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आखिर क्यों यूपी में विकास के एजेंडे से उतरते नजर आ रहे नरेंद्र मोदी, एक-एक कर तरकश से दूसरे तीर निकाल रहे पीएम

पहले पंजाब और अब उत्तर प्रदेश चुनावों में जातीय और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण न केवल निरंतर जारी है बल्कि पहले के मुकाबले इसके स्तर में और गिरावट दर्ज की गई है।

Author February 25, 2017 1:52 PM
अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनावी भाषणों में दिवाली और रमजान, श्मसान और कब्रिस्तान की बात करने लगे हैं। (फोटो- PTI)

नए साल के पहले हफ्ते में जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि कोई भी राजनीतिक दल जाति-धर्म, नस्ल-समुदाय या भाषा के आधार पर लोगों से वोट नहीं मांग सकेगा, तब ऐसा लगा कि पांच राज्यों में होनेवाले विधान सभा चुनाव में इस बार लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी जाएगी। लोगों को लगा कि जातीय और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का पुराना पॉलिटिकल फॉर्मूला अब गुजरे जमाने की बात हो जाएगी लेकिन पहले पंजाब और अब उत्तर प्रदेश चुनावों में यह ध्रुवीकरण न केवल निरंतर जारी है बल्कि पहले के मुकाबले इसके स्तर में और गिरावट दर्ज की गई है। और इस गिरावट पर न तो सुप्रीम कोर्ट और न ही चुनाव आयोग कुछ कह सकने या कर सकने की स्थिति में नजर आता है। इसकी मुख्य वजह शायद स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं जिन्होंने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में खुद को विकास का पर्याय बताया था किन्तु जैसे-जैसे यूपी चुनावों का आखिरी चरण नजदीक आता जा रहा है, उनका विकासवादी एजेंडा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आड़ में कहीं खो चुका है।

अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिवाली और रमजान, श्मसान और कब्रिस्तान की बात करने लगे हैं। उनके भाषणों में अब न तो शिक्षा, चिकित्सा, ग्रामीण विकास, सड़क निर्माण और किसानी-खेती की बात होती है और न ही बेरोजगारी उन्मूलन, औद्योगिक विकास, समाज कल्याण और स्किल डेवलपमेंट जैसे अहम मुद्दों की चर्चा होती है। हैरत की बात है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री एक राज्य (उत्तर प्रदेश) के कुल बजट के मात्र 0.4 फीसदी खर्च होनेवाले मद (कब्रिस्तान) पर बात कर रहे हैं जबकि 99.6 फीसदी मद के अहम मुद्दे उनके लिए बेमायने हो गए हैं।

19 फरवरी, 2017 को यूपी के फतेहपुर में पीएम मोदी की चुनावी रैली का वीडियो, इसी रैली में पीएम ने श्मसान और रमजान की चर्चा की थी:

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ही पदचिह्नों पर चलते हुए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ‘कसाब’ की बात करते हैं। चुनावों के तीन चरण बीत जाने के बाद अमित शाह ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को मिलाकर नया चुनावी जुमला ‘कसाब’ ईजाद किया है। शाह ने इस शब्द को भी धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए ही गढ़ा है। मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले और सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और देश की आर्थिक विकास की अक्सर बात करने वाले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी अब चुनावी सभाओं में मंदिर का राग अलापना शुरू कर दिया है। उनकी एक सभा में राज्य सभा सांसद विनय कटियार ने तो लोगों से इसलिए यूपी चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने की अपील की ताकि राज्य सभा में भाजपा सदस्यों की संख्या बढ़ सके और सरकार अयोध्या में मंदिर बनाने का कानून संसद से पारित करा सके। मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री महेन्द्र नाथ पांडेय ने भी शिक्षा और विकास की बात छोड़कर प्रियंका गांधी की सुंदरता और उन्हें शोभा की वस्तु बताकर चुनावी मुद्दे की धार को कुंद किया है।

समाजवादी पार्टी भी विकास की बात करते-करते और ‘काम बोलता है’ का नारा देत-देते अब गुजरात के गधों तक जा पहुंची है। यानी जैसे-जैसे यूपी चुनावों का आखिरी चरण नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियां विकास के मुद्दों से किनारा कर जातीय गोलबंदी और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के पुराने और रटे-रटाए चुनावी मंत्र का जाप करने लगी है ताकि चुनावी बैतरणी पार किया जा सके।

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