यह है कि सरकार और सीएए विरोधियों के बीच जो लड़ाई शुरू हुई थी, वह सड़कों पर आ गई और सीएए विरोधियों व सीएए समर्थकों के बीच युद्ध में तब्दील हो गई। पिछले साल 11 दिसंबर के बाद से देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी कुछ घटित हुआ था। शाहीन बाग, दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में धरने-प्रदर्शन, मार्च, रैलियां, चुनावी वक्त में अपने-अपने हथकंडे और अदालतों में याचिकाएं। 23 फरवरी को एक भाजपा नेता ने दिल्ली पुलिस को तीन दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि ‘दिल्ली पुलिस जाफराबाद और चांद बाग की सड़कों को खाली करा ले। इसके बाद हमें वह कोई सफाई न दे। फिर हम आपकी नहीं सुनेंगे। सिर्फ तीन दिन।’

क्या कोई योजना है?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया (इसके चालीस फीसद छात्र गैर-मुसलिम हैं) और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के सैकड़ों छात्रों को पीटने और घायल करने वाली हिंसा से संबंधित नया सबूत सामने आया। दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस की बर्बरता को ओर अंगुलियां उठाई गई थीं। अकेले उत्तर प्रदेश में पुलिस की गोली से तेईस लोग मारे गए थे। सैकड़ों लोगों जिनमें अधिकतर छात्र थे, को गिरफ्तार किया गया था। जैसे-जैसे दिन गुजरते गए, अदालतों ने एफआइआर और पुलिस की रिपोर्टों की सत्यता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने सार्वजनिक रूप से असहमति के बचाव के पक्ष में बोला और असहमति व्यक्त करने वालों पर देशद्रोही होने का ठप्पा लगाने को लेकर चेताया।

फिर भी सरकार ऐसे दावे और काम करती रही जैसे वह कहीं गलत नहीं है। सरकार की ओर से सिर्फ ऐसे कटु बयान आए, जो संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के बचाव में थे। इनमें बचाव की बजाय धमकियों की ध्वनि ज्यादा थी। एक ऐसा संदेह पैदा हो रहा है कि भाजपा किसी योजना पर काम कर रही है। कइयों को इस बात का शक है कि भाजपा अलग-अलग विचारों वाले लोगों को और कट्टर बना कर उन्हें सड़कों पर उतारना चाहती है और इस तरह वह ध्रुवीकरण को पूरा करना चाहती है। संभव है यह कठोर और सही नहीं लगे, लेकिन सरकार की जिद और प्रदर्शनकारियों (अकेले मुसलमानों से नहीं) से बात नहीं करने के कठोर फैसले से यह संदेह और गहरा जाता है।

सीएए-एनपीआर से फैलता खौफ

सरकार का कहना है कि एनपीआर एक सामान्य कवायद है और सीएए राष्ट्र हित में है और इन दोनों में कोई संबंध नहीं है। यह समझ से परे है कि इस तरह का बचकाना तर्क कैसे कुछ लोगों के गले उतर सकता है। एनपीआर कहीं से भी सामान्य कवायद नहीं है, इसके फार्म में कई तरह के शरारतपूर्ण सवाल जोड़ दिए गए हैं। जहां तक सीएए का सवाल है, यह स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इसके अलावा, सीएए और एनपीआर एक दूसरे से जुड़े हैं। पहले एनपीआर का काम शुरू किया जाएगा, ताकि ‘सामान्य नागरिकों’ की पहचान की जा सके और जो सामान्य नागरिक नहीं पाए जाएंगे, उन्हें ‘संदिग्ध’ के रूप में चिह्नित कर दिया जाएगा। इस स्तर पर सीएए प्रभाव में आ जाएगा। सारे ‘संदिग्ध’ लोग जो हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध या पारसी होंगे, उन्हें नागरिकता के लिए साधारण-सा आवेदन करने की अनुमति दे दी जाएगी और फिर नागरिकता प्रदान कर दी जाएगी। बाकी बचे हुए लोग ‘संदिग्ध’ मुसलमान होंगे, जिन्हें सीएए के तहत कोई शरण नहीं मिलेगी।

डर इस बात का है कि एनपीआर की इस कवायद से लाखों मुसलमान बेसहारा हो जाएंगे। क्या इसमें कोई आश्चर्य है कि लाखों मुसलमान इतने सतर्क हो गए हैं कि आमतौर पर घरों में रहने वाली हजारों मुसलिम महिलाएं और बच्चे सड़कों और बगीचों में कड़ाके की ठंड, बारिश और पुलिस की लाठियों को झेलते हुए धरना दे रहे हैं? उन्हें जो उम्मीद और हिम्मत मिल रही है, उसके पीछे हजारों गैर मुसलमानों और राजनीतिक दलों से मिलने वाला जोरदार समर्थन है।

लापरवाह और अलोकतांत्रिक

भाजपा लोकसभा में अपने संख्या बल का फायदा उठाते हुए अपने पक्षपातपूर्ण एजंडे को आगे ले जाने के लिए निर्लज्जता पर उतर चुकी है। लोकसभा चुनाव में अभी चार साल बाकी हैं। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अनिच्छा से छह मुसलमान उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था (तीन पश्चिम बंगाल में, दो जम्मू और कश्मीर में और एक लक्षद्वीप में और किसी अन्य राज्य में नहीं) और वह इस तथ्य को नहीं छिपाती कि अब वह मुसलमान मतदाताओं से सक्रियता से वोट मांगेगी। दूसरी बार सरकार बनने के बाद से ही प्रधानमंत्री ने एक के बाद एक ऐसे कई कदम उठाए हैं जिनसे मुसलमानों के भीतर खौफ गहराया है। मुसलमानों में लगभग यह धारणा बन चुकी है कि केंद्र सरकार उनके हितों की रक्षा नहीं करेगी। यह एक महत्त्वपूर्ण धारणा है। धारणाएं ही क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती हैं।

एक लोकतांत्रिक और जिम्मेदार सरकार लोगों के पास जाती और उनसे बात करती। पिछले दो महीनों में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इन सबका असर कुल मिला कर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जिसे टाला नहीं जा सकता। पिछले कुछ महीनों में पूरी दुनिया में देश की छवि को भारी नुकसान पहुंचा है। यूरोपीय संघ, अमेरिकी कांग्रेस की कमेटियों और संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं से आए बयान इसके गवाह हैं। कई देशों ने निजी तौर पर भारत को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है। विकसित देशों में सांसद, निवेशक और राय बनाने वाले टाइम, द इकॉनोमिस्ट, न्यूयार्क टाइम्स और वाल स्ट्रीट जरनल पढ़ते हैं और इनके आधार पर वे कड़ी आलोचनाएं करते रहे हैं। भारत एक अघोषित धर्मतंत्र सरीखा व्यवहार कर सकता है। या फिर धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र जैसा बर्ताव कर सकता है। यह चाहे जो करे, भारतीय लोगों के लिए इसके दूरगामी और बहुत ही भयानक नतीजे होंगे और खासतौर से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए।

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