खंड-खंड में बंटना नियति नहीं, प्रवृति है

विश्व का शायद ही कोई देश ऐसा रहा होगा जो इतने वर्षों की गुलामी से आजाद होकर अपनी संस्कृति का निर्माण किया हो। बिंस्टन चर्चिल यही तो कहा करता था कि भारतीय नेतागण उस योग्य नहीं हैं, जो देश चला सकें। चूंकि वह अयोग्य हैं, इसलिए कुछ ही वर्षों में हिंदुस्तान के सैकड़ों टुकड़े हो जाएंगे और खंड—खंड में विभाजित हो कर स्वत: नष्ट हो जाएगा, इसलिए हिंदुस्तान को आजाद नहीं करना चाहिए।

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तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः unsplash)

इस बार भारतीय इतिहास और उसके जनसमूह की भावनाओं को सैकड़ों वर्षों तक किस प्रकार विदेशी आक्रांताओं ने रौंदा है, उसके ऐतिहासिक संदर्भों में कुछ जानने कोशिश करते हैं। यह मेरे मन का उद्गार नहीं है, अपितु वह कुछ है जिसे मैंने बहुत गहनता से पढ़ने के बाद कुछ समझने का प्रयास किया है। जब फतह करने वालों का यह कायदा था कि हारे हुए लोगों को या तो गुलाम बना लेते थे या उन्हें बिल्कुल मिटा देते थे, वर्ण-व्यवस्था ने एक शांतिवाला हल पेश किया और बढ़ते हुए धंधे के बंटवारे की जरूरत ने इसमें मदद पहुंचाई। समाज में दर्जे कायम हो गए। किसान जनता में से वैश्य बने, जिनमें किसान, कारीगर और व्यापारी लोग शामिल थे। क्षत्रिय हुए, जो हुकूमत करते थे या युद्ध करते थे। ब्राह्मण बने, जो पुरोहिती करते थे, विचारक थे, जिनके हाथ में नीति की बागडोर थी और जिनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वह जाति के आदर्शों की रक्षा करेंगे। इन तीनों वर्णों के नीचे शूद्र थे, जो मजदूरी या फिर ऐसे धंधे करते थे, जिनमें खास कौशल की जरूरत नहीं होती थी और जो किसानों से अलग थे (जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक” डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ से साभार)।

इतिहासकार राम कृष्ण शर्मा के अनुसार, वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का कोई वजूद नहीं था। वैदिक काल में सामाजिक बंटवारा धन आधारित न होकर जनजाति एवं कर्म आधारित था। वैदिक काल के बाद धर्मशास्त्र में वर्ण व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया गया है। उत्तर वैदिक काल के बाद वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित न होकर जन्म आधारित हो गया। वेद और महाभारत बताते हैं कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीन काल में सात द्वीपों में बांटा गया था- जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। जम्बू द्वीप में मानव का उत्थान और विकास हुआ। एक ही कुल और जाति का होने के बाद मानव भिन्न—भिन्न जगह पर रहकर हजारों जातियों में बंटता गया। पहले स्थानीय आधार पर जाति को संबोधित किया जाता था।

फिर मुगल साम्राज्य सन् 1526 में शुरू हुआ। मुगल वंश का संस्थापक बाबर था। अधिकतर मुगल शासक तुर्क और सुन्नी मुसलमान थे। बाबर ने सन् 1526 ई से सन् 1530 ई. तक शासन किया। एक इस्लामी तुर्की-मंगोल साम्राज्य था, जो सन् 1526 में शुरू हुआ। इसने 18वीं शताब्दी की शुरुआत तक भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया और 19वीं शताब्दी के मध्य में समाप्त हुआ। मुग़ल सम्राट तुर्क-मंगोल पीढ़ी के तैमूरवंशी थे और इन्होंने अति परिष्कृत मिश्रित हिंद-फारसी संस्कृति को विकसित किया। सन् 1700 के आसपास, अपनी शक्ति की ऊंचाई पर, भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग को नियंत्रित किया। इसका विस्तार पूर्व में वर्तमान बांग्लादेश से पश्चिम में बलूचिस्तान तक और उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कावेरी घाटी तक था। उस समय 44 लाख किमी (15 लाख मील) के क्षेत्र पर फैले इस साम्राज्य की जनसंख्या का अनुमान 13 और 15 करोड़ के बीच लगाया गया था। सन् 1725 के बाद इसकी शक्ति में तेज़ी से गिरावट आई। उत्तराधिकार के कलह, कृषि संकट की वजह से स्थानीय विद्रोह, धार्मिक असहिष्णुता का उत्कर्ष और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से कमजोर हुए साम्राज्य का अंतिम सम्राट बहादुर ज़फ़र शाह था, जिसका शासन दिल्ली शहर तक सीमित रह गया था। अंग्रेजों ने उसे कैद में रखा और सन् 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद ब्रिटिश द्वारा म्यानमार निर्वासित कर दिया। सन् 1556 में, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर, जो महान अकबर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के पदग्रहण के साथ इस साम्राज्य का उत्कृष्ट काल शुरू हुआ और औरंगज़ेब के निधन के साथ समाप्त। हालांकि, यह साम्राज्य और 150 साल तक चला। इस दौरान, विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने में एक उच्च केंद्रीकृत प्रशासन निर्मित किया गया था। मुग़लों के सभी महत्वपूर्ण स्मारक, उनके ज्यादातर दृश्य विरासत, इसी अवधि के हैं।

उसके बाद 24 अगस्त, 1608 को व्यापार के उद्देश्य से भारत के सूरत बंदरगाह पर अंग्रेजों का आगमन हुआ था, लेकिन सात वर्षों के बाद सर थॉमस रो (जेम्स प्रथम के राजदूत) की अगवाई में अंग्रेजों को सूरत में कारखाना स्थापित करने के लिए शाही फरमान प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति के माध्यम से अन्य यूरोपीय व्यापारिक कंपनी को भारत से बाहर खदेड़ कर अपने व्यापारिक संस्थाओं का विस्तार किया। वह 16वीं सदी का आख़िरी साल था। दुनिया के कुल उत्पादन का एक चौथाई माल भारत में तैयार होता था। इसी वजह से इस मुल्क को सोने की चिड़िया कहा जाता था। तब दिल्ली की तख़्त पर मुग़ल बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर की हुकूमत थी। वह दुनिया के सबसे दौलतमंद बादशाहों में से एक थे। दूसरी तरफ़ उसी दौर में ब्रिटेन गृहयुद्ध से उबर रहा था। उसकी अर्थव्यवस्था खेतीबाड़ी पर निर्भर थी और दुनिया के कुल उत्पादन का महज तीन फ़ीसद माल वहां तैयार होता था। ब्रिटेन में उस वक़्त महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम की हुकूमत थी। यूरोप की प्रमुख शक्तियां पुर्तगाल और स्पेन, व्यापार में ब्रिटेन को पीछे छोड़ चुकी थीं। व्यापारियों के रूप में ब्रिटेन के समुद्री लुटेरे पुर्तगाल और स्पेन के व्यापारिक जहाज़ों को लूटकर ही संतुष्ट हो जाते थे। उसी दौरान घुमंतू ब्रिटिश व्यापारी राल्फ़ फ़िच को हिंद महासागर, मेसोपोटामिया, फ़ारस की खाड़ी और दक्षिण पूर्व एशिया की व्यापारिक यात्राएं करते हुए भारत की समृद्धि के बारे में पता चला।

इतने सारे झंझावातों, सैकड़ों वर्षों की गुलामी, विभिन्न संस्कृतियों के बीच से उभरकर भारत 15 अगस्त 1947 को अपनी संस्कृति का निर्माण करने अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त हुआ। विश्व का शायद ही कोई देश ऐसा रहा होगा जो इतने वर्षों की गुलामी से आजाद होकर अपनी संस्कृति का निर्माण किया हो। बिंस्टन चर्चिल यही तो कहा करता था कि भारतीय नेतागण उस योग्य नहीं हैं, जो देश चला सकें। चूंकि वह अयोग्य हैं, इसलिए कुछ ही वर्षों में हिंदुस्तान के सैकड़ों टुकड़े हो जाएंगे और खंड—खंड में विभाजित हो कर स्वत: नष्ट हो जाएगा, इसलिए हिंदुस्तान को आजाद नहीं करना चाहिए। आज चर्चिल जीवित होता तो संभवत: भारत के विकास और उसकी आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सामरिक शक्ति को देखकर मानसिक संतुलन खो देता।

देश तो अंत में अंग्रजों से आजाद हो गया, लेकिन उनके द्वारा फैलाई गई गंदगी अब तक हम भारतीय झेल रहे हैं। आज सूचना के किसी मध्यम पर जाएं, चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल… सुबह—सुबह कुछ भी देखेंगे—सुनेंगे-पढ़ेंगे तो विचलित हो जाएंगे, क्योंकि हिंदू-मुस्लिम दंगे—फसाद की खबरों के अतिरिक्त आप यहां ज्ञानवर्धक कोई जानकारी नहीं पा सकते। हां, यह सच है कि इस प्रकार मन को विकृत करने की प्रवृति आज की देन नहीं है। दरअसल, अंग्रेजों ने ऐसी नीति यह सोचकर बनाई थी कि जब तक हिंदुस्तानियों के बीच यह विषबेल नहीं बोएंगे कि हिंदू-मुसलमान रेल की अलग—अलग पटरियां हैं जो कभी एक नहीं हो सकते, इसलिए फूट डालो और राज करो की नीति अपनाओ। इसके लिए मैकाले नामक शिक्षाविद को जिम्मा सौंपा गया। मैकाले ने यह जिम्मा उठाया था कि हम ऐसी शिक्षा नीति बनाएंगे जिससे दोनों (हिंदू-मुस्लिम) कभी एक नहीं हो पाएंगे। मैकाले की सफल नीति का ही परिणाम है कि जो विषबेल रूपी शिक्षा नीति उसने बनाई थी, वह पूरी तरह आज भी सफल है। यदि इस प्रकार हम अपने मस्तिष्क से गंदगी को दूर नहीं कर पाएंगे तो निश्चित रूप से वह दिन दूर नहीं, जब वर्षों की हमारी तपस्या खत्म हो जाएगी और हम आपस में ही लड़-कटकर समाप्त हो जाएंगे, क्योंकि तब संभलने का अवसर हमें नहीं मिलेगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।

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