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कुमार विश्वास: कविता का प्रहसन और प्रहसन की कविता

प्रो. पंकज चतुर्वेदी कानपुर में 25 जनवरी को कुमार व‍िश्‍वास के कार्यक्रम में बतौर श्रोता-दर्शक शरीक हुए। उन्‍होंने व‍िश्‍वास की प्रस्‍तुत‍ि के आधार पर कव‍ि और कव‍िताई दुन‍िया का जो व‍िश्‍लेषण क‍िया है, वहां यहां पेश है।

बीते 25 जनवरी को गीतकार कुमार विश्वास कानपुर कविता पाठ करने गए थे, इसमें भारी भीड़ जुटी थी। (फोटो- कुमार विश्वास के फेसबुक पेज से)

प्रो. पंकज चतुर्वेदी

एक ज़माना था, जब हिन्दी कवि-सम्मेलनों के मंच पर हरिवंशराय बच्चन छाये हुए थे। उनकी शोहरत चरम पर थी। कई बार तो लोग रात-रात-भर उनकी ही कविताएँ सुनते और भोर के नरम उजाले में उन्हें गुनगुनाते हुए घर लौटते। बात 1947-48 की है, जब हमारा देश आज़ाद होने को था या हुआ ही था। बाद में मशहूर कवि साबित हुए रघुवीर सहाय उस समय अठारह बरस के थे और लखनऊ के एक कॉलेज में पढ़ते थे, जहाँ आने से बच्चन ने मना कर दिया था। उनकी फ़ीस तब पाँच सौ रुपये थी, जिसे चुका पाने में वह संस्था असमर्थ थी। इस घटना को याद करते हुए रघुवीर सहाय ने दुख के साथ लिखा है : “जब तुम हमारे कवि हो, तो हमारे बीच में रुपये की दीवार खड़ी करने का तुम्हें हक़ नहीं है!”

इस तकलीफ़ के बावजूद बच्चन उनके प्रिय कवि थे और मंचीय कविता के वे अच्छे दिन थे। अभाग्यवश, मौजूदा दौर ऐसा नहीं है। हाल ही में, कवि-सम्मेलनों के एक चर्चित कवि ने मुझसे कहा कि ‘पाँच-छह दशक पहले जब उन्होंने लिखना शुरू किया था, मंच पर बैठने में उन्हें संकोच होता था, जिनके पास अच्छी कविता नहीं होती थी। इसके विपरीत, अब मंच पर जाने में वे कवि झिझकते हैं, जिनके पास अच्छी कविता होती है।’ ज़ाहिर है कि सार्थक या संजीदा कविता के मंच के रूप में कवि-सम्मेलन नाम की संस्था तबाह हो चुकी है।

इसकी बहुत सारी वजहें हो सकती हैं, जिनमें-से प्रमुख यह है कि बीते तीन दशकों में भूमंडलीकरण से जुड़ी आर्थिक नीतियों के नतीजे में जिस विशाल भारतीय मध्यवर्ग का उदय और प्रसार हुआ है, उस नव-धनाढ्य तबक़े में मूल्यनिष्ठा का भयावह क्षरण हुआ है। उसकी दिलचस्पी महज़ उपभोग और विलास में है। लिहाज़ा कविता भी उसके लिए निहायत सतही मनोरंजन और विलासिता की सामग्री के स्तर पर ही स्वीकार्य है।

कविता का काम मनुष्य की चेतना के स्तर को ऊँचा उठाना है। आज कुमार विश्वास सरीखे चर्चित सम्मेलनी कवि जब कविता सुनाते हैं, तो लोग सीटी बजाते हैं, यानी चेतना का स्तर नीचे गिरता है। जो चीज़ नीचे ले जाती हो, वह और चाहे जो हो, कविता नहीं हो सकती।

बीती 25 जनवरी को गीतकार कुमार विश्वास कानपुर आये थे। उनके साथ कविता-पाठ करने के लिए तीन-चार लोग और भी थे, मगर वे मुझे कविता की दुनिया के नागरिक ही नहीं लगे। इसलिए यह एक तरह से कुमार विश्वास के एकल काव्य-पाठ का आयोजन था। बेहद कमज़ोर और निष्प्रभ साथियों का चुनाव इस मक़सद से किया गया होगा कि विश्वास उनके बीच सर्वश्रेष्ठ ही नहीं, अप्रतिम नज़र आयें!

आयोजक कानपुर क्लब था और मुख्य अतिथि सेना के एक ब्रिगेडियर साहब। गणतंत्र दिवस की पूर्व सन्ध्या थी ही। मोहिनी चाय, कपिला पशु आहार, पालीवाल पैथलैब्स जैसे न जाने कितने प्रायोजक थे ; कविता-पाठ के पहले जिनका नाम लेने, यानी परोक्ष रूप से अनुशंसा करने के लिए विश्वास को मजबूर होना पड़ा।

कुमार विश्वास ने कोई डेढ़-दो घंटे का समय लिया, लेकिन कविताएँ कुल मिलाकर तीन-चार, यानी पन्द्रह मिनट ही सुनायी होंगी। कहते हैं कि उन्होंने अपनी इस प्रस्तुति के लिए बारह लाख रुपये लिये, जिनमें-से दस लाख ख़ुद उनके लिए और पचास-पचास हज़ार रुपये उनके संगतकारों के लिए थे। ज़रा गर्व से उन्होंने कहा कि पैसा वह पहले ही ले चुके हैं, साथी कवि चिन्ता करें, क्योंकि उन्हें लिफ़ाफ़ा अभी नहीं मिला है।

स्वयं उन्होंने बताया कि वह पाँचसितारा होटेल के प्रेसीडेंशियल स्युएट में ही ठहरते हैं। लिहाज़ा लैंडमार्क होटेल यहाँ उनका ठिकाना था। उसमें उनके बेड पर आठ-दस क़िस्म के तकिये थे, उनकी समझ में नहीं आया कि “सोया कहाँ जाए और उनमें जो दो लम्बे-से गोल तकिए थे, उनका क्या इस्तेमाल है ? : सोचा कि परिचारिका से पूछ लूँ, मगर इसलिए नहीं पूछा कि पाँच-छह साल बाद कहीं वह ‘मी टू’ में मेरा नाम न उछाल दे!”

अपनी कार का नाम उन्होंने शायद मर्सिडीज़ बताया और यह भी कि आजकल अंतरराष्ट्रीय फ़ैशन के मुताबिक़ नोएडा में करोड़पति पड़ोसियों के बग़ल में मौजूद अपने घर का इंटीरियर डेकोरेशन उन्हें हर दूसरे साल बदलवाना होता है।

यह भी कि कविता-पाठ के सिलसिले में वह अब तक 36 देशों की यात्राएँ कर चुके हैं, डॉक्टर (पी-एच.डी.) हैं, एक कॉलेज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर रहे हैं और उनकी उपलब्धि यह है कि जहाँ भी जाते हैं, एक लाख लोग उनके साथ उनकी कविताओं को गाते हैं।

इस सबके बावजूद उनकी मुखरता के कारण उन्हें अब तक पद्मश्री या साहित्य अकादेमी पुरस्कार जैसा कोई सम्मान नहीं दिया गया है। इसलिए पुरस्कार वापसी अभियान के दौरान वह लौटाते भी, तो क्या ?

कुमार विश्वास ने कश्मीर में धारा 370 हटाने के ‘ऐतिहासिक’ योगदान के लिए प्रधानमन्त्री का शुक्रिया अदा किया और कहा कि ऐसा करके “उन्होंने भारतमाता के माथे की पीर हर ली है।”

उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द और एकता की अपील की और हिन्दू-मुसलमान वैमनस्य भड़काने और उसकी आँच पर अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए हिन्दी के कुछ अख़बारों एवं टीवी चैनलों की ख़ास तौर पर और सभी नेताओं की आम तौर पर निन्दा की। कहा कि वे “प्याज़ ज़ी टीवी से ख़रीदते हैं और एनडीटीवी को बेच देते हैं। एक प्याज़ को सस्ता बता रहा है, दूसरा महँगा। ऐसे में सच क्या है ? सच केवल कवि बता रहे हैं !”

उन्होंने यह भी बताया कि आज सुबह जब वह घर से चले ; सेंट ज़ेवियर और जे.एन.यू. सरीखी संस्थाओं से, टैक्सपेयर जनता की कमाई से पढ़ा हुआ एक नौजवान भारत से असम की आज़ादी की बात कर रहा था। लिहाज़ा सुबह से ही उनका मन बहुत विचलित है।

विश्वास ने कहा कि सी.बी.आई. और पुलिस सरीखी ज़्यादातर संवैधानिक संस्थाओं का बहुत पतन हो चुका है। अगर किसी का पतन नहीं हुआ, तो वह भारतीय सेना है। इसीलिए “मैंने कहा था कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पर राजनीति मत करो !” लेकिन लोग नहीं माने। नतीजा सामने है।

कुमार विश्वास ने चीनी सैनिकों के छोटे क़द और छोटी-छोटी आँखों के कारण उनके समवेत पराक्रम को भारतीय सैन्य-शक्ति के सामने कमतर और हास्यास्पद बताया। यह भी कि पाकिस्तान कोई संजीदा मुल्क नहीं, बल्कि एक ‘लॉफ़्टर शो’ है, जो हमारे पड़ोस में अनवरत खुला हुआ है। विंग कमांडर अभिनन्दन जब वहाँ फँस गये थे, तो उन्हें विश्वास था कि “वह लौट आयेंगे ; क्योंकि हनुमान् लंका में रहते नहीं, अपना काम करके वापस आ जाते हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि हनुमान् की पूँछ बड़ी थी और अभिनन्दन की मूँछें बड़ी हैं !”

उन्होंने ख़ुद शादी न करने और दूसरों को “पाँच बच्चे पैदा करने” की सलाह देने के लिए साक्षी महाराज को आड़े हाथों लिया। इसी तरह शादी न करने के लिए राहुल गांधी और पवित्रता के संकल्प के साथ सार्वजनिक जीवन शुरू करने वाले अरविन्द केजरीवाल का, उनकी मौजूदा राजनीति की ‘अपवित्रता’ के लिए उपहास किया। उन्होंने कहा कि “मोदी जी ने कहा था : ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा।’ लेकिन (विजय माल्या जैसे) लोगों ने इस बीच न सिर्फ़ खाया, बल्कि वे खाना पैक कराके भी (विदेश) ले गये!” चार पंक्तियाँ सुनायीं, जिनमें-से उनके ही अनुसार पहली पंक्ति राहुल जी, दूसरी मोदी जी और शेष दो केजरीवाल जी के लिए लिखी गयी हैं :

“इस अधूरी जवानी का क्या फ़ायदा,
बिन कथानक कहानी का क्या फ़ायदा,
जिससे धुलकर नज़र भी न पावन बने
आँख में ऐसे पानी का क्या फ़ायदा”

शादी न करने को लेकर राहुल गांधी पर छींटाकशी करते हुए उन्होंने कुछ अभद्र बातें भी कहीं, जो सभ्यता के लिहाज़ से यहाँ दोहरायी नहीं जा सकतीं। ऐसा लगता है कि विश्वास की नज़र में विवाह जीवन की चरम सार्थकता है, इसलिए किसी का अविवाहित रहना गोया कोई अपराध है या ऐसे व्यक्ति के चरित्र का संदिग्ध होना अपरिहार्य है। राहुल गांधी की हास्यास्पद छवि निर्मित करने का उनका काम भाजपा के आईटी सेल के कारनामे के विस्तार जैसा लगता था या मुमकिन है, अमेठी में उनसे लोकसभा चुनाव हारने की खीझ उनका पीछा करती हो।

उनकी दूसरी समस्या अरविन्द केजरीवाल को लेकर उनकी कुंठा और तल्ख़ी है, जिसका मौक़े-बेमौक़े कविता में इज़हार करने से वह चूकते नहीं। अचरज होता है कि कविता को निजी द्वेष और पूर्वग्रहों की अभिव्यक्ति का भी इस तरह ज़रिया बनाया जा सकता है ! उनके ऐसे एक गीत की पंक्ति है : “सम्बन्धों की तुरपाई को षड्यंत्रों से मत खोलो !” राज्यसभा की सांसदी से वंचित किये जाने को अपने साथ हुआ सबसे बड़ा अन्याय बताने या दोस्ती में विश्वासघात की तरह उसे पेश करने में वह झिझकते नहीं और एक गीत में कहते हैं कि वह अपने स्वाभिमान की पगड़ी बचा लाये हैं, भले सत्ता पर उनका दोस्त क़ाबिज़ हो गया हो :

“उसे ज़िद थी, झुकाओ सर, तभी दस्तार बख़्शूँगा; मैं अपना सर बचा लाया, महल और ताज उस पर है”

ख़ास बात यह है कि वैचारिक साम्य के बावजूद कुमार विश्वास दक्षिणपंथी राजनीतिक धारा के नज़दीक नहीं दिखना चाहते। इसलिए टीवी चैनलों का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहते हैं कि “वे उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग को दुनिया के सबसे ख़तरनाक आदमी के रूप में दिखाकर हमें डराना चाहते हैं, जबकि हम तो अपने वाले से ही डर जाते हैं, जब वह नवम्बर की एक रात आठ बजे आकर कहते हैं : ‘भाइयो और बहनो !’……” उन्होंने बिज़नेस क्लास पर तंज़ किया कि ‘इन लोगों की छाती में मोदी जी हैं, जबकि बहीख़ाते में वह जीएसटी काटने में लगे हुए हैं !’

महात्मा गांधी की आलोचना करनेवालों के प्रति कुमार विश्वास बहुत सख़्त थे : “यहाँ पांडाल में या इसके बाहर पुलिस का जो सिपाही या दारोग़ा वसूली अभियान में लगा हो, उसकी आँखों-में-आँखें डालकर बात करने की हिम्मत जिस दिन पैदा कर लेना, उस दिन गांधी के बारे में कुछ कहने का मन में ख़याल लाना !”

कुमार विश्वास की आवाज़, गायन और याददाश्त अच्छी है। इसके अलावा उनकी शोहरत सतही रोमानियत से लैस गीतों के लिए है। लेकिन उनकी ऐसी बातों से ज़ाहिर है कि कवि-सम्मेलनों के अपने लम्बे अनुभव से उन्होंने एक अच्छे-ख़ासे हास्य-कवि की महारत हासिल कर ली है और अब वह चाहें, तो इस काम के लिए अलग से एक प्राणी साथ लेकर चलने की ज़रूरत उन्हें नहीं है।

यह एक ऐसा हास्य है, जिसमें कविता कहीं नहीं है और जिसकी कोई धुरी या दिशा नहीं है ; इसलिए वह सबके ख़िलाफ़ लगता हुआ भी दरअसल किसी के ख़िलाफ़ नहीं है और आख़िरकार चीज़ों की हास्यास्पदता को ही सर्वोच्च मूल्य के तौर पर प्रतिष्ठित करता है। याद आते हैं रघुवीर सहाय :

“बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो; ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे”

यह एक विडम्बना है कि कविता के नाम पर लोगों को रिझाने, हँसाने, भ्रमित करने और ज़्यादा-से-ज़्यादा रुपया कमाने को विश्वास ने कवि-कर्म का पर्याय समझ लिया है और यों अपनी रचनात्मक संभावनाओं पर कुठाराघात तो किया ही है, कवि की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका और छवि को नीचे गिराने में उन्हें कोई संकोच या लज्जा नहीं है। नतीजा यह है कि कवि बनने चला एक होनहार व्यक्ति आत्महीन गायक एवं सम्भ्रान्त मनोरंजक बनकर परम संतुष्ट और प्रसन्न है। इस तरह वह अपने बारे में जताये गये, एक मशहूर गीतकार के अप्रिय आकलन को ही सत्यापित कर रहे हैं। कवि नीलाभ की पत्नी भूमिका द्विवेदी के शब्दों में, ‘इंदौर के एक मुशायरे में कवि नीरज जी ने किशोरवय कुमार विश्वास को सबसे पहले कविता सुनाते हुए देखा, तो मंच पर ही बग़ल में बैठे नीलाभ जी के कान में फुसफुसाया था, “बहुत जोश में है….परफ़ॉर्मर और एंटरटेनर समझिए, कविताई इसके बस की नहीं….।’

कुमार विश्वास ने हँसी-हँसी में यह भी बताया कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमन्त्री के शपथ-ग्रहण समारोह के लिए, उनके कार्यालय से फ़ोन आया था। मगर उन्होंने जवाब दिया कि “अब शपथग्रहण देखने नहीं, बल्कि शपथ लेने ही आऊँगा।”

विश्वास ने कहा कि मीडिया उन्हें जब-तब कोई पार्टी ज्वाइन कराती रहती है, मगर ख़ुद उन्हें ही इसकी कोई ख़बर नहीं ! यह भी कि प्रधानमन्त्री उनके मित्र हैं और जब वह मुख्यमन्त्री थे, तो उनके कई कवि-सम्मेलन उन्होंने करवाये थे।

विश्वास का पूरा रवैया यह साबित करता था कि किसी पार्टी में जाये बग़ैर, औपचारिक रूप से उस पार्टी में होने से बड़ी उसकी सेवा की जा सकती है।

एकल कविता-पाठ का समापन उन्होंने पुलवामा के शहीद सैनिकों पर लिखे गए एक भावुक गीत से किया, जो युद्ध की विडम्बना से सावधान नहीं करता था, बल्कि युद्धोन्माद जगाता था।

श्रोता गद्गद, कृतार्थ और उन्मत्त थे। वे चीख़ रहे थे। उन्हें आत्ममुग्धता, अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद की उनकी ज़रूरी और पसन्दीदा ख़ुराक मिल गयी थी।

मुझे लगा कि मैं काव्य-प्रेमियों नहीं, बल्कि देश के बेशतर ख़ुशहाल मध्यवर्ग द्वारा समर्थित भीड़ के जत्थों से घिरा बैठा हूँ ; जो ज़रा-से उकसावे पर किसी भी असहमत, कमज़ोर, ग़रीब, संदिग्ध विधर्मी अथवा ‘शरणार्थी अ-नागरिक’ की हत्या कर सकते हैं।

मैं जनता के कवि या जनकवि के बारे में सुनता आया था, मगर यह भीड़ का चहेता कवि था। एक बिलकुल नयी सामाजिक-राजनीतिक अवधारणा का साकार रूप ! दूसरे शब्दों में, कविता के प्रहसन और प्रहसन की कविता का अभागा और तकलीफ़देह मंज़र।

(लेखक कानपुर में रहते हैं और यहां पेश उनके व‍िचार पूरी तरह न‍िजी हैं।)

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