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बिहार का धरहरा गांव: लड़कियों एवं महिलाओं के प्रति सकारात्मक सोच का वाहक

भागलपुर के धरहरा गांव की प्रथा आज के संदर्भ में वाकई उल्लेखनीय है। जहां आज के दौर में भी लड़कियों के जन्म की खुशी नहीं मनाई जाती है, धरहरा गांव इस विचारधारा से  इतर लड़का एवं लड़की में कोई भेद नहीं करता है।

कुमार सत्यम

बिहार, भारत का एक ऐसा प्रदेश है जो कालांतर में काफी विकसित रहा है। एक ऐसा वक्त था जब बिहार शिक्षा एवं संस्कृति का केंद्र होता था। राज्य का इतिहास बहुत ही समृद्धशाली रहा है। यहां नालंदा एवं विक्रमशिला जैसा विश्वविख्यात विश्वविद्यालय था। बिहार धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से समृद्ध हुआ करता था लेकिन वर्तमान समय में इस प्रदेश की परिस्थिति कुछ भिन्न है।

आज बिहार अनेक क्षेत्रों में पिछड़ा नजर आता है, चाहे वो महिला साक्षरता हो या प्रति व्यक्ति आय। 38 जिलों एवं 101 अनुमंडलों से बने इस राज्य की कुल जनसंख्या का 88.71% गांव में निवास करती है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि बिहार की अधिकतम जनसंख्या अभी भी शहरी परिवेश से काफी दूर है। खासकर ग्रामीण परिवेश में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है। वहां आज भी रूढ़िवादिता, कुप्रथा एवं  असमानता पर्याप्त रूप से मौजूद हैं।

वैसे इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि बिहार में  जमीनी स्तर की राजनीति में महिलाओं  की भागीदारी बढ़ी है। पंचायत के चुनाव इस बात के प्रमाण हैं। महिलाओं की भूमिका इन सब में किस हद तक है यह किसी से छुपी नहीं है। महिला सशक्तिकरण के लिए उल्लेखित कारक अवरोधक की तरह हैं। ऐसे में धरहरा मॉडल महिला सशक्तिकरण की दिशा में आशा की एक उम्मीद जगाता है।

बिहार राज्य के भागलपुर जिला अंतर्गत धरहरा गांव की प्रथा आज के संदर्भ में वाकई उल्लेखनीय है। जहां आज के दौर में भी लड़कियों के जन्म की खुशी नहीं मनाई जाती है, धरहरा गांव इस विचारधारा से  इतर लड़का एवं लड़की में कोई भेद नहीं करता है। इस गांव की प्रथा इस गांव को बहुत ही प्रासंगिक बनाती है। गांव के लोग अपनी पुत्री के जन्म के अवसर पर वृक्षारोपण का कार्य करते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि लड़के एवं लड़कियों में कोई अंतर नहीं करना चाहिए। लड़की के जन्म के समय खासकर आम एवं लीची के वृक्ष लगाए जाते हैं। लड़की की उम्र के साथ-साथ यह पौधे भी बढ़ते रहते हैं एवं समय पर यह आमदनी का एक जरिया भी बनता है।

इन फलदार पेड़ों से हुए आमदनी से लड़की की पढ़ाई के साथ-साथ उनके  शादी के खर्च को भी वहन किया जाता है। भारत की जनगणना, 2011 के अनुसार बिहार में बाल लिंगानुपात 935 है जबकि 2001 के आंकड़ों के अनुसार यह 942 था। महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए यह अच्छी तस्वीर नहीं है। पर यह धरहरा का मॉडल कहीं ना कहीं इस दिशा में एक सकारात्मक पहलू को दर्शाता है। सामान्यतः लड़कियों  के पालन-पोषण के साथ शादी में होने वाला खर्च परिवार के लिए एक चिंता का विषय होता है। धरहरा के लोगों ने इस चिंता का हल निकाल लिया है। बच्चे के जन्म के समय वृक्षारोपण सिर्फ इन खर्चों का एक समाधान नहीं है, अपितु, यह वहां के लोगों के संवेदना का एक प्रतिबिंब भी है।

भारत के कुछ राज्यों में लिंग अनुपात एक चिंता का सबब बना हुआ है। ऐसे में लड़कियों के प्रति संवेदना एवं समानता इस गांव को एक नई पहचान दिलाता है। सरकार एवं नागरिकों के सहयोग से इन मान्यताओं एवं रीति-रिवाजों को एक नई पहचान मिल सकती है। आज के वक्त में धराहरा कि यह प्रथा एक उदाहरण है सभ्य समाज के लिए जहां लड़कियां एवं महिलाएं आज भी समानता के लिए संघर्ष कर रही है। अन्य गांव की तुलना में धरहरा अत्यंत ही हरा भरा एवं फलदार पेड़ों से  भरा पड़ा है। आसपास के गांव एवं अन्य प्रदेश के लोगों में पेड़ों को संरक्षित करने की उतनी भावना नहीं है। धरहरा के लोगों का यह अभ्यास लिंगानुपात को सामान्य करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी एक अनूठा प्रयास है। साथ ही पेड़ों की अधिकता के कारण वातावरण शुद्ध हो जाता है, जिससे वहां के लोगों में  चिकित्सीय समस्या कम देखी गई है।

यह एक सुखद अहसास जहां पूरा देश पेड़ों एवं लड़कियों को बचाने के लिए  प्रयासरत है वही एक छोटा सा गांव अपने रीति-रिवाजों के माध्यम से  इनको को संरक्षित करते आ रहा है। इस क्रम में एक और रीति रिवाज प्रचलित है जिससे ज्ञात होता है कि यहां के लोगों एवं  प्रकृति के बीच एक सहजीवी संबंध है। बिहार के अन्य क्षेत्रों में पेड़ों से विवाह की प्रथा भी प्रचलित है। सरकार यहां की प्रथा से प्रभावित होकर वृक्षारोपण एवं इनसे संबंधित क्रियाकलापों को रोजगार से जोड़कर लोगों को और लाभान्वित करने की पहल कर रहे हैं।

यहां के लोग खासकर महिलाएं, खाद्य प्रसंस्करण की कला में प्रशिक्षण प्राप्त कर रोजगार के नए अवसर से परिचित हो सकते हैं। पेड़ों की अधिकता के कारण इस गांव में विभिन्न तरह के पक्षियों का भी आगमन होता है। कोरोना महामारी के इस बुरे दौर में संभवत वहां के लोग भी प्रभावित हुए होंगे पर उनकी आजीविका, आत्मनिर्भरता एवं सकारात्मक सोच इस विकट परिस्थिति से बाहर निकालने में भरपूर मदद कर सकता है।

नूनिया जनम लेलकै
दुनिया मगन भले
नूनिया जानम लात
दुनिया मगन भले
एले बसंत बहार
आमी और लुचि के लागल कतार
पोर पीछुआरी म
सड़कों किनारी म
अंगना दुवारी म
गांव के ठाकुरबाड़ी म
नियमों के जोड़ सा
फलदार पेड़ों से
भरी देते पूरे संसार
आमी और लुचि के लागले भरमार
आमी और लुचि के लागल कतार

यहां की गौरवशाली परंपरा, फलदार पेड़ों एवं पशु पक्षियों के साथ भावनात्मक संबंध इस गीत के माध्यम से बखूबी समझा जा सकता है। यह गीत धरहरा गांव निवासी राजकिशोर जी लिखा है।

 (कुमार सत्यम दिल्ली विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडकर कॉलेज में सहायक प्राध्यापक हैं)

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